ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर एक बहुत बड़ा प्रतिनिधिमंडल लेकर भारत पहुंचे हैं। प्रतिनिधिमंडल के करीब 125 सदस्यों में वरिष्ठ मंत्री, सांसद, उद्योगपति, तकनीकी विशेषज्ञ और रणनीतिक सलाहकार शामिल हैं। स्टार्मर का यह दौरा केवल औपचारिक कूटनीतिक मुलाकात भर नहीं माना जा रहा है, बल्कि स्टार्मर सरकार की भारत को लेकर प्राथमिकताओं को भी सामने रख सकती है।
जैसा पता चला है, स्टार्मर के भारत दौरे का प्रमुख एजेंडा आर्थिक, रणनीतिक और तकनीकी मोर्चों पर साझेदारी को गहराना है। उनके इस एजेंडे में कुछ प्रमुख विषयों की बात करें तो भारत और ब्रिटेन के बीच कई वर्षों से मुक्त व्यापार समझौते पर बात चल रही है। हालांकि पिछली ब्रिटिश कंजरवेटिव सरकार के दौरान इसमें कुछ अड़चनें आई थीं, लेकिन लेबर पार्टी की यह सरकार इस समझौते को जल्द से जल्द पूरा करने की इच्छुक दिखती है। कीर स्टार्मर इस दौरे में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शीर्ष आर्थिक नीति निर्माताओं के साथ इस पर गहन चर्चा करेंगे।

दूसरे, ब्रिटेन चाहता है कि भारत के तेजी से बढ़ते टेक्नोलॉजी और स्टार्टअप इकोसिस्टम में वह एक भरोसेमंद साझेदार के रूप में अपनी भूमिका मजबूत करे। इसके लिए ब्रिटिश टीम में एकआई, फिनटेक, ग्रीन टेक और हेल्थटेक सेक्टर से जुड़े कई प्रमुख निवेशक और उद्योगपति आए हैं।
तीसरे, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती सक्रियता को देखते हुए ब्रिटेन भारत को एक रणनीतिक साझेदार के रूप में देख रहा है। यूके चाहता है कि रक्षा उत्पादन, साइबर सुरक्षा और नौसैनिक सहयोग के क्षेत्र में भारत के साथ उसकी भागीदारी बढ़े। यह ब्रिटेन की ‘ग्लोबल ब्रिटेन’ नीति के अंतर्गत भारत को एक मुख्य धुरी के रूप में देखने की रणनीति है।
चौथे, ब्रिटिश सरकार भारतीय छात्रों, पेशेवरों और निवेशकों के लिए वीसा प्रक्रियाओं को आसान बनाने की दिशा में भी कदम उठा सकती है। इससे दोनों देशों के बीच मानव संसाधन और ज्ञान आदान-प्रदान को बल मिलेगा। कह सकते हैं कि भारत और ब्रिटेन के संबंध आज बहुआयामी और व्यावहारिक सहयोग पर आधारित हैं। ऐतिहासिक रूप से उपनिवेशवादी अतीत के बावजूद दोनों देशों ने पिछले, विशेषकर ग्यारह साल के दौरान अपने रिश्तों को रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक पहुंचाया है।
कहना न होगा कि आर्थिक मोर्चे पर भारत ब्रिटेन के लिए एशिया में एक उभरता हुआ बड़ा बाजार है। ब्रिटेन भारत में 20 अरब डॉलर से अधिक का प्रत्यक्ष निवेश कर चुका है, वहीं भारतीय कंपनियों ने भी ब्रिटेन में रोजगार सृजन में बड़ी भूमिका निभाई है।
भू-राजनीतिक स्तर पर दोनों देश लोकतंत्र, कानून के शासन और मुक्त व्यापार के साझा मूल्यों को मानते हैं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में ब्रिटेन की बढ़ती सक्रियता और भारत की केंद्रीय भूमिका, दोनों को एक दूसरे के करीब ला रही है।
ब्रिटेन में भारतीय मूल के करीब 17 लाख लोग रहते हैं, जो दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और सामाजिक सेतु का कार्य करते हैं। भारत और ब्रिटेन के बीच हालांकि कुछ मुद्दों पर मतभेद भी रहे हैं, जैसे, ब्रिटेन में कुछ भारत विरोधी तत्वों की सक्रियता, मानवाधिकारों पर उलट बयानबाजी और सख्त वीसा नीतियां। लेकिन नई ब्रिटिश सरकार इन मतभेदों को पीछे छोड़कर आर्थिक और रणनीतिक हितों को प्राथमिकता देने की दिशा में बढ़ती दिख रही है।
उल्लेखनीय है कि स्टार्मर के दिल्ली पहुंचने से एक दिन पहले दिल्ली में सिंगापुर के पूर्व वरिष्ठ राजनयिक और प्रसिद्ध रणनीतिक विचारक किशोर महबूबानी ने एक महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा कि ब्रिटेन को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की स्थायी सदस्यता भारत के हवाले कर देनी चाहिए, क्योंकि आज ब्रिटेन की तुलना में विश्व में भारत कहीं अधिक प्रभावशाली, जनसंख्या में बड़ा और भू-राजनीतिक रूप से प्रासंगिक है।
किशोर का तर्क है कि ब्रिटेन अब औपनिवेशिक साम्राज्य नहीं रहा और उसकी वैश्विक भूमिका सीमित हो चुकी है, जबकि भारत एक वैश्विक शक्ति के रूप में उभर रहा है-जिसकी अर्थव्यवस्था दुनिया की शीर्ष 5 अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, और जो जी20, क्वाड और ब्रिक्स जैसे मंचों पर सक्रिय है।

हालांकि ब्रिटेन के लिए अपनी UNSC सीट छोड़ना व्यवहारिक रूप से संभव नहीं है, लेकिन किशोर का यह बयान एक गहरी कूटनीतिक सोच को दर्शाता है कि वैश्विक शासन संस्थाओं में सुधार आवश्यक है और भारत की भूमिका को अनदेखा नहीं किया जा सकता।
असल में स्टार्मर का भारत दौरा केवल द्विपक्षीय रिश्तों का प्रतीक नहीं है, बल्कि नए वैश्विक समीकरणों में भारत के बढ़ते महत्व का भी प्रमाण है। ब्रिटेन चाहता है कि वह ‘पोस्ट-ब्रेक्सिट’ युग में भारत के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक रिश्तों को मजबूत कर अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी स्थिति पुनः परिभाषित करे।
वहीं भारत के लिए ब्रिटेन एक तकनीकी, शैक्षिक और रणनीतिक साझेदार के रूप में महत्व रखता है। यदि एफटीए पर आगे प्रगति होती है और रक्षा सहयोग मजबूत होता है, तो आने वाले वर्षों में भारत–ब्रिटेन संबंध 21वीं सदी की साझेदारी का एक सफल उदाहरण बन सकते हैं।

















