संत किसी जाति और समाज के न होकर सम्पूर्ण धरा के होते हैं जो सर्वकल्याण के भाव से जन्म लेते हैं। महर्षि वाल्मीकि भारत के उन विरली विभूतियों में से एक हैं, जिनकी उपस्थिति पूरे देश में है। उनके व्यक्तित्व के विभिन्न आयाम हैं, कहीं उनकी गणना महर्षियों में है तो कहीं भगवान् वाल्मीकि कहा जाता है। कहीं संत के रूप में तो कहीं महापुरुष के रूप। देश के विभिन्न स्थानों पर उनके मंदिर हैं, मूर्तियां स्थापित हैं। नेपाल, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, विहार, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और छत्तीसगढ़ ही नहीं केरल में भी वाल्मीकि जी के मंदिर हैं। नेपाल के चितवन जिले में वाल्मीकि मंदिर है।
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमश्शाश्वतीस्समा: । यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधी: काममोहितम्।
“हे निषाद! तुमने क्रौंच पक्षी के उस जोड़े में से एक को वियोग से पीड़ित कर दिया, तुम्हें अनंत काल तक प्रतिष्ठा प्राप्त न हो।” यह श्लोक वाल्मीकि के जीवन की घटना का वर्णन करता है, जब वे शिकारी को देखकर अचानक क्रोधित हो गए और यह प्रथम श्लोक उनके मुख से निकला, जिससे रामायण की उत्पत्ति हुई।
जीवन की घटनाएं किसी व्यक्ति को महानता की और अग्रसर करती हैं ,बस वह उन घटनाओं को सकरात्मक दिशा दे सके।
रामायण में लोक संस्कृति के दर्शन
महर्षि वाल्मीकि ने लोकमंगल की उदात्त भावना से रामायण महाकाव्य की रचना की, जिसमे लोक संस्कृति , अनुपम जीवन मूल्यों को समाहित किया । उनके नायक श्रीराम राजपुत्र होने के साथ जननायक भी हैं। श्रीराम के अनन्य हनुमान जी लोकचिंतक , सर्वकल्याणकारी , संकटमोचक , सर्वपापहारी एवं चिंतानाशक के रूप में स्थापित हैं। रामायण में राम के दो रूप दिखाई देते हैं। स्वयं कष्ट उठाकर दूसरों का कष्ट ग्रहण करने वाले सत्याग्रही राम, दूसरा शस्त्रधारी राम जो अत्याचारियों को समाप्त करने का कार्य करते हैं। उनके शस्त्र उनका शृंगार हैं।
सामाजिक एकता को प्रस्तुत किया
वाल्मीकि रामायण के आरम्भ में ही महर्षि वाल्मीकि के प्रश्नों के उत्तर देते हुए नारद भगवान् श्रीराम के गुणों का विस्तृत वर्णन करते हैं। जैसे -वाग्मी- सुन्दर वाणी बोलनेवाले ; द्युतिमान्- तेजस्वी। नियतात्मा- दृढ चित्तवाले; शत्रुनिबर्हणः- शत्रुओं का नाश करनेवाले ; विपुलांसः- विशाल एवं चौड़ी कन्धावाले ; कम्बुग्रीवः- शंख के समान गरदन वाले आदि। महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में समतावादी समाज का रूप प्रस्तुत किया है , श्रीराम की दृष्टि में निषादराज , केवट, माता शबरी , सुग्रीव, हनुमान आदि सब एकसमान हैं। आज के भारतीय समाज में जहां समाज के प्रत्येक स्थल पर विवाद एवं मत-मतांतर हैं। तब वाल्मीकि के रामायण में वर्णित आदर्शों की आवश्यकता महसूस होती है। वे भारत में सामाजिक एकत्व और समरसता के प्रतीक हैं। स्वयं श्रीराम ने उन्हें धरती पर लेटकर साष्टांग प्रणाम किया और वन में रहने के लिये उन्हीं से सुगम स्थान पूछा। माता सीता बिना किसी जाति , परम्परा का ध्यान रखे बिना संत ह्रदय नवनीत समाना के आधार पर उन्हीं के आश्रम में रहीं। लव और कुश को उन्हीं ने शस्त्र और शास्त्र का ज्ञान दिया।
महर्षि वाल्मीकि के रामराज्य की व्यवस्था
महर्षि वाल्मीकि के रामराज्य की व्यवस्था में आपसी भेदभाव की स्थिति नहीं है। समानता मूलक समाज की परिकल्पना एवं सामाजिक न्याय का पूर्ण प्रतिपादन हो चुका था। वाल्मीकि के राम ऐसे सर्व सुखकारी, सर्व हितकारी, समदर्शी हैं, जिन्हें हम अपने जीवन में जिस रूप में पाना चाहें, ले आना चाहें, हम ला सकते हैं, पा सकते हैं। वाल्मीकि की रामायण के महाकाव्य श्रीराम के राज्य में सामाजिक न्याय मात्र ही नहीं अपितु सम्पूर्ण समाज के समस्त वर्ग समानता स्थापित करने के साथ वास्तविक न्याय प्राप्त होता था। रामराज्य की यही विशेषता थी कि राजा और प्रजा का भेद एक ओर मिट चुका था और दूसरी ओर दोनों समानता की स्थिति में थे।
भौगोलिक विशेषताओं का वर्णन
रामायण की रचना में सूर्य,- चंद्र , सौर मंडल एवं अंतरिक्ष के ज्ञान के साथ साथ राम के वनवास काल के स्थानों का वर्णन एवं उनकी भौगोलिक विशेषताओं का उल्लेख है, जिसके आधार पर राम वनगमन पथ का निर्माण संभव हो पाया हैं।
जन जन के राम
वाल्मीकि के राम की कथा राजा राम की नहीं बल्कि जन जन के राम बनने की है , उनके हाथों में दान, पैरों में तीर्थयात्रा, भुजाओं में विजयश्री, वचन में सत्यता, प्रसाद में लक्ष्मी, संघर्ष में शत्रु की पराजय है। राम की यात्रा अपनी नहीं, धर्म की जययात्रा है।
महर्षि वाल्मीकि के प्रमुख उपदेश और शिक्षाएं आज भी जीवन का दर्शन है। सत्संग एवं सकारात्मक वातावरण के क्रांतिकारी प्रभाव, नाम जप की सर्वोच्च महिमा बताती है। उनका जीवन कर्म की प्रधानता और जन्म की गौणता का सूचक है कि हर व्यक्ति को यह विश्वास दिलाती है कि चाहे उसकी पृष्ठभूमि कुछ भी हो, वह अपने परिश्रम, सद्कर्म और संकल्प से महान बन सकता है। उन्होंने रामायण में धर्म और मर्यादा का शाश्वत महत्व बताकर मर्यादा पुरुषोत्तम राम का चरित्र प्रस्तुत किया और व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक जीवन में मर्यादा का पालन ही स्थायी सुख और सम्मान का आधार है। उन्होंने साहित्य और ज्ञान की परिवर्तनकारी शक्ति का अहसास कराया कि साहित्य कैसे समाज का दर्पण और मार्गदर्शक बन सकता है। ज्ञान ही वह साधन है जो अंधकार को दूर कर मानवता को प्रगति के पथ पर अग्रसर करता है।
समानता और सामाजिक न्याय का संदेश
उन्होंने समानता और सामाजिक न्याय का संदेश दिया , चरित्र निर्माण पर जोर दिया और बताया कि भ्रष्टाचार और अनैतिकता के इस दौर में, रामायण से प्राप्त मर्यादा, ईमानदारी और धर्मपूर्ण आचरण के मूल्य हमें एक बेहतर इंसान और जिम्मेदार नागरिक बनने की प्रेरणा देते हैं।
वाल्मीकि जयंती कोई सामान्य सांस्कृतिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह आत्मचिंतन, आत्मशुद्धि और आत्मोन्नति का पर्व है। उन्होंने बताया कि मनुष्य की असली पहचान उसके विचारों और कर्मों में निहित है, न कि उसके जन्म अथवा जाति में। रामायण के रूप में उन्होंने समाज और विश्व को एक ऐसी अमूल्य धरोहर दे सकते हैं जो युगों-युगों तक मानवता का मार्गदर्शन करती रहे।















