भुवनेश्वर: श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन (SJTA) ने 12वीं शताब्दी के जगन्नाथ मंदिर से जुड़े अमूल्य अभिलेखों, पांडुलिपियों और पवित्र दस्तावेजों को सुरक्षित रखने के लिए पुरी में एक अत्याधुनिक डिजिटल लाइब्रेरी स्थापित करने की योजना की घोषणा की है। यह डिजिटल लाइब्रेरी पुरी स्थित पुराने रघुनंदन पुस्तकालय के स्थान पर विकसित की जाएगी।
यह ऐतिहासिक पुस्तकालय कभी संस्कृत, ओड़िया और बांग्ला भाषा की दुर्लभ ताड़पत्र पांडुलिपियों और ग्रंथों का भंडार था। कानून मंत्री पृथ्वीराज हरिचंदन ने बताया कि इसके साथ ही जगन्नाथ संस्कृति के गहन अध्ययन के लिए एक शोध केंद्र भी स्थापित किया जाएगा। उन्होंने बताया सकि जगन्नाथ मंदिर के दुर्लभ अभिलेख और पवित्र दस्तावेज जिनमें मादला पांजी (मंदिर का कालक्रम), अनुष्ठानिक अभिलेख और प्राचीन ताड़पत्र पांडुलिपियाँ शामिल हैं, डिजिटाइज कर संरक्षित किए जाएंगे।
यह पहल मंदिर की शाश्वत धरोहर को सुरक्षित रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है। मादला पांजी , जिसे मंदिर का इतिहास और अनुष्ठानों का कालक्रम माना जाता है, सदियों के पर्व-त्योहारों और प्रमुख घटनाओं का ब्यौरा प्रस्तुत करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसे डिजिटल स्वरूप में संरक्षित करने से शोध के नए रास्ते खुलेंगे और वैश्विक स्तर पर इसकी पहुंच आसान होगी। श्रीजगन्नाथ मंदिर प्रशासन (एसजेटीए) के मुख्य प्रशासक अरविंद पाढी ने परियोजना को संरक्षण और ज्ञान दोनों का केंद्र बताया। उन्होंने कहा कि दुर्लभ पांडुलिपियों और दस्तावेजों को डिजिटाइज कर हम उन्हें भौतिक क्षरण से बचा रहे हैं और साथ ही सार्वभौमिक पहुँच सुनिश्चित कर रहे हैं।
भक्त, इतिहासकार और शोधकर्ता जगन्नाथ संस्कृति की गहराई को इस लाइब्रेरी के माध्यम से समझ सकेंगे। उन्होंने इसे परंपरा और तकनीक के बीच एक सेतु बताया। उन्होंने कहा कि यह अनूठी पहल केवल संरक्षण के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को जगन्नाथ की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने के लिए भी है । यह परियोजना 1920 के दशक में एमार मठ द्वारा स्थापित रघुनंदन पुस्तकालय की विरासत को पुनर्जीवित करेगी। वर्षों तक यह पुस्तकालय दुर्लभ ग्रंथों और पांडुलिपियों का भंडार रहा, लेकिन जगन्नाथ मंदिर हेरिटेज कॉरिडोर के निर्माण के लिए इसे ध्वस्त कर दिया गया था। इसके संग्रह को पुरी के अन्य स्थान पर स्थानांतरित किया गया था, जिसे अब डिजिटल स्वरूप में संरक्षित किया जाएगा। यह घोषणा उस समय आई है जब तीन महीने पहले मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने जुलाई में एक व्यापक सांस्कृतिक संरक्षण योजना की घोषणा की थी।
इसमें पुरी में एक संग्रहालय, शोध केंद्र और सभागार की स्थापना शामिल है। प्रस्तावित परिसर में 300-सीट का सभागार होगा, जहाँ प्रतिदिन लेज़र-लाइट और साउंड शो आयोजित होंगे। इसके साथ ही एक ओपन-एयर मंच पर सांस्कृतिक प्रस्तुतियां होंगी और संग्रहालय में मंदिर निर्माण का इतिहास, काष्ठ-मूर्ति निर्माण, कांची विजय, पर्व-त्योहार और अनुष्ठानों को लघु मूर्तियों, चित्रों और पट्टिकाओं के माध्यम से प्रदर्शित किया जाएगा। अधिकारियों का मानना है कि डिजिटल लाइब्रेरी और सांस्कृतिक सुविधाएं पुरी को शोध और आस्था का वैश्विक केंद्र बना देंगी, जिससे दुनिया भर से विद्वानों, भक्तों और पर्यटकों का आकर्षण बढ़ेगा। पाढी ने कहा कि यह प्रयास जगन्नाथ संस्कृति की गहरी समझ को बढ़ाएगा और पुरी की पहचान को आध्यात्मिक और सांस्कृतिक धरोहर के केंद्र के रूप में और मजबूत करेगा। राज्य सरकार और एसजेटीए का उद्देश्य न केवल दुर्लभ पांडुलिपियों का संरक्षण करना है, बल्कि ओडिशा की सदियों पुरानी परंपराओं को अंतरराष्ट्रीय मंच पर बढ़ावा देना भी है।

















