RSS @100: शताब्दी समारोह में पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने कहा- हेडगेवार और अंबेडकर से प्रेरित है मेरा जीवन
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RSS @100: शताब्दी समारोह में पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने कहा- हेडगेवार और अंबेडकर से प्रेरित है मेरा जीवन

विजयदशमी पर नागपुर के रेशमबाग मैदान में RSS के 100 वर्ष पूरे होने पर पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राम नाथ कोविंद ने संबोधन दिया। उन्होंने डॉ. हेडगेवार और बाबा साहब अंबेडकर के विचारों से राष्ट्रीय एकता और सामाजिक न्याय पर जोर दिया, जो उनकी जनसेवा को प्रेरित करते हैं।

Written byकुलदीप सिंहकुलदीप सिंह
Oct 2, 2025, 09:50 am IST
inभारत
RSS @100 Dr Ramnath Kovind

डॉ रामनाथ कोविंद

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना के अवसर और विजयदशमी पर नागपुर स्थित रेशमबाग मैदान में संघ के शताब्दी समारोह को संबोधित करते हुए पूर्व राष्ट्रपति डॉ रामनाथ कोविंद जी ने कहा आज का दिवस अपने साथ कई सुखद संयोंग लेकर आया है। क्योंकि आज के दिन संघ अपने 100 वर्ष पूरे कर रहा है और आज ही के दिन महात्मा गांधी और देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की जयंती भी है। उन्होंने कहा कि आज विश्व की सबसे प्राचीन संस्कृति का संवहन करने वाली विश्व की सबसे बड़ी स्वयंसेवी संस्था का शताब्दी समारोह है।

पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि नागपुर की पावन धरती आधुनिक भारत के निर्माताओं से जुड़ी हुई है। इन्हीं में दो ऐसे डॉक्टर हैं, जिनका मेरे जीवन निर्माण में बहुत बड़ा योगदान रहा है। ये दोनों महापुरुष संघ के संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार और डॉ भीमराव रामजी अंबेडकर का रहा है। बाबा साहब अंबेडकर के संविधान में निहित सामाजिक न्याय की व्यवस्था के बल पर ही मेरी तरह आर्थिक और सामाजिक रुप से सामान्य पृष्ठभूमि का एक व्यक्ति देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंच सका। जबकि डॉ हेडगेवार के गहन विचारों से समाज औऱ राष्ट्र को देखने का मेरा दृष्टिकोण स्पष्ट हुआ।

इन दोनों विभूतियों के द्वारा स्थापति किए गए राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता के आदर्शों से ही जनसेवा की मेरी भावना अनुप्राणित है। आज के दिन मैं डॉ हेडगेवार, श्री गुरूजी, श्री बालासाहब देवरस, श्री रज्जू भैय्या जी और सुदर्शन जी के प्रति हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। इसके साथ ही रामनाथ कोविंद ने उन असंख्य स्वयं सेवकों की स्मृतियों को भी नमन किया, जिन्होंने भारत माता की सेवा की है। वह कहते हैं कि डॉ हेडगेवार जी ने जिस पौधे (आरएसएस) को रोपा था, उसे गुरूजी वे विस्तार और मजबूती देने का काम किया। बालासाहब देवरस ने संघ को पुष्पित पल्लवित करते हुए समरसता पर जोर दिया। जबकि रज्जू भैय्या ने स्वतंत्रता के बाद होने वाले सबसे बड़े आर्थिक बदलाव और उससे होने वाले सामाजिक परिवर्तनों के बीच संघ को अपना मार्गदर्शन दिया।

राजनैतिक संक्रमण के दौर में भी संघ के कार्य को आगे बढ़ाया। उनके कार्यकाल के बाद भी निरंतर आगे बढ़ता संघ विशाल वट वृक्ष की तरह अपनी जड़ों और शाखाओं के जरिए भारत के लोगों को एकता और गौरव और प्रगति की संजीवनी रूपी छाया प्रदान कर रहा है।

संस्कारों का समन्वय करने वाले एक दूरदर्शी समाज वैज्ञानिक हैं: डॉ मोहन भागवत

डॉ मोहन भागवत जी भारतीय परंपरा के अनुभव का व्याख्याता होने के साथ-साथ आधुनिकता और संस्कारों का समन्वय करने वाले एक दूरदर्शी समाज वैज्ञानिक हैं। मुझ जैसे एक सामान्य स्वयं सेवक को इस ऐतिहासिक अवसर से जोड़ने के लिए मैं संघ का हृदय से आभारी हूं। अन्नदाता किसान से लेकर स्पेस साइंटिस्ट तक, विद्यार्थी से लेकर व्यवसायी तक, जनजातीय समुदायों से लेकर स्वास्थ्य सेवकों तक, अधिवक्ताओं, कलासाधकों और मातृशक्ति सभी को समाज के मुख्य भागों से जोड़ने का कार्य संघ कर रहा है।

सदियों से विजयदशमी के प्रति दशकों से चला आ रहा विश्वास ये सिद्ध करता है कि हमारे देशवासी सत्य और धर्म के पक्षधर रहे हैं। मैं ये मानता हूं कि आद्य सरसंघचालक डॉ हेडगेवार जी ने संघ के शुभारंभ के लिए सबसे शुभ और सार्थक दिन भी चुना। वैश्विक पटल पर वर्चस्व रखने वाले कितने ही संस्थान, विचार या राष्ट्र 100 वर्षों के कालखंड में विलीन हो गए, लेकिन राष्ट्रप्रेम और भारतीय आदर्शों से सुसज्जित आरएसएस विशाल होने के साथ ही सशक्त भी हुआ है। डॉ हेडगेवार जी ने एक ऐसे संगठन का सृजन किया है, जिसकी सरल, सहज और सुलभ विचारधारा से उसे अनूठी प्राण शक्ति मिलती रही है।

हालांकि, संघ की कोई औपचारिक सदस्यता नहीं होती है, लेकिन संघ के स्वयंसेवकों जैसी निष्ठा कहीं भी नहीं दिखाई देती है। पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से उनका परिचय वर्ष 1991 में हुए आम चुनाव के दौरान परिचय हुआ था। उन्होंने कहा कि उस दौरान कानपुर घाटौ लोकसभा क्षेत्र से भाजपा ने उन्हें अपना कैंडिडेट बनाया था। उसी दौरान चुनाव प्रचार के वक्त जिन सहयोगियों को पूर्ण रूप से जाति, धर्म से मुक्त पाया था तो वो संघ के पदाधिकारी ही थे। समाज के कई वर्गों को अभी भी इस बात की अल्प जानकारी है कि संघ में किसी भी प्रकार की अस्पृश्यता नहीं है। मुझे लगता है कि समाज में इसको लेकर कुछ भ्रान्तियां हैं, जिसे दूर किए जाने की आवश्यकता है।

इसको लेकर 2001 में लाल किले की परिसर में आयोजित एक दलित संगम रैली का उल्लेख करते हुए पूर्व राष्ट्रति कहते हैं कि उस दौरान मैं अनुसूचित जाति मोर्चा का राष्ट्रीय अध्यक्ष था। श्रद्धेय अटल जी प्रधानमंत्री थे और देश में बहुत से लोग संघ व अटल जी को दलित विरोधी सिद्ध करने के लिए दुष्प्रचार चला रहे थे। उस रैली को संबोधित करते हुए अटल जी ने कहा था कि हमारी सरकार, दलितों, गरीबों और पिछड़ों की भलाई के लिए है। हमारी सरकार भीम स्मृति के आधार पर कार्य करेगी। उस दौरान अटल जी ने कहा था कि हम भीम वादी हैं। संघ की विचारधारा के खिलाफ समाज के इस वर्ग में जो दुष्प्रचार किया जा रहा था, उसे दूर करने में अटल जी के उस संबोधन की ऐतिहासिक भूमिका रही है।

सामाजिक एकता और सुधार का पक्षधर रहा है संघ

रामनाथ कोविंद ने आगे कहा कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ वस्तुत: सामाजिक एकता और सुधार का पक्षधर रहा है। इसे बनाए रखने के लिए संघ लगातार सक्रिय रहा है। मैं पिछले कुछ सालों से अपनी आत्मकथा को लिखने की कोशिश कर रहा हूं, जो कि अब पूरी हो चुकी है। उसे मैंने ट्रायंफ ऑफ द इंडियन रिपब्लिक…माई एंड स्ट्रगल्स नाम दिया है। मैंने जिन जीवन मूल्यों का पालन किया है, वे भारतीय संविधान पर आधारित हैं। मेरी आत्मकथा में स्वसंसेवकों से जुड़ाव का जिक्र है। ये मेरा अपना सौभाग्य रहा है कि संघ से जुड़ी महान विभूतियों से मेरा संपर्क रहा है। संघ के चतुर्थ सरसंघचालक रज्जू भैय्या ने मुझे जनसेवा और आध्याम की पद्धतियों से अवगत कराया था। उन्हीं के सुझाव से मैंने अपने राज्यसभा सांसद के कार्यकाल के दौरान विपत्स्यना ध्यान पद्धति का अनुसरण किया। मैंने देखा है कि संघ के कार्यकर्ता एकता को महत्व देते हैं। अटल जी ने मेरी इस जीवन यात्रा को मूल्य आधारित राजनीति की ओर मोड़ने का कार्य किया था।

मुझे माननीय नानाजी देशमुख से मिलने का सौभाग्य मिला था। उनकी प्रेरणा से संचालित ग्राम विकास के कई प्रकल्पों को मैंने नजदीक से देखा है। राष्ट्रपति के कार्यकाल के दौरान भी चित्रकूट दौरे के दौरान मैंने उनके द्वारा किए गए व्यापक प्रकल्पों को करीब से देखा। इसके अलावा दत्तोपंत ठेंगड़े जी से समाज कल्याण और गरीबी से लड़ने का हुनर सीखने को मिला। इसके अलावा डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी शोध प्रतिष्ठान में भी अपनी सेवाएं प्रदान करने का भी सुअवसर भी मिला। वहीं पर कार्य के दौरान संघ की भूमिका और वर्तमान परिदृश्यों को करीब से समझने का सुअवसर मिला।

मैंने अधिवक्ता, राज्यसभा सांसद, राज्यपाल और राष्ट्रपति के रूप में अपने अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए संवैधानिक मूल्यों को सर्वोच्च प्राथिकता दी। इसे संमझने में डॉ बाबा साहब अंबेडकर के विचार एक दीप स्तंभ रहे हैं। बाबा साहब ने संविधान की संरचना में राष्ट्रीय एकता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी थी। राष्ट्रवाद की भावना ही संविधान की धुरी है। मेरे पूर्ववर्ती राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने भी वर्ष 2018 में संघ तृतीय वर्ष शिक्षा समापन के दौरान अपने संबोधन में कहा था कि भारतीय राष्ट्रवाद की अवधारणा संवैधानिक राष्ट्रवाद पर आधारित है। बाबा साहब कहते थे कि संविधान की व्यवस्था उपलब्ध हो जाने के बाद हर समस्या का समाधान इसी व्यवस्था के तहत होना चाहिए।

बाबा साहब ने भी दिया था एकता का संदेश

25 नवंबर 1949 को डॉ बाबा साहब ने अपना अंतिम भाषण संविधान सभा में दिया था, जिसमें उन्होंने अपनी चिंताएं व्यक्त की थी। जो कि संघ के चिंतन भी दिखती है। बाबा साहब ने कहा था-यूनाइटेड वी स्टैंड, डिवाइडेड वी फाल मतलब कि जहां एकता है वहां अस्मिता है और जहां विभाजन है वहां पतन है। यही बात डॉ हेडगेवार भी कहते थे विदेशियों ने हमें कमजोर करने के लिए हमारे ही भाइयों के हाथों में लाठी पकड़ा दी, ताकि हम असंगठित और विभाजित बने रहें।

स्वतंत्रता से पहले राजनीतिक परिदृश्य के दौरान सामाजिक विभाजन को भड़काने अनेक तत्व सक्रिय थे। साम्प्रदायिकता से ऊपर उठकर लोगों ने राष्ट्रप्रेम की भावना को जगाने के लिए बाबा साहब के समकालीन अनेक प्रबुद्धों का ये मानना था कि हमें जनता के बीच जाकर ये कहना चाहिए कि सबसे पहले हम भारतीय हैं। उसके बाद हिन्दू, मुसलमान, सिख या ईसाई हैं। भारतीयता को लेकर बाबा साहब की सोच कहीं अधिक व्यापक थी। वे कहते थे कि हमें जनता से ये कहना चाहिए कि हम पहले भी भारतीय थे, बाद में भी भारतीय थे और अब भी भारतीय ही हैं। पूर्व राष्ट्रपति ने कहा, “मैं मानता हूं कि प्रत्येक भारतीय को संघ की एकात्मकता के सूत्र को अवश्य पढ़ना चाहिए।”

इसमें स्त्रोत में भारतीय इतिहास, संस्कृति, जीवन मूल्यों, सामाजिक समावेश और समरसता की श्रेष्ठ अभिव्यक्ति निहित है। एकात्मकता के इस स्त्रोत में महर्षि वाल्मीकि, संत रविदास, संत कबीर औऱ तुकाराम, भगवान बिरसामुंडा, महात्मा फुले, श्री नारायण गुरु, बाबा साहब भीमराव अंबेडकर आदि संघ की दृष्टि का प्रमाण है। लेकिन हैरानी की बात है कि ये जानकारी समाज के बहुत से लोगों तक नहीं पहुंची। रामनाथ कोविंद ने कहा कि मैं चाहता हूं कि सोशल मीडिया समेत हर माध्यम का इस्तेमाल करके संघ के सामाजिक समावेश का ये संदेश लोगों तक पहुंचना चाहिए। केरल के समाज सुधारक श्री नारायण गुरु ने कहा था एक आदर्श स्थान वह है, जहां जाति और पंथ के आडंबर से मुक्त होकर सभी लोग भाई-भाई की तरह रहते हैं।

Topics: सामाजिक समरसताडॉ. केशव बलिराम हेडगेवारDr. Keshav Baliram HedgewarविजयदशमीDr Bhimrao Ambedkarराष्ट्रीय एकताRam Nath Kovindडॉ. भीमराव अंबेडकरRSSnationalलाल बहादुर शास्त्री जयंती
कुलदीप सिंह
कुलदीप सिंह
नागपुर स्थित राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज विद्यापीठ (नागपुर यूनिवर्सिटी) से मॉस कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट। बीते एक दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विशेष रुचि। पत्रकारिता की इस यात्रा की शुरुआत नागपुर नवभारत में इंटर्नशिप से शुरू होती है, तदोपरांत GTPL न्यूज चैनल, लोकमत समाचार, ग्रामसभा मेल, मोबाइल न्यूज 24 और Way2News हैदराबाद के बाद अब पाञ्चजन्य के साथ सफर जारी है। [Read more]
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