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‘सभ्य’ यूरोप का अमानवीय चेहरा

मध्यकालीन यूरोप की चमकदार छवि के पीछे स्त्रियों के लिए अमानवीय वास्तविकता छिपी है। रानियों के प्रसव खुलेआम होते थे, ताकि उत्तराधिकारी की वैधता सिद्ध की जा सके। रिलीजियस पाखंडों ने प्रसव-पीड़ा को ‘परमात्मा का आदेश’ बताकर इसे स्त्रियों के लिए शाश्वत दंड बनाया

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Oct 1, 2025, 09:52 am IST
in विश्व, विश्लेषण

कल्पना कीजिए, यूरोप की वही धरती, जिसे आज सभ्यता और संस्कृति की जननी बताया जाता है। वही यूरोप, जिसके किस्से भारत के कई लेखक महानता के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करते हैं और जिसकी रोशनी के आगे भारत, विशेषकर हिंदुओं को पिछड़ा ठहराया जाता है। लेकिन क्या सचमुच वह यूरोप उतना ही महान था, जितना बताया जाता है?

जरा परदे के पीछे झांकिए, जहां उजाले से कहीं अधिक गहरी परछाइयां फैली हुई थीं। मध्यकालीन यूरोप की वही परछाई, जिसमें स्त्रियां सबसे अधिक पीड़ित रहीं। वे स्त्रियां, जो समाज से संस्कृति पाने की बजाय अपमान झेल रही थीं। और सबसे मार्मिक सच्चाई यह है कि जीवन के सबसे नाजुक और पवित्र क्षण ‘प्रसव के समय’ भी उनके साथ वैसा व्यवहार नहीं हुआ, जिसका वह हकदार थीं। यानी, सभ्यता के ठेकेदार जब दुनिया भर में संस्कृति फैलाने निकले थे, तब वे अपनी ही माताओं, बहनों और पत्नियों को सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन नहीं दे पाए।

निजता का अपमान

क्या आपने कभी सोचा है या क्या हमें कभी यह पढ़ाया गया है कि जिन यूरोपीय राजवंशों की महानता का गुणगान बार-बार किया जाता है, वहां उत्तराधिकारी की वैधता परखने के नाम पर रानियां कैसी अमानवीय स्थितियों से गुजरती थीं? शाही परिवारों में यह परंपरा थी कि रानी के प्रसव कक्ष में दरबारी, राजकुमार, राजकुमारियां और अन्य कथित भद्रजन मौजूद रहते थे। ऐसा इसलिए किया जाता था ताकि यह प्रमाणित हो सके कि जन्मा बच्चा वास्तव में राजा का ही उत्तराधिकारी है, कहीं बच्चा बदल न दिया गया हो या मृत शिशु को जीवित नवजात से प्रतिस्थापित न कर दिया गया हो। इसलिए जैसे ही रानी को प्रसव पीड़ा शुरू होती, उस विशाल कक्ष में लोगों का जमावड़ा लग जाता, जहां उसे अपनी गर्भावस्था बितानी पड़ती थी।

अब जरा कल्पना कीजिए, वह प्रसव की प्रक्रिया जिसे प्रकृति ने इतना व्यक्तिगत और गहन बनाया है, जिसे पशु तक एकांत में जीते हैं, वही पल एक महिला के लिए अपमान की तरह सभा में बांट दिए गए। प्रसव की वे घड़ियां, जिनमें मां अपने अजन्मे शिशु से संवाद करती है, उसे धैर्य और अपनापन देती है, उसी विशेष क्षण को यूरोपीय दरबार ने एक सार्वजनिक तमाशे में बदल दिया। एक ओर महिला पीड़ा से चीख रही होती थी और दूसरी ओर सैकड़ों नज़रें उसका निरीक्षण कर रही होती थीं, जैसे-प्रसव कोई मानवीय अनुभव नहीं, बल्कि जांच का आयोजन हो।

फ्रांस के इतिहास में लुईस चौदहवें की रानी मेरी थेरसे का प्रसव सबसे चर्चित घटनाओं में से एक माना जाता है। कहा जाता है, 1 नवंबर, 1661 को जब रानी को प्रसव पीड़ा शुरू हुई, तो महल का शांत कक्ष कुछ ही देर में राजकुमारियों, ड्यूकों और दरबारियों से भर गया। राजा का उत्तराधिकारी जन्म लेने वाला था और समूचे दरबार को यह प्रत्यक्ष देखना जरूरी समझा गया ताकि किसी प्रकार का संदेह न रहे।

महल के बाहर भीड़ में उत्सव का माहौल था, मानो पूरा फ्रांस इस शिशु के आगमन में सांसें गिन रहा हो। लेकिन भीतर, रानी जिंदगी की सबसे कठिन घड़ियों से गुजर रही थी। इतिहासकार एंटोनिया फ्रेजर ने अपनी पुस्तक लव एंड लुई XIV में लिखा है, ‘‘वातावरण को हल्का करने के लिए दरबारियों ने स्पेनिश गीत गाना शुरू किया, ताकि पीड़ा से तड़पती रानी का ध्यान बंट जाए। लेकिन दर्द और भय से कराहती रानी अपनी मातृभाषा में विलाप करती रही-मैं जन्म नहीं देना चाहती, मैं मरना चाहती हूं।’’

यह सिर्फ रानी मेरी की व्यथा नहीं थी। उस दौर में लगभग हर महिला के लिए प्रसव मृत्यु का साया साथ लेकर आता था। संक्रमण आम था और आंकड़े बताते हैं कि फ्रांस में हर तीन शिशुओं में से एक एक साल का होने से पहले ही दम तोड़ देता था। रानी मेरी का प्रसव 12 घंटे तक चला। अंततः उसने एक स्वस्थ पुत्र को जन्म दिया। जैसे ही बालक की पहली किलकारी गूंजी, बाहर खड़े दरबारियों ने अपनी टोपी हवा में उछाली और घोषणा की—राजा का उत्तराधिकारी जन्म ले चुका है। उस एक जीवन की आहट ने पूरा माहौल बदल दिया, पर पीछे छूट गए दर्द और अपमान की गवाही सिर्फ रानी के हृदय ने महसूस की।

एंटोइनेट का तमाशाई प्रसव

फ्रांस के राजा लुईस सोलहवें की रानी मेरी एंटोइनेट की कहानी भी कम पीड़ादायक नहीं थी। विडंबना यह थी कि उनकी मां, जो ऑस्ट्रिया की महारानी थीं, ने अपने देश में सार्वजनिक प्रसव की क्रूर परंपरा को समाप्त कर दिया था। लेकिन मेरी एंटोइनेट फ्रांस में रहते हुए भी इस अमानवीय प्रथा को बदल न सकीं।

19 दिसंबर, 1778 को जब वे प्रसव पीड़ा से कराह उठीं, उन्होंने घंटी बजाकर इसकी सूचना दी। और फिर… वर्साय महल में अफरा-तफरी मच गई। इतिहासकार फ्रेजर ने अपनी पुस्तक ‘मेरी एंटोनेट : द जर्नी’ में लिखा है कि इस खबर के बाद लोग उत्सुकता में रानी के कक्ष की ओर टूट पड़े। गैलरी और बाहरी कमरों तक तो भीड़ किसी तरह सीमित रही, लेकिन धक्का-मुक्की और हड़बड़ी में कई लोग भीतरी कक्षों तक घुस आए। कुछ शाही दर्शक तो ऊंचे स्थानों पर चढ़कर बैठ गए, सिर्फ इसीलिए कि वे रानी के प्रसव को बेहतर ढंग से देख सकें। सोचिए, प्रसव का वह क्षण जो किसी महिला के लिए सर्वाधिक निजी और भावनात्मक होना चाहिए, उसे भीड़ की आंखों के तमाशे में बदल दिया गया।

मेरी एंटोइनेट भी 12 घंटे तक पीड़ा से जूझती रहीं। अंततः एक बच्ची का जन्म हुआ। यह खबर उस दरबार के लिए निराशा थी जो एक राजकुमार की प्रतीक्षा में सांसें गिन रहा था। मगर इस समूचे ‘नाटकीय प्रसव’ के बीच किसी ने शायद ध्यान ही नहीं दिया कि रानी की निढाल होती सांसों ने संकेत दे दिया था, वह बेहोश हो चुकी थीं। बाहर लोग राहत और निराशा के बीच बंटे थे, लेकिन भीतर… एक थकी हुई मां अकेली थी, जिसने अपना सबसे नाजुक क्षण भी एक सार्वजनिक प्रदर्शन के रूप में जिया।

सत्ता की राजनीति

यूरोपीय शाही दरबारों की रानियों पर सबसे बड़ा दबाव होता था—एक पुत्र को जन्म देने का। यही कारण था कि प्रसव खुलेआम कराया जाता था, ताकि सबके सामने यह सुनिश्चित हो सके कि उत्तराधिकारी लड़का है या लड़की। और यदि इस पर जरा भी संदेह उठे, तो राजाओं की गद्दी तक डगमगा सकती थी। इंग्लैंड के राजा जेम्स द्वितीय की कहानी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। उनकी दूसरी पत्नी को छठे महीने में ही प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। दरबार पहले से ही तनाव में था, क्योंकि प्रोटेस्टेंट गुट और जेम्स की पहली पत्नी से उत्पन्न दो उत्तराधिकारी भयभीत थे कि यदि लड़का हुआ, तो उनका अधिकार छिन सकता है।

जेम्स ने किसी प्रकार की शंका से बचने के लिए प्रसव कक्ष गवाहों से भरा। पर विडंबना यह रही कि जिस दाई को प्रसव में सहायता के लिए बुलाया गया था, उसके पहुंचने से पहले ही शिशु जन्म ले चुका था। वह बच्चा वास्तव में लड़का था। लेकिन अफवाह यह फैली कि शिशु ‘समयपूर्व जन्मा’ है और वास्तव में शाही खून से नहीं है। कहते हैं, विरोधियों ने यह कथा गढ़ी कि एक आम शिशु को प्रसव कक्ष में गुपचुप तरीके से लाकर रानी की संतान घोषित कर दिया गया। यही शंका, यही अविश्वास अंततः उन घटनाओं की जड़ बना जो ‘ग्लोरियस रिवॉल्यूशन’ के नाम से जानी गई। नतीजा, जेम्स द्वितीय को गद्दी से हटा दिया गया। इस घटना ने एक बार फिर यह साबित किया कि उस दौर में प्रसव कोई निजी घटना नहीं था, बल्कि सत्ता की नींव हिलाने या बचाने का राजनीतिक हथियार बन चुका था।

मध्यकालीन यूरोप में प्रसव किसी स्त्री के लिए सिर्फ एक शारीरिक संघर्ष नहीं था, बल्कि एक ‘रिलीजियस दंड’ की तरह था। उस दौर की रिलीजियस मान्यताओं ने महिलाओं पर यह कठोर बंधन लगाया था कि वे प्रसव की पीड़ा कम करने के लिए किसी भी दवा या उपाय का सहारा नहीं ले सकतीं। उन्हें दर्द में तड़पते हुए ही संतान को जन्म देना होता था। रैंडी हटर एपस्टीन अपनी पुस्तक ‘Get Me Out: A History of Childbirth from the Garden of Eden to the Sperm Bank’ में लिखती हैं कि उस समय सोचने का नजरिया बाइबिल से तय होता था। इसके पीछे मान्यता थी कि ईश्वर ने ईव को आदम को बहकाने और आज्ञा न मानने के दंडस्वरूप शाप दिया था कि वह संतान को केवल पीड़ा सहकर ही जन्म देगी। यानी पीड़ा सहना स्त्रियों का रिलीजियस कर्तव्य माना गया।

इतिहास इस अंधविश्वास की क्रूर परिणति भी दिखाता है। साल 1591 में युफेम मैकलेन नामक महिला को इसलिए जिंदा जला दिया गया, क्योंकि उसने अपने जुड़वां बच्चों के जन्म के समय सिर्फ यह साहस किया था कि दर्द कम करने के लिए राहत मांगी जाए। उसके लिए यह ‘ईश्वर के आदेश के विरुद्ध विद्रोह’ और ‘पाप’ था। विडंबना यह है कि जब उन्नीसवीं सदी में एंटीसेप्टिक्स की खोज हो चुकी थी और विज्ञान ने पीड़ा कम करने के कई साधन तैयार कर लिए थे, तब भी प्रसव को छोड़ दिया गया। उन्हें केवल सर्जिकल प्रक्रियाओं में प्रयोग किया जाने लगा। प्रसव को फिर भी ‘दिव्य पीड़ा’ का हिस्सा मानकर अछूता रखा गया।

यहां तक कि जब 19वीं शताब्दी में एंटीसेप्टिक्स की खोज कर ली गई थी, फिर भी उन्हें केवल सर्जरी में इस्तेमाल करने पर बात की जाती थी, न कि प्रसव प्रक्रिया में। रिलीजियस आदमियों और महिलाओं का यह विश्वास था कि शिशु के जन्म के समय पीड़ा होना एक हेवनली अर्थात् परमात्मा के प्रति उत्तरदायित्व है।

कुल मिलाकर मध्यकालीन यूरोप की चमक-दमक के पीछे स्त्रियों के लिए घोर अन्याय और पीड़ा छिपी थी। प्रसव, जो जीवन का सबसे पवित्र और व्यक्तिगत अनुभव होना चाहिए था, उसे दरबार और रिलीजन ने अपमान व तमाशे में बदल दिया। यह इतिहास हमें सिखाता है कि किसी भी समाज या सभ्यता की महानता उसकी ऊंची इमारतों, राजमहलों या सत्ता की चकाचौंध से नहीं आंकी जा सकती। असली मापदंड यह है कि उस समाज ने अपनी महिलाओं को कितना सम्मान, सुरक्षा और गरिमा दी। किसी भी सभ्यता की सच्ची पहचान उसकी आधी आबादी के साथ उसके व्यवहार में ही निहित होती है।

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