क्या Iran भी झुक रहा Saudi Arab-Pakistan रक्षा समझौते की तरफ? खामनेई के सलाहकार की सलाह के मायने क्या!
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क्या Iran भी झुक रहा Saudi Arab-Pakistan रक्षा समझौते की तरफ? खामनेई के सलाहकार की सलाह के मायने क्या!

ईरान खुद अपनी परमाणु कार्यक्रम नीति को लेकर अंतरराष्ट्रीय दबाव में है। ऐसे में इस तरह की साझेदारी में शामिल होने के अपने जोखिम हो सकते हैं

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
Sep 30, 2025, 12:17 pm IST
inविश्व, रक्षा, विश्लेषण
ईरान के सर्वोच्च मजहबी नेता अयातुल्ला अली खामेनेई का एक सलाहकार है मेजर जनरल याह्या रहीम सफवी

ईरान के सर्वोच्च मजहबी नेता अयातुल्ला अली खामेनेई का एक सलाहकार है मेजर जनरल याह्या रहीम सफवी

गत दिनों सऊदी अरब और जिन्ना के देश के बीच एक रक्षा समक्षौता क्या हुआ है, अनेक इस्लामी देश इसे विकसित पश्चिमी जगत पर ‘फतह’ की तरह देखने लगे हैं। हालांकि खुद को इस्लामी दुनिया का खलीफा समझने वाले तुर्किए तथा मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे मुस्लिम देशों की ओर से अभी इसके पक्ष या विपक्ष में कोई ठोस प्रतिक्रिया देखने में नहीं आई है, लेकिन जिन्ना का देश जिस प्रकार मस्जिदों की मीनारों पर चढ़कर दुनियाभर में इसका ढिंढोरा पीट रहा है, उससे साफ है कि यह समझौता उसके लिए ‘डूबते को तिनके के सहारे’ जैसा मालूम दे रहा है। पूरे विव में इस्लामी आतंक के पोषक के रूप में बदनाम हो चुका जिन्ना के देश के नेता इसे लेकर बेतुके बयान दे रहे हैं और अपने को ‘खलीफा’ साबित करने की होड़ कर रहे हैं। ऐसे में इस समझौते को लेकर ईरान से आए एक महत्वपूर्ण बयान का विश्लेषण करना समीचीन ही होगा।

क्या ईरान भी इस समझौते का हिस्सेदार होने का सपना पाल रहा है? दरअसल, ईरान के सर्वोच्च मजहबी नेता अयातुल्ला अली खामेनेई का एक सलाहकार है मेजर जनरल याह्या रहीम सफवी। उसने कहा है कि ‘तेहरान भी पाकिस्तान—सऊदी अरब रक्षा समझौते में शामिल हो तो अच्छा रहेगा।’ इस बयान के बाबत ईरान इंटरनेशनल ने जो रिपोर्ट छापी है उसमें लिखा है कि ईरानी रिवॉल्यूशनरी गार्ड (IRGC) के जनरल सफवी ने ईरान, सऊदी अरब, पाकिस्तान के साथ ही इराक को लेकर एक सामूहिक रक्षा समझौता तय करने की वकालत की है।

जिन्ना का देश जिस प्रकार मस्जिदों की मीनारों पर चढ़कर दुनियाभर में इसका ढिंढोरा पीट रहा है, उससे साफ है कि यह समझौता उसके लिए ‘डूबते को तिनके के सहारे’ जैसा मालूम दे रहा है

जिन्ना के देश ने यह रक्षा समझौता 17 सितंबर 2025 को सऊदी अरब के युवराज मोहम्मद बिन सलमान के साथ किया था। इसे ‘परस्पर सामरिक रक्षा समझौता’ कहा गया है। समझौता कहता है कि अगर किसी एक देश पर कोई हमला होता है कि उसे दोनों देशों के विरुद्ध हमला माना जाए। समझौता परस्पर रक्षा‑सहयोग, फौजी प्रशिक्षण, गुप्तचर जानकारी के लेन—देन, संयुक्त अभ्यास और प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण जैसी बातें करता है।

इन बिन्दुओं को लेकर आपरेशन सिंदूर में भारत से ताजा—ताजा पिटे जिन्ना के देश को जैसे वेंटिलेटर का सहारा मिल गया है। उसके अपरिपक्व नेता खुलेआम परमाणु धमकियां देते नजर आ रहे हैं। क्योंकि समझौते को लेकर कहा जा रहा है कि दूसरे अरब देश भी इससे जुड़ सकते हैं, उनके लिए द्वार बंद नहीं किए गए हैं। जिन्ना के देश के रक्षा मंत्री ख्वाज़ा असिफ इसीलिए शायद इसे ‘नाटो का जवाब’ तक कहने की हिमाकत कर रहे हैं।

पाकिस्तान के अंग्रेजी दैनिक द डॉन की रिपोर्ट है कि, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजेश्कियान ने समझौते पर खुशी दिखाते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा में यह कहा कि ऐसा रक्षा समझौता सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच सिर्फ एक द्विपक्षीय पहल नहीं है, बल्कि एक व्यापक क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे की शुरुआत जैसा है जिसमें पश्चिम एशिया के मुस्लिम देशों की साझेदारी हो सकती है। यानी ईरान इसे विरोधी कदम नहीं बल्कि एक संभावित अवसर के रूप में देखना चाहता है।

ध्यान रहे कि ईरान और सऊदी के बीच हाल ही साझेदारी बढ़ी है। इससे संकेत मिलता है कि दोनों की ओर से तनाव कम करने की कोशिश जारी है और सहयोग के अवसर तलाशे जा रहे हैं। उदाहरण के लिए, अप्रैल 2025 में सऊदी रक्षा मंत्री की तेहरान यात्रा में खामनेई ने कहा भी था कि दोनों देशों के बीच संबंध बेहतर हो सकते हैं, मिलकर काम किया जा सकता है। दूसरों पर निर्भर रहने से बेहतर है कि क्षेत्र के अंदर सहयोग हो।

ईरान के सर्वोच्च मजहबी नेता अयातुल्ला अली खामेनेई

कुछ अन्य मुस्लिम देश या राजनीतिक दल इस समझौते का स्वागत कर रहे हैं। जैसे पाकिस्तान के अंदर पीटीआई, जेयूआई एफ तथा अन्य समर्थक दल कहते हैं कि यह समझौता रक्षा के भावनात्मक और मजहबी महत्व को दर्शाता है, और मुस्लिम एकता की भावना को बढ़ावा देने वाला साबित होगा।

ईरान ने तो यहां तक कहा है कि इस तरह का समझौता क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता के लिए एक सकारात्मक पहल है अगर दूसरे मुस्लिम देशों की इसमें सहभागिता हो। कुछ रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि यह समझौता मुस्लिम देशों के बीच एक तरह की सुरक्षा साझेदारी की दिशा में पहला कदम हो सकता है, जिसमें यूएई, कतर जैसे खाड़ी देशों की भूमिका हो सकती है। लेकिन अभी तक ऐसा कोई सार्वजनिक निर्णय या हस्ताक्षर नहीं हुआ है।

लेकिन जहां तक ईरान के इस समझौते में शामिल होने के आसार हैं तो उस बारे में ध्यान रखना होगा कि उसके और सऊदी अरब के बीच पिछले कई वर्षों से संघर्ष और तनाव बना रहा है। ईरान शिया है और सउदी अरब सुन्नी, लिहाजा दोनों एक ही मजहबी धरातल पर नहीं खड़े हैं। इसलिए दोनों पक्षों में विश्वास बहाली के बिना एक ही
रास्ते पर चलना फिलहाल संभव नहीं लगता।

ईरान खुद अपनी परमाणु कार्यक्रम नीति को लेकर अंतरराष्ट्रीय दबाव में है। ऐसे में इस तरह की साझेदारी में शामिल होने के अपने जोखिम हो सकते हैं। इस बात को ईरान अच्छे से जानता है। इसलिए भी वह समझौते में जुड़ने की जल्दबाजी शायद न दिखाए। इस्लामी जगत में एक अन्य पहलू भी प्रभावी हो सकता है और वह है यह आशंका कि कहीं ऐसा गठबंधन क्षेत्रीय संघर्षों को न बढ़ा दे।

इसलिए तेहरान से ऐसा कोई विश्वसनीय संकेत फिलहाल नहीं है कि खामेनेई के सलाहकार की सलाह फौरन व्यावहारिक मानकर कदम बढ़ाया जाए। यह हो सकता है कि ‘मुस्लिम एकता’ के नाम पर ईरान इस समझौते की तारीफ कर रहा है लेकिन कम‑से‑कम सार्वजनिक रूप से इससे जुड़ने की बात नहीं कर रहा।

Topics: इस्लामसऊदी अरबईरानIrannuclear programsaudi arab pakistan defence dealपाकिस्तान
Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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