RSS के 100 साल: संघचालक पंडित कुंजीलाल दुबे, जिन्होंने लड़ी आजादी की लड़ाई और बाद में बने मध्य प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष
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RSS के 100 साल: संघचालक पंडित कुंजीलाल दुबे, जिन्होंने लड़ी आजादी की लड़ाई और बाद में बने मध्य प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष

कांग्रेस ने वामपंथियों और तथाकथित सेक्युलर इतिहासकारों की जमात भारत के सभी विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों में बैठा दी। उन्होंने भी बरतानिया सरकार और कांग्रेस के इतिहास को बुलंद करते हुए, सशस्त्र स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के इतिहास को क्षत - विक्षत किया और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इतिहास को विलोपित ही कर दिया।

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा — edited by Sudhir Kumar Pandey
Sep 27, 2025, 12:06 pm IST
inसंघ @100

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव राव बलिराम हेडगेवार का योगदान सर्वविदित और अविस्मरणीय है। उनके निर्देश पर स्वाधीनता संग्राम में हजारों स्वयंसेवकों ने प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से आहुतियां दीं, परन्तु अत्यंत दुःखद और दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह रहा कि उसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कांग्रेस पोषित इतिहासकारों ने रेखांकित ही नहीं किया। हद तो तब हो गई जब 30 जनवरी सन 1948 को महात्मा गांधी की हत्या का झूठा आरोप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लगाकर उसे प्रतिबंधित कर छवि धूमिल करने का दुष्कृत्य किया गया।

यह ठीक उसी प्रकार हुआ, जिस प्रकार ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध जितने भी सशस्त्र स्वतंत्रता संग्राम हुए, उनको विद्रोह, गदर, लूट, डकैती और आतंकवाद की संज्ञा दे दी गई और ब्रिटिश सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर शासन में सहभागिता कर रही कांग्रेस ने भी तथाकथित स्वाधीनता संग्राम लड़ते हुए यही विचार रखा।

कांग्रेस ने वामपंथियों और तथाकथित सेक्युलर इतिहासकारों की जमात भारत के सभी विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों में बैठा दी। उन्होंने भी बरतानिया सरकार और कांग्रेस के इतिहास को बुलंद करते हुए, सशस्त्र स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के इतिहास को क्षत – विक्षत किया और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इतिहास को विलोपित ही कर दिया।

श्रेय लेता नहीं, श्रेय देता है संघ

संघ के स्थापना के दिन से ही, संघ की यही रीति- नीति रही है, कि वह श्रेय लेना नहीं वरन् देना चाहता है और भारत को परम वैभव पर आसीन कर अपने योगदान को कभी रेखांकित नहीं करना चाहता है। यदि इतिहास में संघ को श्रेय की दृष्टि से स्थान दिया गया तो यह हमारी असफलता होगी, इसलिए संघ ने स्वाधीनता संग्राम में अपने योगदान का कभी श्रेय नहीं लिया। संघ के स्वयंसेवकों को पद और पुरस्कार की कभी लालसा भी ना रही।

स्वाधीनता संग्राम में संघ का महत्वपूर्ण योगदान

परंतु संघ शताब्दी वर्ष में संघ के बहुआयामी अवदान को लिपिबद्ध किया जाना इसलिए अपरिहार्य हो जाता है, ताकि स्वयंसेवकों के लिए सनद रहे और समय पर काम आए। महाकौशल प्रांत में हुए स्वाधीनता संग्राम में संघ का महत्वपूर्ण योगदान है,इस संदर्भ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जबलपुर नगर के प्रथम संघ चालक पंडित कुंजीलाल दुबे जी का स्वतंत्रता संग्राम से लेकर मध्य प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष तक की यात्रा का अविस्मरणीय वृतांत है।

जबलपुर के विशिष्ट अधिवक्ता कुंजीलाल दुबे

पंडित कुंजीलाल दुबे का जन्म 18 मार्च, सन् 1896 में नरसिंहपुर जिले के आमगांव ग्राम में एक सम्भ्रान्त परिवार में हुआ। रॉबर्टसन कॉलेज से स्नातक हुए और इलाहाबाद से कानून की डिग्री प्राप्त की। सन् 1920 में उन्होंने आजीविका के लिए जबलपुर में विधि व्यवसाय प्रारम्भ किया और शीघ्र ही उनकी गणना जबलपुर के विशिष्ट अधिवक्ताओं में होने लगी।

हिन्दू महासभा में शामिल हुए

आरम्‍भ से ही दुबे जी ने हिन्‍दू धर्म, संस्‍कृति, दर्शन और हिन्‍दू समाज के अभ्‍युत्‍थान में रुचि ली। सनातन धर्म में अपनी गहरी आस्‍था के कारण कुछ वर्ष पं. मदन मोहन मालवीय जी के मार्गदर्शन में काम किया। पंडित मदनमोहन मालवीय की प्रेरणा से हिन्दू महासभा में शामिल हुए। सन् 1924 में उन्हें हिन्दू महासभा की राज्य इकाई का सचिव निर्वाचित किया गया।

जबलपुर में सिमरिया कोठी से शुरू हुआ संघ कार्य

जबलपुर में वर्ष 1934 में संघ कार्यालय सिमरिया वाली कोठी में प्रारम्भ हुआ था। संघ शाखा शुरुआत चंद्रकांत ठोसर के अनुसार 6 जुलाई 1935 को हुई थी। श्री मोरु भाऊ केतकर जी के द्वारा पुराना बरफ घर वर्तमान में नर्मदेश्वर मंदिर राइट टाउन में प्रथम शाखा प्रारंभ हुई। ब्रुक बांड कंपनी में कार्यरत श्री केतकर कल्याण आश्रम का कार्यक्रम देख रहे थे। केतकर जी और उनके भाई ने संघ कार्य की शुरुआत की थी। पहले दिन 9 से 10 संख्या थी। प्रारंभ में जो स्वयंसेवक आए उनमें से कुछ नाम की जानकारी प्राप्त होती है जो क्रमशः श्री रामचंद्र ठोसर, भार्गव बंधु (जिनकी फैक्ट्री थी) और, परोलकर जी। श्री ठोसर जी के अनुसार दो-तीन माह बाद शाखा श्रीनाथ की तलैया में लगना प्रारंभ हुई। यह बाबा साहब आपके तथा दादा राव परमार्थ जी की प्रेरणा से कार्य आरंभ हुआ। सन् 1936 में प्रहलाद जी आम्बेकर पढ़ने के लिए जबलपुर आए तथा बाद में प्रचारक बने। वे सिटी कॉलेज में पढ़ते थे। सन् 1939 में एकनाथ जी रानाडे प्रथम प्रांत प्रचारक बनकर आए।

प्रथम नगर संघ चालक पंडित कुंजीलाल दुबे

सिमरिया वाली कोठी से संघ कार्यालय कृष्ण कुंज बना और शाखा लगने लगी तब प्रथम नगर संघ चालक पंडित कुंजीलाल दुबे बने थे। दूसरी शाखा गोल बाजार (वर्तमान में शहीद स्मारक) में प्रारंभ हुई। इस शाखा में 24 मार्च 1939 में परम पूज्य डॉ. हेडगेवार जी एवं परम पूज्य श्री गुरु जी आए थे, वह भी पूर्ण गणवेश में, जो उस समय का था। उस कार्यक्रम में 400 स्वयंसेवक उपस्थित थे। पंडित कुंजीलाल दुबे, श्रीराम नन्होरिया एडवोकेट तथा सर कार्यवाह मोती शंकर झा भी मौजूद थे।

भारत छोड़ो आंदोलन में जेल हुई

सन1939 के त्रिपुरी कांग्रेस अधिवेशन के अवसर पर वे वरिष्ठ नेताओं की पहल पर कांग्रेस में आए। जनवरी, 1941 में महात्मा गांधी के आह्वान पर व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लिया और छह माह का कारावास भोगा। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उन्हें 2 वर्ष की सजा हुई और 1944 में रिहा हुए।

मध्य प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष रहे

पंडित कुंजीलाल दुबे जी 1956 से 1967 तक मध्य प्रदेश विधान सभा अध्यक्ष पद पर बने रहे। वे पं. द्वारका प्रसाद मिश्र तथा पंडित श्यामाचरण शुक्ल के मंत्रि-मण्डल में वित्त मंत्री भी रहे। सन् 1964 में उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण की उपाधि से अलंकृत किया गया। नागपुर विश्वविद्यालय के उप कुलपति के रूप में सेवायें दीं, वहीं,सन् 1957 में जबलपुर विश्वविद्यालय के प्रथम संस्थापक कुलपति बने।

स्मृति में डाक टिकट जारी

विधि और ज्ञान के क्षेत्र में की गई सेवाओं के लिए जबलपुर विश्वविद्यालय ने सन् 1965 में उन्हें ‘मानद्’ एल.एल.डी की उपाधि से एवं विक्रम विश्वविद्यालय ने सन् 1967 में ‘मानद’ डी.लिट. की उपाधि से अलंकृत किया। 2 जून 1970 को उनका देहावसान हुआ। भारतीय डाक विभाग द्वारा उनकी स्मृति में एक डाक टिकट 18 मार्च, 1996 को जारी किया गया। मध्य प्रदेश शासन, संसदीय कार्य विभाग के अधीन विधान सभा के प्रथम अध्यक्ष पंडित कुंजीलाल दुबे के नाम पर, दिनांक 24.4.1998 को संसदीय विद्यापीठ की स्थापना की गई है। इसका मुख्य उद्देश्य संसदीय पद्धति एवं प्रक्रिया की जानकारी देना है। यह म.प्र. सोसायटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1973 (सन् 1973 का क्रमांक 44) के अधीन पंजीकृत संस्था है, जिसका कार्यालय भूतल, विंध्याचल भवन, भोपाल में है।

Topics: RSSकुंजीलाल दुबेप्रथम संघचालकस्वतंत्रता सेनानीजबलपुरभारतीय स्वतंत्रता संग्रामपाञ्चजन्य विशेषRSS 100 Yearsविशेषपं. कुंजीलाल दुबे
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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