‘भविष्य की शक्ति’ सत्र में केंद्रीय नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा, उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री प्रह्लाद जोशी से वरिष्ठ पत्रकार अनुराग पुनेठा और राज चावला ने बातचीत की। प्रस्तुत हैं उसके मुख्य अंश-

नवीकरणीय ऊर्जा को लेकर सरकार ने बड़े लक्ष्य तय किए हैं। इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए किस तरह की तैयारी है?
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने जब से सत्ता संभाली है, तब से वे बड़े और दूरदर्शी लक्ष्य ही तय करते हैं। उन्होंने खुद भी बड़े लक्ष्य रखे हैं और हमें भी दिए हैं। नवीकरणीय ऊर्जा के लिए हमने जो लक्ष्य तय किए हैं, उसके लिए 50 प्रतिशत कार्य हो भी चुके हैं। आज भारत की कुल स्थापित विद्युत क्षमता में से लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा नवीकरणीय ऊर्जा और गैर-जीवाश्म ईंधन ऊर्जा स्रोत से आ रहा है। यह वही लक्ष्य है, जिसे हमें 2030 तक प्राप्त करना था, लेकिन हमने इसे पांच वर्ष पहले ही प्राप्त कर लिया है। यह हमारी प्रतिबद्धता और नीतिगत दिशा का प्रमाण है।
2014 में देश में सौर ऊर्जा की स्थापित क्षमता मात्र 2.44 गीगावाट थी, जबकि आज यह आंकड़ा 123 गीगावाट के करीब पहुंच चुका है। यह वृद्धि केवल तकनीकी या पूंजीगत निवेश का परिणाम नहीं है, बल्कि नेतृत्व की दूरदृष्टि और नीति-निर्माण की स्पष्टता का परिचायक है। भारत का लक्ष्य है कि वह 2030 तक लगभग 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन ऊर्जा आधारित विद्युत उत्पादन क्षमता प्राप्त करे, जिसमें से लगभग 248 गीगावाट की अतिरिक्त क्षमता अभी और जोड़ी जानी है। आज भारत में नवीकरणीय ऊर्जा और गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता 252 गीगावाट तक पहुंच चुकी है।
सरकार ने नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन शुरू किया है और इसके लिए 2030 तक का लक्ष्य रखा गया है। क्या इसे समय पर हासिल कर पाएंगे?
ग्रीन हाइड्रोजन में हमारी पहली योजना थी- ‘वायबिलिटी गैप फंडिंग’ (बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को वित्तीय सहायता प्रदान करना) की, जो आवंटित हो चुकी है। ग्रीन हाइड्रोजन से ही ग्रीन अमोनिया बनता है और हाल ही में हमने इसके लिए भी टेंडर मंगाए हैं। इसमें दुनिया की सबसे कम दर भारत में आई है। ऐसे में बाकी सब इलेक्ट्रोलाइजर (एक ऐसा उपकरण, जो बिजली का उपयोग करके पानी (H₂O) को उसके घटक तत्वों- हाइड्रोजन (H₂) और ऑक्सीजन (O₂) में विभाजित करने की प्रक्रिया करता है) समेत अन्य चीजें शुरू हो गई हैं। हमने 2030 तक 5 मिलियन मीट्रिक टन का लक्ष्य रखा है, जिसे समय पर हासिल कर लेंगे।
ग्रीन हाईड्रोजन के क्षेत्र में निजी क्षेत्रों के लिए किस प्रकार के अवसर देखते हैं?
वास्तव में सरकार तो नीतियां बनाती है, ताकि लोगों को काम करने में सहूलियत हो। इसलिए इस क्षेत्र में सरकार के काम कम ही हैं। नवीकरणीय ऊर्जा के लिए निजी उद्यमी ही ज्यादा प्रयास कर रहे हैं। हमारे पास 300 दिन की सौर उर्जा होती है। पहले इसे ऐसे ही बर्बाद कर दिया जाता था, लेकिन मोदी जी के आने के बाद उसे एक चैनल के माध्यम से ऊर्जा में बदल रहे हैं। इससे आने वाले दिनों में लागत कम होने के साथ ही प्रदूषण से भी निजात मिलेगी।

जब पूरी दुनिया की आपूर्ति व्यवस्था बिगड़ी रही है, तब भारत सरकार 80 करोड़ लोगों तक मुफ्त राशन पहुंचा रही है। यह कैसे संभव हो पा रहा है?
भारत सरकार हर महीने 81 करोड़ 56 लाख लोगों के लिए 14 लाख टन अनाज बांटती है। हम कभी विदेश जाते हैं और ये आंकड़े (80 करोड़) बताते हैं तो लोग आश्चर्य करते हैं कि ये कैसे हुआ। क्योंकि, पूरे यूरोपीय संघ की कुल जनसंख्या ही करीब 75 करोड़ के आसपास है। लेकिन, हम तो 80 करोड़ लोगों को नि:शुल्क राशन बांटते हैं। यह राशन कार्ड के 100 प्रतिशत डिजिटल होने से संभव हो पाया है। अनाज वितरण करते वक्त हम लोगों से अंगूठे की छाप लेते हैं, जो कि आधार से जुड़ी है। इसलिए किसे क्या दिया जा रहा है, उसे आसानी से कहीं भी देखा जा सकता है। प्रधानमंत्री मोदी तकनीक में भरोसा करते हैं और यह उनकी सफलता है। पहले अनाज की बर्बादी होती थी, लेकिन आज .017 प्रतिशत ही अनाज की काफी बर्बादी होती है। हमारे पास देश के प्रत्येक वेयरहाउस का रिकॉर्ड है। प्रधानमंत्री का संकल्प है कि गरीब को भूखा नहीं सोने देंगे और एक भी दाना अनाज बर्बाद नहीं होने देंगे।
क्या आपको लगता है कि नि:शुल्क राशन देने से सरकार के सामने भी दुविधा होगी कि फिर इसे बंद करना मुश्किल होगा? सरकार कब तक ऐसा करेगी?
हमारे देश में जो गरीब लोग हैं, उन्हें हमें अनाज देना पड़ेगा और उन्हें अति गरीबी से बाहर लाना पड़ेगा। यह हमारा संकल्प है। इसीलिए हमने इस योजना को शुरू किया था और अच्छी बात यह है कि अब तक 25 करोड़ लोग अति गरीबी से बाहर आ गए हैं। यह आंकड़ा केवल नीति आयोग नहीं, बल्कि आईएमएफ भी बता रहा है। जब तक लोग अति गरीबी से बाहर नहीं आएंगे, तब तक यह व्यवस्था चलती रहेगी। जो लोग अति गरीबी से बाहर होंगे, उन्हें तकनीक का इस्तेमाल करके इस योजना से हटाया जाएगा।
विपक्ष अक्सर सरकार पर आंकड़ों में हेरफेर करने का आरोप लगाता है। इस पर क्या कहेंगे?
आंकड़ों के साथ हेरफेर करने का तो कोई सवाल ही नहीं है, क्योंकि पहले ये आंकड़े जो एजेंसियां देती थीं, वही अब भी दे रही हैं। हमसे पहले की सरकारों के समय महंगाई दर औसत 10.5 प्रतिशत से अधिक रही, कई बार यह 18 प्रतिशत तक भी पहुंची। वहीं, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में औसत महंगाई दर 5.5 प्रतिशत से अधिक नहीं रही। और अगर कोविड महामारी और वैश्विक युद्ध जैसी असाधारण स्थितियों को भी शामिल करें, तब भी यह आंकड़ा बहुत नियंत्रित रहा है। खासकर खाद्य महंगाई की बात करें, तो औसतन यह 2.5 प्रतिशत से अधिक नहीं रही है। यह पिछले 10 वर्ष में सबसे कम और विश्व स्तर पर सबसे स्थिर दरों में से एक है। असल बात यह है कि अपने कार्यकाल के दौरान विपक्ष इसे भगवान भरोसे छोड़ देता था, लेकिन हम वैसा काम नहीं करते हैं।
महंगाई को नियंत्रण में रखने के लिए सरकार केवल मौद्रिक (आर.बी.आई. द्वारा निर्धारित ब्याज दर आदि) और राजकोषीय (वित्तीय बजट और सब्सिडी) नीतियों पर निर्भर नहीं रही, बल्कि उसने प्रशासनिक प्रबंधन को भी उतना ही मजबूत बनाया। उदाहरण के लिए, पहले जहां केवल 50 मूल्य निगरानी केंद्र थे, आज वह संख्या बढ़कर 577 हो गई है। अब हम देशभर के 577 स्थानों से 38 प्रमुख वस्तुओं की कीमतें रोजाना एकत्र करते हैं और उनका विश्लेषण करते हैं। ‘प्राइस स्टेबिलाइजेशन फंड’ की स्थापना की गई, जो पहले कभी अस्तित्व में नहीं था। अगर कीमत अधिक होती है तो सरकार बाजार से वस्तुएं खरीदती है और जरूरतमंदों को रियायती दरों पर उपलब्ध कराती है। यदि कोई इन आंकड़ों पर भरोसा नहीं करता, तो यह उसकी मानसिकता की समस्या है, न कि हमारी नीति की। उन्होंने कुछ नहीं किया तो उन्हें लगता है कि दूसरे भी कुछ नहीं करेंगे। ऐसा नहीं होता।
















