इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 16 सितंबर 2025 को उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि पुलिस रिकॉर्ड में अभियुक्त की ‘जाति’ का उल्लेख करने की प्रथा को तत्काल समाप्त किया जाए। अदालत ने कहा कि यह प्रथा संवैधानिक नैतिकता को कमजोर करती है और भारत के संवैधानिक लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती है।
प्रवीण छेत्री केस से जुड़ा है मामला
यह आदेश प्रवीण छेत्री नाम के व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया। पुलिस ने 29 अप्रैल 2023 को वाहन चेकिंग के दौरान स्कॉर्पियो की डिग्गी से 106 बोतल शराब बरामद की थी। इस मामले में प्रवीण छेत्री के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी।
याचिकाकर्ता का तर्क और पुलिस की कार्रवाई
प्रवीण छेत्री ने कोर्ट में बताया कि वे इटावा में रिश्तेदार के यहां से लौटते समय लिफ्ट लेकर स्कॉर्पियो में बैठे थे और उन्हें शराब की बोतलों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। पुलिस ने हालांकि एफआईआर में उनकी जाति ‘पहाड़ी राजपूत’ के रूप में दर्ज कर दी थी।
डीजीपी का जवाब और कोर्ट का रुख
याचिका पर सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश पुलिस महानिदेशक से शपथ पत्र मांगा। डीजीपी ने जवाब दिया कि अपराध और आपराधिक ट्रैकिंग नेटवर्क और एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के मामलों में जाति दर्ज करना आवश्यक है। लेकिन कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया।
कोर्ट ने बताया “कानूनी भ्रांति”
अदालत ने कहा कि आधार कार्ड, फिंगरप्रिंट और मोबाइल कैमरों जैसे आधुनिक पहचान उपकरणों के दौर में पहचान के लिए जाति पर निर्भरता “कानूनी भ्रांति” है। जाति का उल्लेख न केवल अनावश्यक है बल्कि संवैधानिक सिद्धांतों के खिलाफ भी है।
सरकार को दिए गए निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को दस्तावेजीकरण प्रक्रियाओं में व्यापक बदलाव करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अभियुक्तों की पहचान के लिए आधुनिक तकनीकी उपाय पर्याप्त हैं, इसलिए जाति का जिक्र तुरंत समाप्त होना चाहिए।

















