Trump ने फिर मारी Taiwan पर पलटी, रोक दी 40 करोड़ डॉलर की हथियार आपूर्ति, ये China का दबाव या सोची-समझी चाल!
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Trump ने फिर मारी Taiwan पर पलटी, रोक दी 40 करोड़ डॉलर की हथियार आपूर्ति, ये China का दबाव या सोची-समझी चाल!

ट्रंप प्रशासन ने साफ तौर पर कुछ मौकों पर ताइवान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को लेकर अस्पष्टता दर्शाई है, जो चीन को सकारात्मक संकेत देने की एक कूटनीतिक रणनीति भी हो सकती है

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
Sep 20, 2025, 12:36 pm IST
in विश्व, विश्लेषण
Representational Image

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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपने फैसलों पर पलटी मारने के लिए खासे बदनाम हो चुके हैं। अभी पिछले दिनों ही उन्होंने एक भाषण में कहा था कि वे ताइवान के साथ खड़े हैं और आने वाले दिनों में उस टापू देश को 40 करोड़ डॉलर से अधिक की सैन्य सहायता देने जा रहे हैं। लेकिन अब ताजा जानकारी के अनुसार, ट्रंप ने अपने उस फैसले पर ‘यू टर्न’ लेते हुए हथियार दिए जाने के आदेश को पारित करने से इनकार कर दिया है। यहां ध्यान रहे कि जल्दी ही उनके और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच एक अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलन में मुलाकात होने की संभावना है। इस बेहद चर्चित संभावित भेंट से पूर्व ट्रंप का इस तरह का फैसला स्वाभाविक तौर पर यह दर्शाता है कि इसके पीछे कहीं न कहीं चीन को संतुष्ट करने की इच्छा है जिसके लिए फिलहाल ‘ताइवान के पाले में खड़े दिखना जरूरी है’।

ट्रंप ने पहले ‘वन चाइना पॉलिसी’ पर ‘पुनर्विचार’ की बात की थी, लेकिन फिर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात के बाद उन्होंने इसे स्वीकार किया था (File Photo)

चीन ताइवान को लेकर दावा ठोंकता आ रहा है कि वह उसकी ‘मुख्य भूमि का हिस्सा है और ‘वन चाइना’ नीति के तहत एक दिन उसके साथ एक सार हो जाएगा’। दुनिया जानती है कि ताइवान में अपनी एक सरकार है और वहां के नागरिक राष्ट्रभक्त हैं। वे चीन के इस दावे को झुठलाते हैं और ताइवान की एक संप्रभु राष्ट्र के नाते जतन से सुरक्षा करते हैं।

अमेरिका—ताइवान के बीच हथियारों की आपूर्ति पर चीन वार्ता पर विशेषज्ञों का कहना है कि वह पैकेज 40 करोड़ डॉलर से अधिक की कीमत का था और ताइवान को दी गई पिछले सहायताओं की तुलना में ‘ज्यादा मारक हथियारों’ वाला था। इसके तहत शस्त्र और अत्याधुनिक ड्रोन शामिल थे। उधर व्हाइट हाउस के प्रवक्ता ने कहा कि ताइवान के सहायता पैकेज पर निर्णय को अभी अंतिम रूप नहीं दिया गया है। ताइवान के विदेश मंत्रालय ने कल इस मुद्दे पर सीधी टिप्पणी तो नहीं की, बस इतना कहा कि ‘ताइवान और अमेरिका सुरक्षा से जुड़े मुद्दे सहित कई विषयों पर निकट सहयोग बनाए हुए हैं। अमेरिका ने लंबे समय से ताइवान को अपनी रक्षा क्षमताओं को बढ़ाने में सहयोग दिया है।’

यहां इस विषय पर विश्लेषण करें तो ध्यान में आता है कि ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति कई मामलों में धुंधलके से भरी रही है। भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने की अभी तक अमेरिका कोई ठोस वजह नहीं बता पाया है सिवाय यह कहने के कि रूस से तेल लेने के कारण भारत के साथ यह किया जा रहा है।

ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-ते: ताइवान को लेकर अमेरिकी नीति पर वैश्विक स्तर पर कई सवाल उठे हैं (File Photo)

इसी प्रकार एशिया-प्रशांत क्षेत्र, विशेषकर ताइवान को लेकर अमेरिकी नीति पर वैश्विक स्तर पर कई सवाल उठे हैं। एक ओर ट्रंप प्रशासन चीन के खिलाफ कड़े आर्थिक कदम उठाता दिखा, तो वहीं दूसरी ओर अब ताइवान को हथियार देने के वायदे को ठंडे बस्ते में डालना का उसका इरादा संकेत देता है कि अमेरिका शायद चीन के दबाव में आकर ताइवान से दूरी बनाने की कोशिश में है।

ऐतिहासिक रूप से, अमेरिका और ताइवान के संबंध द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही मजबूत रहे हैं। 1979 में अमेरिका ने आधिकारिक रूप से चीन को मान्यता दी और ‘वन चाइना पॉलिसी’ को स्वीकार करते हुए ताइवान से औपचारिक राजनयिक संबंध समाप्त कर दिए। इसके बावजूद, ‘ताइवान रिलेशंस एक्ट’ के अंतर्गत अमेरिका ने ताइवान की रक्षा और सुरक्षा सुनिश्चित करने का वादा किया, जिसमें हथियारों की बिक्री भी शामिल है।

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में राष्ट्रपति बनने के बाद ताइवान की तत्कालीन राष्ट्रपति त्साई इंग-वेन से टेलीफोन पर बात की, जो दशकों में किसी अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा ताइवान के राष्ट्रपति से पहला सीधा संवाद था। इसे अमेरिका द्वारा चीन को एक मजबूत राजनीतिक संदेश के रूप में देखा गया था। इसके बाद, ट्रंप प्रशासन ने ताइवान को आधुनिक हथियार देने की योजना की घोषणा की, जिसमें एफ-16 लड़ाकू विमान, मिसाइल तंत्र और नौसेना के उपकरण शामिल थे। इससे संकेत मिला कि अमेरिका ताइवान को चीन के बढ़ते सैन्य दबाव से बचाने के लिए प्रतिबद्ध है। उस दौरान अमेरिका और चीन के बीच ‘व्यापार युद्ध’ चरम पर था।

लेकिन आज जब ट्रंप प्रशासन शायद चीन के साथ संभावित व्यापार समझौते को प्राथमिकता दे रहा है इसलिए ताइवान को हथियार देने जैसे संवेदनशील मुद्दों से फिलहाल दूरी बनाए रखना चाहता है। लेकिन तो भी फिलहाल यह कहना सही नहीं होगा कि अमेरिका पूरी तरह चीन के प्रभाव में आ गया है और ताइवान से निर्णायक दूरी बना रहा है। अमेरिका और ताइवान के बीच समय-समय पर सैन्य अभ्यास होते रहे हैं। तो भी ट्रंप प्रशासन ने साफ तौर पर कुछ मौकों पर ताइवान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को लेकर अस्पष्टता दर्शाई है, जो चीन को सकारात्मक संकेत देने की एक कूटनीतिक रणनीति भी हो सकती है।

ट्रंप प्रशासन ने साफ तौर पर कुछ मौकों पर ताइवान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को लेकर अस्पष्टता दर्शाई

‘वन चाइना पॉलिसी’ को लेकर ट्रंप प्रशासन ने शुरू में थोड़ा विरोधाभासी रुख दिखाया था। शुरुआत में ट्रंप ने इस नीति पर ‘पुनर्विचार’ की बात की थी, लेकिन फिर आगे चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात के बाद उन्होंने इसे स्वीकार किया था। इससे पता चलता है कि ट्रंप प्रशासन इस नीति को चुनौती देने का इरादा नहीं रखता, भले ही ताइवान को लेकर कुछ ‘अनौपचारिक’ समर्थन देता रहे।

कहना न होगा कि ट्रंप प्रशासन की ताइवान नीति अवसरवादी और रणनीतिक रही है। एक ओर उसने ताइवान को समर्थन का संकेत दिया है, तो दूसरी ओर चीन के साथ संबंधों को ध्यान में रखते हुए कुछ मामलों में ताइवान से दूरी भी बनाई है। इसका उद्देश्य चीन पर दबाव बनाना और व्यापारिक फायदे हासिल करना हो सकता है। लेकिन क्या ट्रंप ऐसा व्यवहार करके चीन और ताइवान के बीच संतुलन साध पाएंगे, इस सवाल का जवाब भविष्य के गर्भ में छुपा है!

Topics: xi jingpinarms dealus china talkstaiwanचीनअमेरिकाtrumpताइवान
Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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