आधार इंफ्रा कॉन्फ्लुएंस 2025 : आयुर्वेद, योग और भारतीय संस्कृति ही है टिकाऊ विकास का सूत्र
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आधार इंफ्रा कॉन्फ्लुएंस 2025 : आयुर्वेद, योग और भारतीय संस्कृति ही है टिकाऊ विकास का सूत्र

“आधार इंफ्रा कॉन्फ्लुएंस 2025” में विशेषज्ञों ने कहा—भारत का भविष्य तभी सशक्त होगा जब आधुनिक चिकित्सा, आयुर्वेद, योग और संस्कृति मिलकर काम करें।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Sep 17, 2025, 06:52 pm IST
in पाञ्चजन्य इवेंट

दिल्ली के प्रतिष्ठित द अशोक होटल में आयोजित पाञ्चजन्य के “आधार इंफ्रा कॉन्फ्लुएंस 2025” में भारतीय संस्कृति, स्वास्थ्य और टिकाऊ विकास पर गहन मंथन हुआ। वर्ल्ड बैंक की उस रिपोर्ट का हवाला देते हुए जिसमें कहा गया कि आर्थिक विकास तभी टिकाऊ होगा जब उसमें संस्कृति और नैतिकता की गहराई हो, वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि विकास और अध्यात्म एक-दूसरे के पूरक हैं।

इस मंच पर स्वामी निजामृतानंद पुरी जी, आयुर्वेदाचार्य श्री रघुराम भट्ट जी ने जया भारती जी से अपने विचार साझा किए। चर्चा का केंद्र रहा—आयुर्वेद और योग की बढ़ती वैश्विक स्वीकृति, भारतीय संत परंपरा का स्वास्थ्य सेवाओं में योगदान, और आधुनिक एलोपैथिक चिकित्सा व आयुष पद्धतियों का पूरक संबंध।

कोविड-19 के अनुभव, 12,500 आयुष आरोग्य मंदिरों की स्थापना और योग के वैश्विक प्रसार जैसी उपलब्धियों का जिक्र करते हुए वक्ताओं ने यह संदेश दिया कि भारत का सशक्त भविष्य तभी संभव है जब आधुनिक विज्ञान, पारंपरागत चिकित्सा और आध्यात्मिक मूल्यों का समन्वय होगा।

अतिथियों का परिचय

स्वामी निजामरतानंद पुरी जी, श्रीमाता अमृतानंदमयी देवी (अम्मा) के शिष्य हैं। पिछले 32 वर्षों से करुणा, निस्वार्थ सेवा और मानवता के उत्थान हेतु अम्मा के मिशन में सक्रिय हैं। गरीबों की सेवा, शिक्षा, आपदा राहत और स्वास्थ्य सेवाओं में आपका महत्वपूर्ण योगदान है। हरियाणा के फरीदाबाद में अमृता अस्पताल और विश्वविद्यालय की स्थापना में आपकी अहम भूमिका रही है। वर्तमान में आप उत्तर भारत में अम्मा आश्रम की गतिविधियों का संचालन कर रहे हैं।

आयुर्वेदाचार्य और संस्कृत-सेवक श्री रघुराम भट्ट जी ने BAMS कोयंबटूर से और M.D. जामनगर से किया है। आप सुष्रुत आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल, तमिलनाडु मेडिकल यूनिवर्सिटी के वरिष्ठ सदस्य और NCISM के मेडिकल असेसमेंट एवं रेटिंग बोर्ड के अध्यक्ष रह चुके हैं।

भारतीय संस्कृति और स्वास्थ्य

भारतीय दर्शन का आधार है—“शरीरमाध्यम खलु धर्मसाधनम्”, अर्थात धर्म की सिद्धि तभी संभव है जब जीवात्मा स्वस्थ शरीर में है। इसलिए स्वास्थ्य और हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर धर्मसाधना का अनिवार्य हिस्सा बन जाते हैं।

प्रश्न : भारतीय संत परंपरा और अध्यात्मिक संस्थाओं ने स्वास्थ्य सेवाओं को लागू करने में कैसी भूमिका निभाई है? चुनौतियाँ क्या हैं और उनमें कितनी कमी आई है?

उत्तर (रघुराम भट्ट) :

  • आयुष मंत्रालय ने वेलनेस पर ज़ोर दिया है और अब तक 12,500 वेलनेस सेंटर पूरे भारत में स्थापित किए गए हैं।
  • लक्ष्य है कि हर गाँव और हर एलोपैथिक अस्पताल में ऐसे केंद्र हों।
  • योग पर शोध (रिसर्च) हो रहा है—CCRYN, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ योगा (पुणे) और क़ैस्वियासा यूनिवर्सिटी (बेंगलुरु) जैसे संस्थान इस पर काम कर रहे हैं।
  • आज योग को 197 देशों में मनाया जा रहा है; 25 करोड़ से अधिक लोग योग दिवस पर अभ्यास करते हैं। योग अब जीवनशैली का हिस्सा बनता जा रहा है।
  • संस्कृत का ज्ञान योग को गहराई से समझने और शोध के लिए ज़रूरी है।

योग सिर्फ़ प्राणायाम और आसनों तक सीमित नहीं है, यह बहुत गहन और आध्यात्मिक है। विदेशी संस्थाएं योग को उच्चस्तर पर रिसर्च कर रही हैं, हीलिंग मेडिटेशन के लिए ब्रेन वेवलेंथ तक का अध्ययन कर रही हैं। भारत में भी इस दिशा में अवसंरचना (इन्फ्रास्ट्रक्चर) बढ़ाने की आवश्यकता है, यद्यपि MD, B.Sc. और M.Sc. योगा जैसे कोर्स अब विभिन्न विश्वविद्यालयों में उपलब्ध हैं।

आयुर्वेद और योग : पूरक पद्धतियाँ

योग का उद्देश्य है— स्वास्थ्य की रक्षा और मोक्ष साधना; जबकि आयुर्वेद का उद्देश्य है—रोगों का निवारण। इसलिए दोनों को साथ लेकर चलना चाहिए। ऊर्जा-विकास (एनर्जी डेवलपमेंट) के शोध पर अभी और कार्य व आधारभूत ढांचा चाहिए।

अध्यात्मिक संस्थाओं की भूमिका

स्वामी निजामरतानंद पुरी जी ने कहा —

•           “यदि गुरु भक्ति है तो राष्ट्र भक्ति अपने आप होती है। जो इस मिट्टी से उपजा है, उसमें राष्ट्र के प्रति स्वाभाविक रगं होता है।

•           हम सेवा संस्था के रूप में नहीं, बल्कि गुरु के आदेश पर समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कार्य करते हैं।

•           एक व्यक्ति के भी आँसू पोंछना, उसके दुख को कम करना ही हमारे लिए सबसे बड़ा कार्य है।

आश्रम प्रेम से प्रेरित है और प्रेम का अर्थ है–एकत्व। अम्मा के जीवन में हर क्षण यही झलकता है, जिससे करोड़ों लोग प्रेरित होकर सेवा में जुड़े हैं। फरीदाबाद के अमृता अस्पताल में कैंसर वैक्सीन और जेनेटिक ट्रीटमेंट पर काम हो रहा है। हावर्ड मेडिकल टीम ने यहाँ की सुविधाओं की सराहना की है।

आयुर्वेद की चुनौतियाँ

प्रश्न : आज भी छोटी बीमारी में लोग सबसे पहले एलोपैथी (जैसे पैरासिटामोल या डोलो) की ओर क्यों जाते हैं..?

उत्तर :

•           क्योंकि आयुर्वेद बीच के समय में काफी हद तक लुप्त हो गया था।

•           अम्मा ने कहा था—“धन्वंतरि श्रद्धा का प्रतीक हैं, सुश्रुत विज्ञान का। मूर्ति सुश्रुत की लगनी चाहिए।”

•           प्राचीन काल में सुश्रुत ने प्लास्टिक सर्जरी और माइक्रो-सर्जरी तक की थी।

आज आयुर्वेद का मुख्य कार्य प्रिवेंटिव (रोग-निवारक) है —

•           लोगों को स्वस्थ रखना ताकि एलोपैथी की जरूरत ही न पड़े।

•           पहले आयुर्वेद को लेकर कानूनी अड़चनें थीं; गंभीर रोग में आयुर्वेद अपनाने पर अगर मृत्यु होती तो कानूनी कार्रवाई होती।

•           अब नियम बदले हैं, स्वीकृति (acceptability) बढ़ रही है, परंतु बदलाव जनता को अपनाकर ही संभव है।

आयुष और AIIMS : पूरक नेटवर्क

भारत में जहाँ एक ओर AIIMS जैसे आधुनिक (एलोपैथिक) स्वास्थ्य संस्थान हैं, वहीं दूसरी ओर आयुष आरोग्य मंदिरों का नेटवर्क विकसित हो रहा है।

•           AIIMS आपातकालीन स्थितियों में अधिक प्रभावी हैं।

•           आयुर्वेद और आयुष पद्धतियाँ विशेषकर लाइफस्टाइल डिसऑर्डर्स और नॉन-कम्युनिकेबल डिज़ीज़ में अधिक कारगर हैं।

कोविड-19 ने यह सिद्ध कर दिया कि आयुर्वेद और आयुष प्रणालियाँ इम्युनिटी बढ़ाने में अद्वितीय हैं।

•           कोविड के दौरान ऐसा कोई व्यक्ति नहीं था जिसने आयुष का उपयोग न किया हो।

•           इस समय से आयुर्वेद के प्रति धारणा बदली और एक “पैराडाइम शिफ्ट” शुरू हुआ।

अब तक 12,500 आयुष आरोग्य मंदिर स्थापित हो चुके हैं और 45,000 और खोलने की योजना है ताकि घर-घर तक आयुर्वेद पहुँच सके।

यह एक भ्रम है कि केवल एलोपैथी ही उपयोगी है और आयुर्वेद धीमी गति से काम करता है। सच्चाई यह है कि—

•           कई रोगों में एलोपैथी अधिक प्रभावी है,

•           कई रोगों में आयुर्वेद अधिक प्रभावी है।

उदाहरण :

•           सर्जरी में सुश्रुत के समय की प्लास्टिक सर्जरी पद्धतियाँ आज भी सर्वश्रेष्ठ हैं।

•           फिस्टुला-इन-एनो के लिए क्षारसूत्र थेरेपी का आधुनिक चिकित्सा में कोई विकल्प नहीं है।

भारत का स्वास्थ्य परिदृश्य तभी सुदृढ़ होगा जब एलोपैथी और आयुष दोनों मिलकर कार्य करें। अध्यात्म, संस्कृति और आधुनिक विज्ञान का यह संगम ही टिकाऊ विकास और समग्र स्वास्थ्य का आधार बनेगा।

प्रश्न :  2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य पर चर्चा करते हुए एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठा— आयुर्वेद को निरोग और निरामय जीवन का सशक्त साधन माना जाता है, परन्तु आम जन में अभी भी एलोपैथिक (अंग्रेज़ी) चिकित्सा पद्धति का वर्चस्व क्यों है?

उत्तर (रघुराम भट्ट) :

आयुर्वेद को मजबूत करने के दो मुख्य उपाय बताए गए:

  • जागरूकता (Awareness) बढ़ाना
  • वैज्ञानिक शोध (Evidence-based Research) को स्थापित करना

वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ आयुर्वेद को वैश्विक स्तर पर स्थापित करना आवश्यक है। कोविड-19 काल इसका बड़ा उदाहरण है—उस समय आयुर्वेद के प्रति जागरूकता बढ़ी। हाल ही में “प्रकृति परीक्षण” अभियान में केवल एक महीने में 1 करोड़ 23 लाख लोगों का परीक्षण हुआ और पाँच गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड बने।

आयुर्वेद की विशेष चिकित्सा पद्धतियाँ—क्षारसूत्र, नाड़ी परीक्षण, रक्तमोक्षण—विशेषकर जीवनशैली संबंधी रोगों जैसे डायबिटीज़, मोटापा और हाई ब्लड प्रेशर के निवारण में अत्यंत उपयोगी हैं। आज 70% से अधिक डायबिटीज़ के मामले इंसुलिन रेज़िस्टेंस से जुड़े हैं, जिन्हें आहार और जीवनशैली में बदलाव तथा आयुर्वेदिक औषधियों से ठीक किया जा सकता है।

केरल का उदाहरण उल्लेखनीय है, जहाँ लोग प्राथमिक उपचार के लिए सबसे पहले आयुर्वेद को चुनते हैं। यदि यह वहाँ संभव है, तो देश के अन्य राज्यों में भी विश्वास जाग्रत करके इसे अपनाया जा सकता है।

मेडिकल शिक्षा और मूल्य

  • चर्चा का अगला भाग चिकित्सा शिक्षा पर केंद्रित रहा। भारतीय परंपरा कहती है—“विद्या ददाति विनयम्”, यानी विद्या विनम्रता प्रदान करती है। परन्तु आज मेडिकल शिक्षा लंबी, महंगी और अत्यधिक प्रतिस्पर्धी होने के कारण प्रश्न उठता है कि क्या मानवता, करुणा और सेवा की भावना इस शिक्षा प्रणाली में पर्याप्त रूप से समाहित है?
  • वर्तमान में AICTE जैसी तकनीकी शिक्षा संस्थाओं ने Indian Knowledge Systems को ग्रेडिंग में शामिल कर मार्क्स देने की व्यवस्था की है।
  • परन्तु मेडिकल शिक्षा की नियामक संस्था NMC में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। यहाँ केवल मेडिकल एथिक्स की बुनियादी शिक्षा दी जाती है।
  • वक्ताओं ने सुझाव दिया कि भारतीय ज्ञान परंपरा और नैतिक मूल्यों को मेडिकल पाठ्यक्रम में जोड़ना चाहिए, ताकि डॉक्टर केवल जीविका अर्जक न बनें बल्कि संवेदनशील नागरिक और करुणा से परिपूर्ण चिकित्सक बन सकें।

WHO के मानक के अनुसार हर 1,000 लोगों पर 1 डॉक्टर होना चाहिए। भारत में फिलहाल लगभग 1,300 लोगों पर 1 एलोपैथिक डॉक्टर है। आयुष डॉक्टरों को जोड़ें तो यह अनुपात बेहतर होता है, परंतु ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी डॉक्टरों की कमी है।

2014 से अब तक एलोपैथी और आयुष दोनों के मेडिकल कॉलेजों और सीटों की संख्या लगभग दोगुनी हो चुकी है। भविष्य में और विस्तार की ज़रूरत है ताकि हर पंचायत स्तर पर आयुष और एलोपैथिक दोनों पद्धतियाँ उपलब्ध हों।

मार्केट ड्रिवन हेल्थकेयर और चुनौतियाँ

जब शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ बाज़ार की ताकतों से संचालित होती हैं, तो करुणा और सेवा के भारतीय मूल्य पीछे छूट जाते हैं और फ़ोकस लाभ (Profit Maximization) पर चला जाता है।

सरकार अकेले सभी जरूरतें पूरी नहीं कर सकती, इसलिए निजी क्षेत्र की भागीदारी अनिवार्य है। परन्तु निजी अस्पतालों में कॉर्पोरेट चेन के बढ़ते प्रभाव से इलाज की लागत बढ़ती है और डॉक्टरों पर लक्ष्य (Target) आधारित दबाव बढ़ सकता है।

एक उदाहरण दिया गया कि अमृता अस्पताल में डॉक्टरों का चयन 2.5–3 साल की लंबी प्रक्रिया से होता है ताकि केवल वही लोग आएं जिनके भीतर सेवा और करुणा का भाव हो। यहाँ डॉक्टर “टार्गेट-ड्रिवन” नहीं बल्कि रोगी-केंद्रित होते हैं।

करुणा और सेवा : व्यक्ति व शिक्षा

स्वामी निजामृतानंद पुरी जी ने कहा— “हमारे शास्त्रों में कहा गया है— औषध, अन्न और विद्या का व्यापार नहीं होना चाहिए। आयुर्वेद में वैद्य गुणों में कहा गया है— मैत्री कारुण्य:। अर्थात डॉक्टर में मित्रवत् व्यवहार और करुणा का गुण होना अनिवार्य है।”

यह गुण केवल व्यक्तिगत संकल्प नहीं, बल्कि शिक्षा प्रणाली का हिस्सा भी होना चाहिए। जैसे AICTE ने वैल्यूज़ पर एक पेपर रखा है, वैसे ही मेडिकल एजुकेशन में भी यह अनिवार्य किया जाना चाहिए।

भारतीय और पाश्चात्य दृष्टिकोण

पश्चिम की चिकित्सा पद्धति (Allopathy) मुख्यतः रोग-उपचार केंद्रित है, जबकि भारत का दर्शन जीवन और स्वास्थ्य की समग्रता पर आधारित है। आयुर्वेद, योग और पंचकर्म का लक्ष्य है—रोग से पहले स्वास्थ्य को संतुलित रखना।

इस दृष्टि से इंटीग्रेटेड मेडिसिन (एकीकृत चिकित्सा) का विचार उभरा है।

  • राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2020, NMC Act और NCISM Act में संयुक्त आयोग (Joint Commission) की बैठकों के माध्यम से इंटीग्रेटिव अप्रोच पर ज़ोर दिया गया है।
  • जिपमर ने एक संयुक्त पाठ्यक्रम तैयार किया है, हालांकि यह अभी प्रारंभिक अवस्था में है।

सभी चिकित्सा पद्धतियों—आयुर्वेद, सिद्ध, यूनानी, होम्योपैथी, एलोपैथी—में अधिकांश विषय समान हैं; केवल कुछ अंतर हैं। रोगी और रोग समान हैं, औषधियाँ भिन्न हो सकती हैं, पर लक्ष्य एक है—रोग निवारण। इसलिए इंटीग्रेटिव अप्रोच रोगियों के लिए सुविधाजनक होगी।

आयुष का ग्रामीण विस्तार

  • वर्तमान में 3,800 आयुष अस्पताल और 36,000 आयुष डिस्पेंसरी कार्यरत हैं।
  • राष्ट्रीय आयुष मिशन के तहत चार हजार करोड़ रुपये का बजट आवंटित है, जिसका प्रमुख हिस्सा प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए है।
  • फिर भी ग्रामीण क्षेत्रों में और अधिक बजट, मानव संसाधन और इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता है।

निवेश और वैश्विक मान्यता

  • आयुष क्षेत्र का राजस्व 2014 में 3 बिलियन डॉलर था, जो 2024 में बढ़कर 18.1 बिलियन डॉलर हो चुका है।
  • 30 देशों में आयुष प्रणाली को आधिकारिक मान्यता मिली है और 150 देशों को आयुष औषधियाँ निर्यात की जा रही हैं।
  • WHO ने जामनगर में ग्लोबल सेंटर फॉर ट्रेडिशनल मेडिसिन स्थापित किया है, जो भारत की वैश्विक उपलब्धि है।

भारत में लगभग 900 आयुष शिक्षण संस्थान हैं, जिनमें से लगभग 105 सरकारी और शेष निजी हैं। निजी क्षेत्र का योगदान यहाँ उल्लेखनीय है, पर सरकारी संस्थानों को भी और मज़बूती दी जानी चाहिए। सरकार AIIMS की तरह All India Institute of Ayurveda, यूनानी, सिद्ध, होम्योपैथी और ITRA जामनगर जैसे राष्ट्रीय संस्थानों का नेटवर्क लगातार बढ़ा रही है।

प्रभाव और भविष्य

इन संस्थानों के विकास से भारत के स्वास्थ्य ढाँचे में गहरा असर होगा:

  • पारंपरिक औषधीय पौधों पर शोध को बल मिलेगा।
  • 40,000 औषधीय पौधों में से वर्तमान में केवल लगभग 4,000 का औषधीय उपयोग ज्ञात है; यह शोध नई दवाओं के विकास का मार्ग खोलेगा।
  • साक्ष्य-आधारित पारंपरिक चिकित्सा को मजबूत कर भारत वैश्विक स्वास्थ्य मानचित्र पर अग्रणी बनेगा।

भारतीय संस्कृति और सेवा का दृष्टिकोण

स्वामी विवेकानंद, दयानंद सरस्वती और विनोबा भावे जैसे संतों ने शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों में सेवा को केंद्र में रखा।

स्वामी निजामृतानंद पुरी जी ने कहा— “संस्कृति कोई अलग विषय नहीं, बल्कि जीवन की शैली है, जो मनुष्य को मनुष्य बनाती है। कीड़े-मकौड़े भी खाते-पीते हैं और मर जाते हैं; मनुष्य को अलग बनाती है उसकी धर्म-आधारित संस्कृति।

चर्चा का सार

स्वामी निजामृतानंद पुरी जी, आयुर्वेदाचार्य रघुराम भट्ट जी की जया भारती जी से हुई इस चर्चा का निष्कर्ष यही रहा कि भारत का स्वास्थ्य और विकास मॉडल तभी स्थायी और सशक्त होगा जब— आधुनिक एलोपैथिक चिकित्सा और पारंपरिक आयुष पद्धतियाँ मिलकर काम करें, चिकित्सा शिक्षा में करुणा और भारतीय मूल्य अनिवार्य बनाए जाएँ, और भारतीय संस्कृति का सेवा-भाव हर क्षेत्र की नींव बने।

 

Topics: WHO Global Centre JamnagarIntegrated MedicineAyurveda market growthAyurvedayogaYoga DayIndian CultureSustainable developmentAYUSH
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