किर्गिस्तान वैसे तो इस्लामिक बहुल राष्ट्र है, लेकिन यहां पर कट्टरता का निशान बहुत ही कम है। इसका कारण है यहां की सरकार द्वारा कट्टरता पर नियंत्रण। मुस्लिम बहुल राष्ट्र होने के बाद भी किर्गिस्तान एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। अब इस्लामिक कट्टरता और उग्रवाद से निपटने के लिए यहां की सरकार ने एक और बड़ा कदम उठाया है। सोमवार को यहां देश की पहली सरकारी इस्लामिक अकादमी का उद्घाटन किया।
नई अकादमी का उद्देश्य
उत्तरी शहर तोकमोक में स्थापित यह अकादमी 400 छात्रों को समायोजित कर सकती है। इसका मुख्य लक्ष्य “उद्देश्यपूर्ण धार्मिक शिक्षा” की बढ़ती जरूरत को पूरा करना है। किर्गिस्तान के अधिकारियों का कहना है कि यह अकादमी युवाओं को सही इस्लामिक शिक्षा देकर उन्हें कट्टरपंथी विचारधारा से बचाने में मदद करेगी। यह कदम देश में धार्मिक उग्रवाद के बढ़ते खतरे को देखते हुए उठाया गया है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चुनौती बन रहा है।#
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उग्रवाद का खतरा
पूर्व सोवियत गणराज्यों में, खासकर मध्य एशिया में, सोवियत संघ के विघटन के बाद से इस्लाम में एक नई उभरती रुचि देखी गई है। सोवियत काल में राज्य द्वारा नास्तिकता को बढ़ावा दिया जाता था, लेकिन उसके बाद धार्मिक जागरूकता बढ़ी। किर्गिस्तान और पड़ोसी देशों ने 2013-2015 के दौरान दाएश (ISIS) के उभार के समय अपने हजारों नागरिकों के आतंकी समूहों में शामिल होने के बाद उग्रवाद विरोधी उपायों को और सख्त कर दिया।
धार्मिक नियम और प्रतिबंध
किर्गिस्तान ने धार्मिक प्रथाओं पर कुछ सख्त नियम लागू किए हैं। देश में नकाब (इस्लामिक पूर्ण चेहरा ढकने वाला घूंघट) पहनने पर प्रतिबंध है और पुरुषों को केवल छोटी दाढ़ी रखने की अनुमति है। इस साल की शुरुआत में, बिश्केक ने मस्जिदों के निर्माण पर सीमाएं लगाने की घोषणा की और मुख्य रूप से दक्षिणी क्षेत्र में, जो अधिक धार्मिक माना जाता है, दर्जनों मस्जिदों को बंद कर दिया।
राष्ट्रीय सुरक्षा पर जोर
राष्ट्रपति सादिर जापारोव ने कहा कि धार्मिक उग्रवाद का बढ़ता खतरा न केवल किर्गिस्तान बल्कि पूरे मध्य एशिया के लिए खतरा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा को कमजोर करता है और हिंसा पर आधारित विचारधाराओं को बढ़ावा देता है। इस अकादमी के जरिए सरकार का लक्ष्य युवाओं को सही दिशा में मार्गदर्शन देना और समाज में संतुलन बनाए रखना है।

















