पाञ्चजन्य आधार इंफ्रा कॉन्फ्लुएंस 2025 (Panchjanya Aadhar Infra Confluence 2025) के ‘दिल्ली-एनसीआर, संभावनाएं अपार’ सत्र को संबोधित करते हुए केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी आर पाटिल ने अनुराग पुनेठा जी से विस्तृत चर्चा की।
जल शक्ति मंत्रालय के कार्यों और आपके विज़न को लेकर देश में गंभीर चर्चा हो रही है। हाल ही में एक वीडियो सामने आया है जिसमें स्वयं प्रधानमंत्री ने ग्राउंडवाटर के क्षेत्र में आपकी सक्रिय भूमिका की सराहना की है। आपके नेतृत्व में मंत्रालय की फंडिंग, लक्ष्यों और उपलब्धियों को लेकर लगातार मीडिया में कवरेज हो रही है। ऐसे में बतौर जल शक्ति मंत्री, जल वितरण, राज्यों के बीच नदी जल विवादों का समाधान, और जल संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर आपकी क्या प्राथमिकताएं हैं? आपने किन ठोस लक्ष्यों को निर्धारित किया है और उन्हें हासिल करने के लिए आपकी रणनीति क्या है?”
केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल ने कहा कि “हमारे देश में औसतन लगभग 4020 BCM वर्षा जल उपलब्ध होता है, जबकि हमारी वार्षिक जल आवश्यकता लगभग 1220 BCM मीटर है।
भारत ने 2047 तक “स्वच्छ भारत” के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाया है, जिसमें जल संचयन एक प्रमुख भूमिका निभाता है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने 6 सितंबर 2024 को सूरत में वर्चुअल रूप से संबोधित करते हुए इस बात पर बल दिया कि जल संचय केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि जन भागीदारी से एक जन आंदोलन बनना चाहिए।
जल की उपलब्धता बनाम भंडारण क्षमता: एक गंभीर अंतर
- वर्ष 2047 तक देश की जल आवश्यकता लगभग 1180 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) आंकी गई है।
- वर्तमान में देश में छोटे-बड़े मिलाकर करीब 56,000 डैम मौजूद हैं।
- इन सभी डैम्स और प्राकृतिक स्रोतों की कुल जल भंडारण क्षमता सिर्फ 750 BCM के आसपास है।
- इस हिसाब से, देश को लगभग 450 BCM जल भंडारण क्षमता की और आवश्यकता है।
- डैम निर्माण की सीमाएं और चुनौतियाँ
- हालांकि नए डैम बनाने का विचार स्वाभाविक है, लेकिन इसकी व्यवहारिकता सीमित होती जा रही है:
- लगभग सभी प्रमुख नदियों पर पहले से ही डैम बने हुए हैं या निर्माणाधीन हैं।
- एक बड़ा डैम बनाने में कम से कम 25 वर्ष का समय और 25,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च होता है।
- भूमि अधिग्रहण, किसानों का विरोध, पर्यावरणीय बाधाएं और लंबी स्वीकृति प्रक्रिया से प्रोजेक्ट में देरी और लागत दोनों बढ़ते हैं।
- इसलिए यह स्पष्ट है कि भारत के पास अब इतना समय नहीं है कि वह सिर्फ डैम निर्माण पर निर्भर रह सके।
क्या हम पानी की कमी के लिए 25 साल रुक सकते हैं?
जब देश में जल की उपलब्धता है लेकिन उसका उचित संचयन नहीं हो पा रहा है, तब समाधान तकनीकी नहीं, बल्कि सामाजिक और जन-सहभागिता आधारित होना चाहिए। यही बात प्रधानमंत्री मोदी जी ने अपने भाषण में रेखांकित की। उन्होंने कहा:
“जल संचय जन भागीदारी से जन आंदोलन में परिवर्तित होना चाहिए।” “कर्मभूमि से मातृभूमि के लिए जल संचयन में सहयोग करना चाहिए।”
जन आंदोलन की ओर पहला कदम सराहनीय पहल
प्रधानमंत्री के आह्वान के बाद पूरे देश में इसका व्यापक प्रभाव देखा गया-
33 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के 611 जिलों में यह अभियान चलाया गया।
32 लाख से अधिक छोटे-बड़े जल संरचनाएं (जैसे चेक डैम, तालाब, बावड़ी, रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम आदि) सिर्फ 8 महीनों में तैयार की गईं।

















