France protests : क्या राष्ट्रपति मैक्रों इस्तीफा देंगे? Paris सहित अनेक शहरों में सुलग रहे आक्रोश की वजह क्या!
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France protests : क्या राष्ट्रपति मैक्रों इस्तीफा देंगे? Paris सहित अनेक शहरों में सुलग रहे आक्रोश की वजह क्या!

मुद्रास्फीति, ऊर्जा की कीमतों का बढ़ना, दैनिक खर्चों में बढ़ोतरी जैसी बातों ने आम लोगों की जेब को प्रभावित किया। लोग महसूस करने लगे कि सरकार उपरोक्त समस्याओं का सामना करने में असमर्थ रही है या वे उसकी प्राथमिकता नहीं रही हैं

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
Sep 11, 2025, 12:12 pm IST
inविश्व, विश्लेषण
फ्रांस जल रहा है। अखबार की सुर्खियां वहां पैदा हुए अराजक माहौल की झलक पेश कर रही हैं

फ्रांस जल रहा है। अखबार की सुर्खियां वहां पैदा हुए अराजक माहौल की झलक पेश कर रही हैं

फ्रांस जल रहा है। अखबार की सुर्खियां वहां पैदा हुए अराजक माहौल की झलक पेश कर रही हैं। लोग सड़कों पर उतरकर आगजनी और हिंसक प्रदर्शन कर रहे हैं। राजधानी पेरिस में हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। 80 हजार पुलिस के सिपाही हालात को काबू करने में अस्फल साबित हो रहे हैं। उधर राष्ट्रपति इमानुएल मैक्रों पर इस्तीफे का दबाव बढ़ता जा रहा है। लोग सड़कों पर प्रदर्शन और आगजनी कर रहे। ताजा समाचार है कि ‘ब्लॉक एवरीथिंग’ यानी ‘हर चीज को जड़ कर दो’ का उन्माद हर शहर को जकड़ता जा रहा है। सुलग रहे नेपाल के दृश्यों के बीच सवाल है कि क्या मैक्रों सच में अपने नागरिकों का विश्वास खो चुके हैं? आखिर यह स्थिति क्यों बनी है?

दरअसल, इमानुएल मैक्रों ने 2017 में राष्ट्रपति बने थे। उसके बाद 2022 में दूसरे कार्यकाल के लिए वे पुनः चुने गए थे। उनकी कोशिश रही है फ्रांस को आर्थिक रूप से अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना, काम और पेंशन से जुड़े कानूनों में सुधार करना, सार्वजनिक ऋण को नियंत्रित करना आदि। लेकिन दूसरे कार्यकाल में उनकी स्थिति राजनीतिक तौर पर कमजोर होती गई है। इसके कुछ कारण रहे। जैसे, 2024 के यूरोपीय चुनावों में मैक्रों की पार्टी ने मजबूत बढ़त नहीं बनाई। संसद में उनका वैसा दमदार बहुमत नहीं रहा, जिसे कई विपक्षी दलों और मीडिया ने फ्रांस की राजनीति में विघटन के रूप में देखा।

राष्ट्रपति इमानुएल मैक्रों

वर्तमान विरोध और प्रदर्शनों की झड़ी किसी एक कारण का नतीजा नहीं है। इसमें बेशक, कई पहलुओं का असर साफ दिखता हैं। एक, मैक्रों की सरकार ने पेंशन प्रणाली में बदलाव करने की कोशिश की थी, विशेषकर पेंशन लेने की उम्र बढ़ाने, पेंशन योगदान या कामगार के लिए काम के वर्ष बढ़ाने जैसी बातें उसमें शामिल थीं।

ये सुधार आर्थिक दृष्टि से तर्कसंगत माने गए, कि पेंशन फंड से लोगों को ज्यादा पैसा दिया जाने लगा। काम—आयु लंबी हो रही है और सार्वजनिक खर्च बढ़ रहा है। लेकिन लोगों को यह लगा कि ये परिवर्तन ‘न्यायसंगत’ हैं, खासकर उन लोगों के लिए जो शारीरिक श्रम करते हैं।

सरकार ने कई महत्वपूर्ण कानूनों को पारित करने के लिए संसद में लंबी बहस को टालने या विशेष संवैधानिक प्रावधान (जैसे धारा 49.3) का उपयोग किया, जिससे जनता को लगा कि उनकी आवाज उतनी सुनी नहीं जा रही। उदाहरण के लिए, बिना पारंपरिक वोट के पेंशन सुधार कानून का पारित होना (संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल कर) जनता में भारी असंतोष उत्पन्न कर रहा था।

इसके अलावा, मुद्रास्फीति, ऊर्जा की कीमतों का बढ़ना, दैनिक खर्चों में बढ़ोतरी जैसी बातों ने आम लोगों की जेब को प्रभावित किया। लोग महसूस करने लगे कि सरकार उपरोक्त समस्याओं का सामना करने में असमर्थ रही है या वे उसकी प्राथमिकता नहीं रही हैं।

लोग सड़कों पर उतरकर आगजनी और हिंसक प्रदर्शन कर रहे

इस बीच गत कुछ वर्ष में मैक्रों ने कई प्रधानमंत्री बदले हैं। विपक्षी दलों में विभाजन है। संसद में किसी दल का स्पष्ट बहुमत नहीं है। ये सब मिलकर राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ाते गए। सब जानते हैं, जब सरकार स्थिर नहीं होती, तब नीतियां जल्दी जल्दी नहीं बनतीं या उनका क्रियान्वयन बाधित होता है।

फ्रांस के मजदूरों, युवाओं, सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों, पेंशनभोगी नागरिकों आदि को लगता है कि वे बदलावों के बोझ में पिस रहे हैं जबकि अमीरों या राजनीतिक कद वाले वर्ग इससे कम प्रभावित हो रहे हैं। उस देश में सामाजिक न्याय और समान अवसर की अपेक्षाएं बहुत ऊंची हैं।

विपक्षी दलों, यूनियनों, श्रम संगठनों और जमीनी स्तर के सोशल‑मीडिया अभियानों ने इस असंतोष को लामबंद किया। उनमें ‘Yellow Vest’ आंदोलन की याद ताजा है, जब बेघरी, कर‑भुगतान, ईंधन की कीमतों में वृद्धि आदि पर जनता सड़कों पर आई थी।

ऐसे अनेकविध विरोधों की झड़ी के पीछे मैक्रों के प्रति लोगों का ‘भरोसा टूटने’ की भावना भी है। लोग यह महसूस कर रहे हैं कि सरकार ने उनकी ज़रूरतें और समस्याएं पर्याप्त गंभीरता से नहीं ली हैं। वे मानते हैं कि बदलाव सिर्फ बजट कटौती और अर्थव्यवस्था को सिकोड़ने को प्राथमिकता दे रहे हैं, न कि आम जनता की भलाई को। उन्हें पारदर्शिता की कमी दिखती है, फैसले निजी‑परामर्शों, राजनीति के दबावों या राजनीतिक संतुलन बनाने की रणनीति के चलते लिए जा रहे हैं। साथ ही, जनभावना यह भी है कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं कमजोर होती जा रही हैं।

जनवरी 2025 में हुए सर्वेक्षणों में मैक्रों की विश्वसनीयता लगभग 18‑20 प्रतिशत के आसपास थी, अर्थात् लगभग 80 प्रतिशत लोग उन्हें भरोसेमंद नहीं मानते थे। एक अन्य सर्वेक्षण में लोगों का जो मत आया था उसके हिसाब से 65 प्रतिशत नागरिक उन्हें ‘खराब राष्ट्रपति’ मानते हैं और 56 प्रतिशत चाहते थे कि वे पद से इस्तीफा दे दें।

‘ब्लॉक एवरीथिंग’ यानी ‘हर चीज को जड़ कर दो’ का उन्माद हर शहर को जकड़ता जा रहा

फिलहाल तो मैक्रों ने सत्ता संभाली हुई है और फ्रांस के संवैधानिक ढांचे में राष्ट्रपति पद की शक्तियां काफी मजबूत हैं। सरकार अभी भी आर्थिक स्थिति की मुश्किलें झेल रही है, जिससे कुछ कटौती या सुधार करना लगभग अनिवार्य लगता है। इस्तीफे की मांगें तो प्रदर्शनकारी करते ही हैं, लेकिन राजनीतिक दलों या बहुमत वाले गुटों द्वारा इस बात के लिए अभी इतना दबाव नहीं है कि मैक्रों को इस्तीफा देना पड़े। लेकिन सच है कि इसका दबाव लगातार बढ़ रहा है, नीति‑निर्धारक को जन प्रतिक्रिया को नजरअंदाज नहीं कर सकते।

फ्रांस की स्थिति अकेले उस देश का मामला नहीं है, यूरोपीय संघ में फ्रांस एक प्रमुख देश है और उसके आंतरिक हालात का असर कई स्थानों पर हो सकता है। जैसे, यूरोप में राजनीति की दिशा बदल सकती है। वैकल्पिक, अधिक कट्टर‑विचारधाराएं उभर सकती हैं।

सा​थ ही यदि फ्रांस जैसा देश जिसकी अर्थव्यवस्था महत्त्वपूर्ण है, बजट घाटा, ऋण वृद्धि, निवेश में कमी जैसी चुनौतियों से जूझता है, तो यूरोप के वित्तीय जगत पर असर पड़ेगा ही। फ्रांस में नागरिकों में असंतोष पैदा होने से यूरोपीय संघ या ‘फेडरल यूरोप’ की अवधारणा को समर्थन घटेगा; लोग स्वायत्तता और राष्ट्रीय नियंत्रण को अधिक महत्व देंगे।

कहना न होगा, आने वाले दिन मैक्रों के लिए अग्नि परीक्षा के दिन होंगे। प्रदर्शनों के मद्धम पड़ने के बाद सरकार को गंभीरता से उन मुद्दों पर विचार करना होगा जो नागरिकों को लंबे समय से चुभ रहे हैं।

Topics: FranceEuropean Unionagitationमैक्रोंयूरोपफ्रांस में प्रदर्शनEmanuel Macronfrance news in hindiFrance Newsfrance protestsProtestफ्रांस
Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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