नेपाल में विदेशी दखल: पश्चिमी मीडिया और एनजीओ की भूमिका, भारत-विरोधी नैरेटिव का पर्दाफाश
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नेपाल में विदेशी दखल: पश्चिमी मीडिया और एनजीओ की भूमिका, भारत-विरोधी नैरेटिव का पर्दाफाश

विदेशी फंडिंग से संचालित एनजीओ, पश्चिमी प्रचार तंत्र और स्थानीय अलगाववादी तत्व मिलकर सोशल मीडिया और मुख्यधारा के मीडिया के जरिए भारत-विरोधी नैरेटिव फैला रहे हैं

Written byआशीष कुमार 'अंशु'आशीष कुमार 'अंशु' — edited by Sudhir Kumar Pandey
Sep 10, 2025, 04:10 pm IST
inविश्व

भारत, विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र, हमेशा अपने पड़ोसी देशों की स्थिरता और विकास के लिए प्रतिबद्ध रहा है। फिर भी, हाल के वर्षों में नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे दक्षिण एशियाई देशों में राजनीतिक अस्थिरता के बीच भारत को बदनाम करने की साजिश रची जा रही है। विदेशी फंडिंग से संचालित एनजीओ, पश्चिमी प्रचार तंत्र और स्थानीय अलगाववादी तत्व मिलकर सोशल मीडिया और मुख्यधारा के मीडिया के जरिए भारत-विरोधी नैरेटिव फैला रहे हैं।

नेपाल में विदेशी हस्तक्षेप का सच
इस बात की चर्चा है कि नेपाल में ‘हामी नेपाल’ जैसे संगठनों ने विदेशी फंडिंग (जैसे कोका-कोला, वाइबर से 20 करोड़ रुपये) के दम पर सरकार को अस्थिर करने की कोशिश की। 2025 में ओडिशा में एक नेपाली छात्रा की दुर्भाग्यपूर्ण मौत को ‘हामी नेपाल’ ने भारत को ‘दमनकारी’ ठहराकर भड़काऊ अभियान चलाया। इसी तरह, काठमांडू के मेयर बालेन शाह जैसे नेताओं ने ‘आदिपुरुष’ फिल्म जैसे मुद्दों को आधार बनाकर भारत को ‘सांस्कृतिक आक्रमणकारी’ बताया। सोशल मीडिया पर #IndiaInterference और #NepalAgainstIndia जैसे हैशटैग ट्रेंड कराए गए, जो भारत-नेपाल संबंधों को तोड़ने की साजिश का हिस्सा थे।

पश्चिमी मीडिया और एनजीओ की भूमिका

अल जजीरा और बीबीसी जैसे पश्चिमी मीडिया आउटलेट्स ने नेपाल के प्रदर्शनों को ‘युवा क्रांति’ करार दिया, लेकिन विदेशी फंडिंग के स्रोतों को छिपाया। न्यूयॉर्क टाइम्स ने बालेन शाह को ‘युवा आइकन’ बताया, पर उनके भारत-विरोधी रुख को नजरअंदाज किया। यह ‘रंग क्रांति’ का हिस्सा है, जहां यूएसएड और फोर्ड फाउंडेशन जैसे संगठन एनजीओ के जरिए अस्थिरता फैलाते हैं। बांग्लादेश में 2024 के तख्तापलट में भी यही पैटर्न देखा गया, जहां भारत को शेख हसीना का समर्थक बताकर बदनाम किया गया।

सोशल मीडिया पर फर्जी खबरें

सोशल मीडिया पर बॉट्स, ट्रोल फार्म्स और विदेशी प्रॉक्सी अकाउंट्स के जरिए फर्जी खबरें फैलाई जाती हैं। नेपाल के प्रदर्शनों के दौरान डिस्कॉर्ड ग्रुप्स में हिंसा को ‘भारतीय एजेंट्स के खिलाफ’ बताया गया। बिहार, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे सीमावर्ती राज्यों में ‘भारत ने नेपाल की जमीन हड़पी’ जैसे झूठे दावे वायरल किए गए। कालापानी जैसे ऐतिहासिक विवादों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया, जबकि भारत ने हमेशा बातचीत का रास्ता अपनाया।

भारत का योगदान और पड़ोसी प्रथम नीति

भारत ने नेपाल के साथ सांस्कृतिक, आर्थिक और रणनीतिक रिश्तों को मजबूत किया है। भारत और नेपाल के रिश्ते रोटी और बेटी वाले हैं। सांस्कृतिक समानताएं हैं। 1950 की शांति और मित्रता संधि से लेकर अब तक, भारत ने नेपाल को बुनियादी ढांचे, शिक्षा, स्वास्थ्य और आपदा राहत में अरबों डॉलर की सहायता दी। 2015 के भूकंप में भारत ने तत्काल मदद भेजी, जबकि पश्चिमी देशों की सहायता देरी से आई। नेपाल का 60% से अधिक व्यापार भारत पर निर्भर है, और कोलकाता-काठमांडू रेल लाइन जैसी परियोजनाएं भारत की देन हैं। इसके उलट, अमेरिकी दूतावासों की सक्रियता, जैसे बालेन शाह को न्योता, असली हस्तक्षेप का सबूत है।

विदेशी साजिश और सांस्कृतिक बंधन

नेपाल में अस्थिरता भारत के लिए खतरा है, क्योंकि इससे सीमा पर उग्रवाद, शरणार्थी संकट और आर्थिक नुकसान हो सकता है। लेकिन भारत की ताकत उसकी एकता और सहयोगी नीति में है। 140 करोड़ भारतीयों की आवाज और सांस्कृतिक बंधन इस विदेशी साजिश को विफल कर सकते हैं। नेपाल का भविष्य भारत के साथ है, न कि उन शक्तियों के साथ जो अस्थिरता फैलाती हैं।

Topics: विदेशी दखलहामी नेपालनेपाल में विदेशी दखलनेपालभारत विरोधी नैरेटिवNepal Gen Z protestनेपाल में प्रदर्शन
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार अंशु पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों तक मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान STEP से जुड़े रहे हैं। [Read more]
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