कतर में आईडीएफ हमलों में हमास के नेताओं के मारे जाने की खबर ने एक बार फिर से दुनिया का ध्यान इस खाड़ी देश की ओर खींचा है। इससे पहले इस्राएल—हमास संघर्षविराम वार्ता के भी अनेक दौर कतर की राजधानी दोहा में ही रखे गए थे। इस्राएली सेना के वहां हमास नेताओं को निशाना बनाते हुए हमले बोले गए थे, जिसके बाद अमेरिका की ओर से बयान आया था कि इस्राएल की तरफ से ये हमले उसकी सहमति से नहीं किए गए थे। इसके फौरन बाद कतर के प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुलरमान अल थानी का वक्त्व्य जारी हुआ कि कतर इन हमलों से घबराकर मध्यस्थता की अपनी भूमिका से मुंह नहीं मोड़ेगा। इन परिस्थितियों के बीच, विश्लेषकों के बीच बड़ा सवाल यह उभर कर आ रहा है कि आखिर कतर ने हमास के नेताओं के लिए अपने यहां ठिकाना क्यों उपलब्ध कराया? क्या इसके पीछे अमेरिका है? इससे पहले तालिबान नेता भी कतर में शरण पा चुके हैं।
खाड़ी देश कतर की मध्य पूर्व में इस भूमिका और अमेरिका के दखल को लेकर ऐतिहासिक रूप से भी अनेक मौके आए हैं जब ऐसा दिखा है कि कतर खुद को तटस्थ दिखाकर पश्चिम का विश्वास जीतता रहा है।
कतर वर्षों से ‘मध्यस्थता’ को अपनी विदेश नीति की बनाए रखे है। यह नीति एक मानक जैसी है, जिसके सूत्र उस देश के अनुसार हैं, निष्पक्ष रहना, संवाद और अंतरराष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के लिए प्रयास करना। उस देश के संविधान के अनुच्छेद 7 में भी इस बात को रेखांकित किया गया है कि कतर विवादों के शांतिपूर्ण समाधान में विश्वास रखता है और इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय शांति सुनिश्चित करना है।

दरसल कतर अपनी सिर्फ लगभग 30 लाख की आबादी और ऊर्जा में संपन्न होने के बावजूद, खुद को क्षेत्रीय और वैश्विक मंच पर प्रभावशाली बनाना चाहता है। इसके लिए उसने ‘अपने दरवाजे खुले रखने’ की नीति अपनाई हुई है यानी संघर्ष में उलझे विभिन्न पक्षों, आतंकी कहे जाने वाले संगठनों से लेकर पश्चिमी देशों तक, उसने सभी के साथ संवाद बनाये रखा है। यही वजह है कि कतर को संयुक्त राष्ट्र, अफगानिस्तान, बेनिन, यमन और लेबनान जैसे देशों के विवाद में मध्यस्थ की भूमिका निभाने का अवसर मिलता रहा है।
कतर ने 2013 में अपने यहां तालिबान का राजनीतिक कार्यालय खोलने का स्थान उपलब्ध कराया। बताया गया कि यह कदम अमेरिकी सरकार के अनुरोध पर उठाया गया था, ताकि तालिबान से बातचीत और संवाद के लिए सही माहौल बनाने में मदद मिले। तब अमेरिका और तालिबान के बीच बातचीत संभव हुई थी और अंततः 2020 में मशहूर दोहा समझौता हुआ, जिसने अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी करवाई थी।
अगस्त 2021 में जब तालिबान ने काबुल पर कब्जा किया, तब कतर की भूमिका ऐसी रही कि यह देश एक बड़ा ‘ट्रांज़िट हब’ बन गया। अफगानिस्तान से निकले लगभग 40 फीसदी लोग वाया कतर गए थे। यही वजह थी कि मार्च 2022 में, अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कतर को ‘प्रमुख गैर नाटो सहयोगी’ का दर्जा दिया था, जो सुरक्षा सहयोग की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत था।

खाड़ी देश कतर 2012 से ही हमास के राजनीतिक ब्यूरो को दोहा में जगह दिए हुई है, जिसमें खालिद मशाल, इस्माइल हानिया जैसे प्रमुख नेता शामिल रहे। इसके पीछे भी कथित तौर पर अमेरिका का अनुरोध ही था, कुछ का मानना है कि अमेरिका हमास से अप्रत्यक्ष संवाद बनाए रखने के लिए ऐसा चाहता था।
रिपोर्ट यह भी है कि कतर ने हमास को कई मौकों पर धन उपलब्ध कराया है। बताते हैं लगभग 1.8 अरब डॉलर दिए जा चुके हैं। हमास नेताओं के राशन, पानी और अन्य जरूरतें पूरी करने के साथ ही अन्य मदों पर खर्चे कतर के पैसे से ही चले थे।
हालांकि, कतर द्वारा मध्यस्थता की भूमिका को लेकर कुछ अमेरिकी और इस्राएली अधिकारी आलोचना करते रहे हैं। अमेरिका के कुछ सांसदों ने भी कतर की इस भूूमिका पर सवाल उठाए थे।
गत 9 सितंबर 2025 को इस्राएली सेना ने दोहा में हमास नेताओं पर हमला बोला। इसमें कयद क्षेत्र में हमास नेतृत्व और कतरी के एक सुरक्षा अधिकारी की मौत हुई है। यह हमला ऐसे वक्त पर हुआ है जब दोनों पक्षों के बीच शांति प्रक्रिया पर काम चल ही रहा है। वैसे, कतर ने इस हमले को अपनी संप्रभुता का उल्लंघन बताया है और अमेरिका से नाराजगी जताई है, कि उसे बहुत बाद में जाकर पता चला था कि ऐसा कोई हमला बोला गया है। उधर अमेरिका ने भी अपनी ओर से इस हमले की निंदा की और इसे कतर के साथ सुरक्षा साझेदारी और शांति प्रयासों के लिए हानिकारक बताया है।
कतर ने स्वयं को छोटे लेकिन प्रभावशाली देश के रूप में स्थापित किया है। यह अक्सर ही विवाद में उलझे पक्षों के साथ संवाद बनाए रखते हुए, पश्चिमी देशों व अन्यों के लिए मध्यस्थता का मंच उपलब्ध कराता आ रहा है। अमेरिका के लिए यह देश लाभदायक रहा है, बात चाहे तालिबान से संवाद की हो, अफगान निकासी की या हमास की हिंसक गतिविधियों को कूटनीतिक तौर पर नियंत्रण में रखना।
कतर की यह भूमिका कूटनीति की दृष्टि से कितनी ही ‘सहायक’ रही हो, लेकिन यह यह आसान नहीं रही है। एक ओर शांति वार्ता के लिए मंच उपलब्ध कराना तो दूसरी ओर हमास जैसे जिहादी सोच के समूहों को समर्थन देना। परसों वहां हुआ इस्राएली हमला साफ करता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ‘मध्यस्थ’ दिखना भी परिस्थितियों को किस हद तक पहुंचा देता है। इस ताजा घटना के बाद, अमेरिका‑कतर साझेदारी का भविष्य, उसकी मध्यस्थता की विश्वसनीयता और क्षेत्रीय स्थिरता दांव पर लगे हैं।

















