अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रवासियों को अमेरिका के लिए खतरा मानते हैं। इसलिए वह उन्हें देश से बाहर करने के लिए नए-नए तरीके इस्तेमाल कर रहे हैं। अवैध रूप से देश में घुसे प्रवासियों को डिपोर्ट करने तक तो ठीक था, लेकिन अब विदेशी छात्रों और H-1B वीजा धारकों के लिए नियमों को और सख्त करने की तैयारी शुरू कर दी गई है। इसका सबसे अधिक असर भारतीय छात्रों और कैरियर की तलाश में वहां जाने वाले लोगों पर पड़ सकता है। ऐसा इसलिए कि इस वीजा के तहत ही भारत से बड़ी संख्या में वहां लोग गए हैं।
क्या है नया नियम?
प्रवासियों को डिपोर्ट करने के लिए ट्रंप प्रशासन एक प्रस्ताव लाया है, जिसके तहत F-1 (छात्र) वीजा, J-1 (एक्सचेंज विजिटर) वीजा और I (मीडिया) वीजा की अवधि को और अधिक सीमित किया जाना है। अभी तक ये वीजा लंबे वक्त तक वैध रह सकते थे, लेकिन अब इन्हें अधिकतम चार साल (F और J वीजा) और 240 दिन (I वीजा, चीनी नागरिकों के लिए 90 दिन) तक सीमित करने की तैयारी शुरू कर दी गई है। जानकारों का कहना है कि इस नियम के चलते वहां रह रहे छात्रों या पेशेवरों को बार-बार वीजा एक्सटेंशन के लिए अप्लाई करना होगा।
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छात्रों की मुश्किलें बढ़ीं
भारत से अमेरिका में शिक्षा की चाहत में गए छात्र जो कि F-1 वीजा पर हैं, पहले से ही सख्त नियमों के कारण मुश्किलों में थे। अब तक ये नियम था कि पढ़ने गए भारतीय छात्र वहां 20 घंटे तक कैंपस में नौकरी कर सकते हैं, लेकिन कई छात्र जीविका चलाने के लिए रेस्तरां, गैस स्टेशन या दुकानों में अनधिकृत काम करते हैं। नए नियमों के तहत, अगर वे ऐसा करते पकड़े गए, तो उनका वीजा रद्द हो सकता है और उन्हें देश छोड़ना पड़ सकता है। इससे छात्रों में डर का माहौल है, खासकर उनमें जो पढ़ाई के लिए बड़े कर्ज ले चुके हैं।
H-1B वीजा धारकों की मुश्किलें
H-1B वीजा, जो ज्यादातर भारतीय आईटी पेशेवरों को मिलता है, पहले से ही ट्रम्प प्रशासन के निशाने पर है। नए नियम अनधिकृत आय या काम को आधार बनाकर वीजा रद्द करने की बात कहते हैं। इसके अलावा, H-1B वीजा की लॉटरी प्रणाली को खत्म कर वेतन-आधारित चयन पर जोर दिया जा रहा है, जिससे कम वेतन वाले पेशेवरों के लिए मौके कम हो सकते हैं। भारतीय पेशेवर, जो अमेरिका की तकनीकी कंपनियों में अहम भूमिका निभाते हैं, अब अनिश्चितता और डर के साये में जी रहे हैं।
क्यों हो रही है सख्ती?
ट्रंप प्रशासन का मानना है कि ये कदम अमेरिकी नौकरियों को बचाने और आप्रवासन नियमों को कड़ा करने के लिए जरूरी हैं। उनके समर्थक, जैसे फ्लोरिडा के गवर्नर रॉन डेसेंटिस और कॉमर्स सेक्रेटरी हॉवर्ड लुटनिक, H-1B प्रोग्राम को “स्कैम” बताते हैं, जिसका इस्तेमाल कंपनियां सस्ते विदेशी श्रम के लिए करती हैं। हालांकि, टेक दिग्गज जैसे गूगल और माइक्रोसॉफ्ट ने अपने H-1B कर्मचारियों को सतर्क रहने की सलाह दी है, क्योंकि नीतियों में बदलाव का असर उनकी जिंदगी पर पड़ सकता है।

















