खुद को दुनिया का बादशाह समझने वाला अमेरिका अब पछता रहा होगा कि उसने भारत को पाकिस्तान समझने की गलती कर दी। अमेरिका ने सोचा था कि वह 50 प्रतिशत टैरिफ लगाएगा और भारत गिड़गिड़ाते हुए ट्रंप के इशारों पर नाचने के लिए मजबूर होगा। लेकिन, हो इसका उल्टा गया। शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की बैठक में भारत, चीन और रूस की तिकड़ी ने अमेरिका को स्पष्ट संदेश दे दिया कि उसकी दादागीरी नहीं चलने वाली। भारत ने अपने लिए नए अवसर खोज लिए। इसी क्रम में अब भारत और चीन मिलकर एक ऐसा कदम उठाने की तैयारी में हैं, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था में बड़ा उलटफेर कर सकता है। खबर है कि दोनों देश मिलकर एक नया भुगतान सिस्टम विकसित करने की योजना बना रहे हैं, जो अमेरिकी डॉलर की बादशाहत को चुनौती दे सकता है। यह कदम न केवल आर्थिक बल्कि सामरिक दृष्टिकोण से भी अहम है।
क्या है नया भुगतान सिस्टम?
यह नया सिस्टम अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता को कम करने की कोशिश है। अभी दुनिया के ज्यादातर व्यापारिक लेनदेन डॉलर में होते हैं, जिससे अमेरिका को वैश्विक अर्थव्यवस्था पर जबरदस्त नियंत्रण मिलता है। भारत और चीन अब अपने व्यापार को अपनी मुद्राओं या किसी वैकल्पिक सिस्टम में करने की दिशा में बढ़ रहे हैं। इसका मकसद है कि दोनों देश अपनी अर्थव्यवस्था को और मजबूत करें और अमेरिकी प्रतिबंधों या आर्थिक दबाव से बचें। माना जा रहा है कि यह सिस्टम डिजिटल मुद्रा या ब्लॉकचेन तकनीक पर आधारित हो सकता है, जो लेनदेन को तेज और सुरक्षित बनाएगा।
भारत-चीन का सहयोग क्यों खास?
भारत और चीन के बीच सीमा विवाद और तनाव की खबरें तो आम हैं, लेकिन आर्थिक मोर्चे पर दोनों देश अब एकजुट हो रहे हैं। हाल ही में विदेश सचिव विक्रम मिस्री और चीनी उप विदेश मंत्री सुन वेइडॉन्ग की मुलाकात में इस दिशा में बातचीत हुई। दोनों देश व्यापार और आर्थिक मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने पर सहमत हुए हैं। यह सहयोग न केवल दोतरफा व्यापार को बढ़ाएगा, बल्कि वैश्विक मंच पर दोनों देशों की स्थिति को भी मजबूत करेगा।
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ब्रिक्स गठबंधन को पहले ही अपने लिए खतरा बता चुके हैं ट्रंप
इससे पहले पिछले माह जब ब्रिक्स देशों की बैठक हुई थी, उस पर डोनाल्ड ट्रंप भड़क गए थे। उन्होंने आरोप लगाया था कि ब्रिक्स एक नई करेंसी लाने की योजना पर काम कर रहा है और ये अमेरिकी डॉलर के लिए चुनौती है। ट्रंप ने इसे अमेरिका के खिलाफ आर्थिक युद्ध करार दिया था। हालांकि, एक कॉमन करेंसी को लेकर इन देशों में कुछ मतभेद अवश्य थे। लेकिन, ट्रंप के मनमाने टैरिफ ने ब्रिक्स के देशों को और अधिक करीब लाने का कार्य अवश्य किया है।

















