“तन-मन-धन पूर्वक संघ कार्य करने के लिए दृढ़-निश्चय और अखंड सावधानी के साथ जाग्रत रहने की आवश्यकता है। रोज रात में सोने से पूर्व यह विचार करते रहें कि आज मैंने अपने देश के लिए क्या किया। यह ध्यान रहे कि संघ स्थान पर नियमित रूप से प्रतिदिन उपस्थित रहने से ही हमने संघ कार्य कर लिया, ऐसा नहीं है। हमें आसेतु हिमाचल तक फैले इस विशाल हिंदू समाज को संगठित करना है। संघ के बाहर का हिंदू समाज ही हमारा वास्तविक महत्वपूर्ण कार्यक्षेत्र है। संघ की स्थापना सिर्फ संघ में आने वाले स्वयंसेवकों के लिए नहीं की गई है। जो लोग संघ से बाहर हैं, संघ उनके लिए भी है। लोगों को राष्ट्रोन्नति का मार्ग समझाना हमारा कर्तव्य है और मेरे मतानुसार वह मार्ग केवल संगठन ही है। हिंदू जाति का अंतिम कल्याण केवल संगठन के मार्ग से ही हो सकता है, यह ध्यान रहे।” ये अंश हैं डॉ. हेडगेवार के अंतिम बौद्धिक के।
यह रेखांकित करते हुए कि देश की उन्नति का एकमेव अमृतपथ केवल संगठन ही है, डॉक्टर जी ने इस पथ पर बढ़ने के लिए कुछ सूत्र दिए। वे सूत्र हैं, दृढ़ निश्चय, अखंड सावधानी, जागरूकता और तन-मन-धन पूर्वक अर्थात् अपना सर्वस्व लगा कर निरंतर सक्रियता। संघ के स्वयंसेवकों ने डॉक्टर जी के ऐसे अनेक विचार सूत्रों को अपना कर उनके शाश्वत तत्वों को आत्मसात करते हुए तथा बदलते समय की आवश्यकताओं के अनुरूप उनका कालसुसंगत भाष्य करते हुए ध्येय-समर्पित जीवन के उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। एक शताब्दी की संघ की इस अविश्रांत यात्रा पथ को इन सूत्रों के आधार पर जीवन जीते हुए हजारों निष्कंप जीवनदीपों ने आलोकित किया है।
घनीभूत प्रेम की साकार अभिव्यक्ति
डॉक्टर जी के साथ जिन्होंने काम किया था, वे कहते थे कि डॉक्टर जी घनीभूत प्रेम की साकार अभिव्यक्ति थे। वे स्वयं को ‘संघ की दाई’ कहते थे, लेकिन दरअसल वे संघ की मां ही थे। जननी और मां में अंतर होता है। जननी केवल अपने माध्यम से जन्मे अंश की ही जननी होती है, लेकिन मां के प्रेम का दायरा केवल अपने अंश तक सीमित नहीं होता। उसके प्रेम की व्याप्ति और अभिव्यक्ति का फलक बहुत विस्तृत होता है।

सह क्षेत्र कार्यवाह, मध्य क्षेत्र, रा.स्व.संघ
इस अर्थ में मां होने के लिए जननी होना जरूरी नहीं होता, बल्कि मातृभाव होना आवश्यक होता है। डॉक्टर जी का हृदय एक मां जैसा था जिसमें सारे हिंदू समाज के लिए निर्मल, निराकांक्ष और निस्सीम वात्सल्य के झरने फूटते थे। इसी प्रेम के कारण समाज की दुरावस्था से उन्हें पीड़ा होती थी। इस पीड़ा ने उनके मन में अनेक प्रश्नों को जन्म दिया और उनके उत्तर के रूप में संघ-गंगा प्रवहमान हुई। बीज रूप में प्रारंभ हुआ संघ अब विशाल वटवृक्षों का एक संकुल बन गया है। केशव-दृष्टि अब केशव-सृष्टि में बदल गई है।
आज एक शताब्दी की अखंड यात्रा के बाद भी इस सृष्टि की मूल प्रेरणा वही है, समाज के प्रति निराकांक्ष प्रेम। इसी प्रेम के कारण डॉक्टर हेडगेवार बंगाल में दामोदर नदी के बाढ़ पीड़ितों के लिए खाद्य पदार्थों की बोरी पीठ पर लाद कर दौड़ पड़े थे। उसी प्रेम ने 2020–21 में कोविड पीड़ित समाज की सहायता के लिए स्वयंसेवकों को अपने प्राण भी दांव पर लगाने की प्रेरणा दी। इसी प्रेम ने डॉक्टर हेडगेवार को गंगासागर यात्रा में हैजा फैलने पर झुग्गी-झोंपड़ियों में रहने वाले मरीजों को दवाइयां पहुंचाने के लिए प्रेरित किया था। हिंदू समाज के प्रति यही प्रेम आज असंख्य सेवा बस्तियों में चिकित्सा केंद्र चलाने के लिए स्वयंसेवकों को प्रेरित कर रहा है। इसी प्रेम ने कलकत्ता में मुस्लिम हमलावरों से त्रस्त हिंदुओं की रक्षा के लिए उन्हें सेवापथक बनाने के लिए प्रवृत्त किया था। वही प्रेम आज ग्राम-नगरों में समाज की धर्मरक्षा, ग्राम रक्षा समितियों का गठन कर ‘परित्राणाय साधुनाम’ को सार्थक कर रहा है।
घनीभूत प्रेरणा का यह बीज डॉक्टर हेडगेवार की पीड़ा में से 1925 में प्रस्फुटित हुआ और अब यह ऐसी वृक्षमालिका में बदल चुका है, जिसमें से उत्पन्न हो रहे लाखों बीज भविष्य में असंख्य वृक्ष-शृंखलाओं के विकास की आश्वस्ति दे रहे हैं। इस आश्वस्ति के मूल में है बीज के वृक्ष बनने और नई पूर्णता प्राप्त करने के लिए वृक्ष के पुनः बीज बनने की आकांक्षा। इस आकांक्षा के मूल में है हिंदू समाज को संगठित अवस्था प्राप्त करा देने की डॉक्टर जी की महदाकांक्षा और इसके मूल में है समाज को संगठित अवस्था प्राप्त करा देने का तंत्र विकसित करने का उनका संकल्प जो हिंदू समाज की दुरावस्था के कारणों की उनकी खोज का निष्कर्ष था। संगठित हिंदू समाज ही सारी समस्याओं का अंतिम समाधान है और समाज को संगठित करने के लिए विशिष्ट गुण समुच्चय से युक्त व्यक्तियों का निर्माण ही एकमात्र विकल्प है। इस निश्चय के साथ संघ का निर्माण और उसकी विकास यात्रा प्रारंभ हुई। इस एकमेव मार्ग पर बढ़ने के पाथेय स्वरूप डॉक्टर जी ने समय-समय पर सूत्र रूप में कई बातें कही हैं।
तन-मन-धन पूर्वक करें कार्य
डॉ. हेडगेवार ने आग्रहपूर्वक कहा कि हमें तन-मन-धन पूर्वक संघ कार्य करना चाहिए। संघ की प्रार्थना में जो ‘पतत्वेष कायो’ की बात कही गई है वह बड़ी गहरी और अर्थगर्भित है। यहां काया से तात्पर्य केवल भौतिक शरीर के गुणावगुणों और समर्पण से नहीं है। शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के संपूर्ण समर्पण से उसका तात्पर्य है। स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने लिखा है, ‘जे जे उत्तम उदात्त उन्नत महन्मधुर ते ते’, यानी हमारे पास जो कुछ भी श्रेष्ठ है वह सब इस देश के लिए समर्पित है। डॉ. हेडगेवार ने अपने स्वयं के उदाहरण से इसे सिद्ध किया जिससे प्रेरणा लेकर हजारों स्वयंसेवकों ने निज जीवन की लालसाओं को दरकिनार करते हुए ध्येय-समर्पित जीवन के प्रतिमान रचे हैं।
संघ कार्य कोई फुर्सत में करने का कार्य नहीं है। इसमें समय का बंधन नहीं है। इसमें समर्पण की सीमा नहीं है। यही बात केंद्र में रख कर पीढ़ी दर पीढ़ी स्वयंसेवक अपने निजी जीवन की रचना कर रहे हैं। परिवार के सुचारु संचालन के लिए आवश्यक आर्थिक व्यवस्था उन्हें कुछ इस तरह बनानी होती है कि वे संघ कार्य के लिए समय निकाल सकें। डॉक्टर जी ने बचा-खुचा समय नहीं, बल्कि समय निकाल कर संघ कार्य करने का विचार दिया है। मध्य क्षेत्र के पूर्व क्षेत्र प्रचारक स्वर्गीय भाऊसाहब भुस्कुटे गृहस्थ थे। पारिवारिक जीवन के साथ पूर्ण न्याय करते हुए उन्होंने एक आदर्श स्वयंसेवक व प्रचारक का जीवन जिया। अपनी पैतृक संपत्ति, खेतीबाड़ी और जमीन-जायदाद का संघ कार्य के अनुकूल प्रबंधन कैसे किया जा सकता है इसके वे श्रेष्ठ उदाहरण थे।
डॉक्टर जी युवकों से कहते थे, ‘’आपको दूसरे प्रांतों में जाने का अवसर छोड़ना नहीं चाहिए। इससे आप वहां अपनी शिक्षा भी पूरी कर सकेंगे और संघ कार्य भी कर सकेंगे। वे कहते थे कि पढ़ना भी संघ का कार्य है, क्योंकि आपको संघ कार्य के लिए पढ़ना है। आपको यह सोचना है कि मैं जितना ज्यादा पढ़ जाऊंगा उतना ज्यादा संघ कार्य कर सकूंगा।’’ इसी का परिणाम है कि आज अनगिनत स्वयंसेवक बड़े बड़े पैकेज छोड़ कर ऐसी नौकरियों और व्यवसायों में जा रहे हैं जिससे वे समाज-कार्य के लिए समय निकाल सकें। कहा गया है कि ‘त्यागेन एकेन अमृतत्वमानषुः’ अर्थात् जिन्होंने निजी हित-लाभ को ठोकर मार कर मानव कल्याण के लिए निरंतर परिश्रम में ही अपने जीवन की सार्थकता समझी, वे ही समाज को आगे बढ़ा सके। तन-मन-धन पूर्वक स्वयं को झोंक देने का डॉक्टर जी का विचार लाखों युवकों का जीवन-सूत्र बन गया है।
दृढ़ निश्चयी और सतत सावधान
तन-मन-धन पूर्वक काम करना कोई आसान बात नहीं है। डॉ. हेडगेवार कहते थे कि इसके लिए दृढ़ निश्चयी और सतत सावधान रहने की जरूरत है। समर्थ रामदास ने छत्रपति शिवाजी के बारे में कहा था, ‘निश्चयाचा महामेरू बहुत जनांसि आधारू।’ पर्वत की तरह अडिग व्यक्ति ही अनेक लोगों के लिए आधार-स्वरूप होता है। साधना के मार्ग में अनेक प्रलोभन, बाधाएं, आपत्तियां और विपत्तियां आती हैं। ऐसे में साधक का दृढ़ निश्चय ही उसे विचलित होने से बचाता है। स्वयंसेवकों ने अपने दृढ़ निश्चय से ही अनेक विस्मयकारी काम कर दिखाए हैं। आखिरकार संघ स्थापना के समय भी कोई अनुकूल परिस्थितियां तो थीं नहीं।
न शासन अनुकूल था और न वह समाज ही अनुकूल था जिसके उन्नयन के लिए काम शुरू किया गया था। ऐसे में एक आवाज उठी, “हां, मैं डॉक्टर केशव हेडगेवार कहता हूं कि भारत हिंदू राष्ट्र था, हिंदू राष्ट्र है और इस धरती पर जब तक हिंदू रक्त का एक भी व्यक्ति जीवित रहेगा तब तक यह हिंदू राष्ट्र ही रहेगा।” उस आवाज की अनुगूंज ने सामाजिक जीवन में राष्ट्रीयता का एक ऐसा स्वर जाग्रत किया कि आज करोड़ों लोग इसमें अपना स्वर मिला रहे हैं। गांधी हत्या के झूठे आरोप हों, विभाजन की विभीषिका हो, आपातकाल के प्रतिबंध हों या फिर वर्तमान समय में संघ के खिलाफ विषैले विमर्श स्थापित करने की साजिशें हों, स्वयंसेवकों ने अपने दृढ़ निश्चय से ही उन्हें मात दी है। महाकवि गेटे ने लिखा है, “जिसकी इच्छाशक्ति अटल और अटूट है वह विश्व को अपनी इच्छा के सांचे में ढाल लेता है।” आज भारत में यही होता हुआ हम देख रहे हैं।
डॉ. हेडगेवार ने दृढ़ निश्चय के साथ—साथ सतत सावधान रहने का भी संदेश दिया है। व्यक्ति हों, संगठन हों, समाज हो या देश हो, यदि उन्हें अपने अस्तित्व और अस्मिता की रक्षा करनी है तो सतत सावधानी या निरंतर जागरूकता उसकी अनिवार्य शर्त है। मनुष्य में अच्छी और बुरी दोनों प्रकार की प्रवृत्तियां विद्यमान रहती हैं। हमारे शत्रु और मित्र दृश्यमान भी होते हैं और अदृश्य भी। अदृश्य शत्रु ज्यादा घातक होते हैं। डॉक्टर जी ने कहा है कि अहंकार और मोह ऐसे ही शत्रु हैं। जिन्हें संगठन करना है उन्हें इन दोनों से सावधान रहना आवश्यक है। निरहंकारिता और निर्मोहत्व वे महान गुण हैं जो अंतःकरण की सारी शुद्ध भावनाओं को जाग्रत रख कर और सारी क्षुद्र भावनाओं को दूर रख कर आजीवन कार्य करने की प्रेरणा देते हैं। सतत सावधानी से अभिप्रेत है संदेहमुक्त मन, संशयमुक्त ज्ञान, निर्हेतुक कर्म तथा तत्व और व्यवहार में समानता। सतत सावधान रहे बगैर न आंतरिक शत्रुओं से बचा जा सकता है और न बाहरी। अपने यहां कहा गया है-
‘नःमण्वेकामिमां वार्ता सदाभव,
स्वयंमाणं नरं नूनं ह्याक्रमन्ति विपक्षिवः।’
अर्थात् इस शिक्षा को ध्यान से सुनो। सदा सावधान रहना चाहिए। असावधान मनुष्य पर ही प्रायः शत्रु आक्रमण करते हैं। यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमने इस गुण का मूल्य भुला दिया। विदेशी विधर्मी हमलों और आत्मविस्मृति के वायरस की वजह से भारतीय मन दीर्घकाल तक मूर्च्छा की अवस्था में रहा है। समाज एक ‘जाग्रत तन्द्रा’ से भी ग्रस्त रहा। सामाजिक जीवन में व्याप्त लापरवाही, उदासीनता, आलस्य और प्रमाद उसी के लक्षण हैं। ऐसा नहीं कि पिछले एक हजार वर्ष में हम कभी जाग्रत नहीं रहे। लेकिन समस्या यह है कि हमारा जोश रातों–रात जागता है और तुरंत ठंडा भी हो जाता है। फलतः प्रचंड विरोध, प्रतिरोध, बहिष्कार या आंदोलन जैसी परिस्थितियों का निर्माण होता है, कुछ सफलता मिलती है और समाज फिर सो जाता है। इसीलिए डॉक्टर जी ने केवल सावधानी की ओर नहीं, अपितु सतत सावधान और सतत जाग्रत रहने की ओर इंगित किया है।
संघ सबके लिए
डॉक्टर जी ने स्वयंसेवकों को चेताया है कि केवल रोज शाखा में जाने और वहां के कार्यक्रमों को भली प्रकार करने में ही अपने कर्तव्य की इतिश्री मानना अपेक्षित नहीं। वे स्मरण कराते हैं कि हमें आसेतु हिमाचल हिंदू समाज का संगठन करना है और इसलिए स्वयंसेवक के लिए वास्तविक महत्व का कार्यक्षेत्र संघ के बाहर का हिंदू समाज है। कार्यकर्ता निर्माण के साधना-केंद्र के रूप में शाखा की महत्ता निर्विवाद है लेकिन यह विचार भी महत्वपूर्ण है कि संघ यानी शाखा है, पर केवल शाखा यानी संघ नहीं है।
एक राष्ट्रपुरुष के रूप में सारा भारतवर्ष, एक समाजपुरुष के रूप में सारा हिंदू समाज और एक भौगोलिक इकाई के रूप में जहां-जहां भी हिंदू बसते हैं, वह सारा भोगौलिक क्षेत्र संघ का कार्यक्षेत्र है। संघ का काम संघ के लिए नहीं, देश के लिए है। देश का काम किसी एक संगठन को नहीं, बल्कि सारे देश को करना पड़ता है। समाज का सर्वांगीण विकास समाज की सहभागिता से ही हो सकता है। इसके लिए उसे आत्मबल, आत्मविश्वास और आत्मबोध से अनुप्राणित करना होता है। बीज रूप में व्यक्त डॉक्टर जी के यही विचार ‘केशव सृष्टि’ के विश्वव्यापी विस्तार में साकार हुए हैं।
शाखा में निर्मित ऊर्जा समाज की धमनियों में चेतना बनकर प्रवाहित हुई है। यह चेतना जहां एक ओर स्वयंसेवकों द्वारा संचालित विविध संगठनों और गतिविधियों के रूप में पुष्पित हुई, वहीं वह समाज के धार्मिक, सामाजिक, शैक्षिक व सांस्कृतिक संगठनों, सज्जनशक्ति और सात्विक समूहों के जरिए हमारे लोकशक्ति केंद्रों को भी राष्ट्रीयता के भाव से अनुप्राणित करने में सफल हुई है।
















