ऑस्ट्रेलिया में हाल के आप्रवासन विरोधी प्रदर्शनों ने भारतीय समुदाय को केंद्र में ला दिया है, जिससे वहां रहने वाले भारतीयों के बीच बेचैनी बढ़ गई है। ये प्रदर्शन ‘मार्च फॉर ऑस्ट्रेलिया’ के नाम से सिडनी, मेलबर्न, ब्रिसबेन, कैनबरा, एडिलेड, पर्थ और होबार्ट जैसे शहरों में हुए। इनमें भारतीय आप्रवासियों को खास तौर पर निशाना बनाया गया, और ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने इन्हें नस्लवादी और नव-नाज़ी विचारधारा से प्रेरित बताकर कड़ी निंदा की। आइए, इस मुद्दे को आम बोलचाल और मानवीय नजरिए से समझते हैं।
भारतीय आप्रवासियों की बढ़ती मौजूदगी
ऑस्ट्रेलिया में भारतीय मूल के लोग दूसरा सबसे बड़ा आप्रवासी समूह हैं, पहले नंबर पर ब्रिटेन के लोग हैं। ऑस्ट्रेलियाई ब्यूरो ऑफ स्टैटिस्टिक्स के मुताबिक, जून 2023 तक वहां करीब 8.45 लाख भारतीय मूल के लोग रह रहे थे। साल 2013 से 2023 के बीच भारतीय आप्रवासियों की संख्या दोगुनी हो गई। प्रदर्शनकारियों ने अपने फ्लायर्स में दावा किया कि “पांच साल में भारतीयों की संख्या ग्रीक और इतालवी आप्रवासियों की सौ साल की संख्या से ज्यादा हो गई।” उनका कहना है कि यह “सांस्कृतिक बदलाव नहीं, बल्कि पूरी तरह प्रतिस्थापन” है। ये बयान न सिर्फ भड़काऊ हैं, बल्कि भारतीय समुदाय को जानबूझकर निशाना बनाने की मंशा भी जाहिर करते हैं।
प्रदर्शनों का स्वरूप और उद्देश्य
‘मार्च फॉर ऑस्ट्रेलिया’ ने इन प्रदर्शनों को आवास की कमी, बुनियादी ढांचे पर दबाव और सांस्कृतिक बदलाव जैसे मुद्दों से जोड़ा। लेकिन उनके नारे, जैसे “हमारा देश वापस लो” और “मास माइग्रेशन बंद करो,” साफ तौर पर नस्लीय और विभाजनकारी हैं। कुछ प्रदर्शनकारियों ने ऑस्ट्रेलियाई झंडे लहराए, तो कुछ ने नस्लवादी नारे लगाए, जैसे “स्टॉप द इनवेजन।” मेलबर्न में नव-नाज़ी नेता थॉमस सीवेल ने भीड़ को संबोधित करते हुए कहा, “अगर हम आप्रवासन नहीं रोकते, तो हमारा अंत निश्चित है।” सिडनी में ‘व्हाइट ऑस्ट्रेलिया’ समूह के नेता ने भी मंच संभाला। ये घटनाएं बताती हैं कि प्रदर्शन सिर्फ नीतिगत बदलाव की मांग तक सीमित नहीं थे, बल्कि उनमें नस्लवादी और चरमपंथी तत्व भी शामिल थे।
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सरकार और समुदाय की प्रतिक्रिया
ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने इन प्रदर्शनों की कड़ी आलोचना की। प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानेस ने कहा, “ये प्रदर्शन आवास या अर्थव्यवस्था के बारे में नहीं, बल्कि समाज में विभाजन पैदा करने के लिए हैं।” गृह मंत्री टोनी बर्क ने इन्हें “ऑस्ट्रेलियाई मूल्यों के खिलाफ” बताया। मल्टीकल्चरल अफेयर्स मंत्री ऐनी ऐली ने कहा, “नस्लवाद और चरमपंथ का आधुनिक ऑस्ट्रेलिया में कोई स्थान नहीं।” सिडनी में रिफ्यूजी एक्शन कोएलिशन ने इन प्रदर्शनों को “नस्लवादी और खतरनाक” करार दिया। भारतीय समुदाय के बीच भी गुस्सा और चिंता है, क्योंकि वे खुद को अनुचित रूप से निशाना बनाया हुआ महसूस कर रहे हैं।
क्या कहते हैं प्रदर्शनकारी
प्रदर्शनकारी दावा करते हैं कि आप्रवासन की वजह से आवास संकट और बुनियादी ढांचे पर दबाव बढ़ा है। ऑस्ट्रेलिया में 2022-23 में 5.1 लाख नए आप्रवासी आए, जिनमें से कई भारतीय थे। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि आवास और बुनियादी ढांचे की समस्याएं आप्रवासियों की वजह से नहीं, बल्कि सरकारी नीतियों और योजना की कमी से हैं। भारतीय आप्रवासी, जो ज्यादातर कुशल पेशेवर या छात्र हैं, ऑस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था में योगदान देते हैं। फिर भी, प्रदर्शनकारी उन्हें “खतरे” के रूप में पेश कर रहे हैं।

















