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हिन्दुओं के लिए नर्क बना बांग्लादेश: कहानी बलात्कार और हिंसा की भयावह सच्चाई की

2025 की पहली तिमाही में बांग्लादेश में 342 बलात्कार के मामले, 87% पीड़ित नाबालिग। हिंदू महिलाओं और बच्चों पर अत्याचार की भयावह सच्चाई।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा — edited by कुलदीप सिंह
Aug 31, 2025, 11:11 am IST
in विश्व, विश्लेषण
Bangladesh Muhammad Yunus economic crisis

मोहम्मद यूनुस

बांग्लादेश में हिंदुओं के साथ जो हो रहा है और जो हुआ है, वह किसी से भी छिपा नहीं है और सबसे अधिक हैरत की बात यह है कि यह घटनाएं रुकने का भी नाम नहीं ले रही हैं। पहले कहा गया था कि शेख हसीना को हटाने का अभियान केवल शेख हसीना को हटाने तक है, फिर वह मुजीबुर्रहमान तक पहुंचा, अवामी लीग के प्रतिबंध तक पहुंचा, मगर उसके साथ ही लगातार ही हालात गैर मुस्लिमों के लिए खराब होते रहे।

हिन्दुओं के लिए नर्क बना बांग्लादेश

कहने को यह कहा गया कि यह राजनीतिक हिंसा है, मगर क्या यह वास्तव में राजनीतिक हिंसा थी या फिर मजहबी कट्टरता थी? मगर यह बात बार-बार दोहराई गई कि हिंदुओं के साथ जो हो रहा है, वह राजनीतिक कारणों से हो रहा है। परंतु क्या लगातार एक वर्ष तक यह राजनीतिक प्रतिशोध चलते रहेंगे? क्या लड़कियों के सिर विहीन शव भी राजनीतिक कारणों से मिल रहे हैं और वह भी कथित राजनीतिक सत्ता परिवर्तन के एक वर्ष बाद तक? क्या ऐसा भी राजनीतिक प्रतिशोध हो सकता है, लेकिन बांग्लादेश में अभी तक कथित प्रतिशोध चल रहा है। बांग्लादेश में गैर-मुस्लिमों या कहें हिंदुओं के साथ जो भी आचरण हो रहा है, वह निंदनीय होना चाहिए, परंतु दुर्भाग्य की बात यह है कि भारत में गाजा के लिए तो प्रदर्शन हो जाते हैं, मगर बांग्लादेश के हिंदुओं के लिए नहीं।

3 महीनों में सैकड़ों बलात्कार के मामले और मिले लड़कियों के सिर कटे शव

अभी हाल ही में एक रिपोर्ट ढाका स्थित मानवाधिकार संगठन ऐन ओ सलीश केंद्र (एएसके) ने बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों को लेकर जारी की है। इस रिपोर्ट में बहुत ही चौंकाने वाले आँकड़े दिए गए हैं। इसमें लिखा है कि 2025 की पहली तिमाही में बलात्कार के 342 मामले सामने आए हैं।

यहाँ पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि ये मामले वे हैं, जो पुलिस तक पहुंचे हैं। न जाने कितने तो मामले ऐसे होंगे, जो पुलिस तक पहुंचे भी नहीं होंगे। असंख्य लोग ऐसे होते हैं, जो पुलिस, प्रशासन और सरकार के डर के कारण पुलिस के पास जाना उचित ही नहीं समझते हैं। इससे भी बढ़कर और दुखद यह है कि जो भी मामले बलात्कार के सामने आए हैं, उनमें 87% केवल 18 वर्ष से कम उम्र की लड़कियां हैं। और नवजात से लेकर 6 वर्ष तक के 40 बच्चे भी शामिल हैं।

जो लोग पहले यह कह रहे थे कि यह और कुछ नहीं बल्कि केवल और केवल राजनीतिक प्रतिशोध की घटनाएं हैं, क्या वे यह बताएंगे कि इन लड़कियों और बच्चों से कैसा राजनीतिक प्रतिशोध? ये कैसा राजनीतिक प्रतिशोध है, जो केवल हिंदुओं के धार्मिक विश्वास पर निकल रहा है?

ये कैसा राजनीतिक प्रतिशोध है कि जिसके कारण लड़कियों और महिलाओं की सिर कटी लाशें मिल रही हैं? दरअसल यह कहना कि हिंदुओं या कहें गैर-मुस्लिमों के साथ इस प्रकार का व्यवहार होना राजनीतिक प्रतिशोध है, केवल और केवल उन कट्टरपंथी ताकतों को बढ़ावा देना है और उनकी रक्षा करना है, जो बांग्लादेश के निर्माण के समय से ही इसकी बांग्ला अस्मिता का विरोध कर रही थीं।

बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के योद्धाओं को भेजा जा रहा जेल

बांग्लादेश में मजहबी कट्टरता इस प्रकार हावी हो रही है कि अब इसके दायरे में वे लोग भी आ रहे हैं, जिन्होनें बांग्लादेश को आजाद कराने के ले लड़ाई लड़ी थी। और उन्हें और किसी आरोप में नहीं बल्कि आतंकवाद के आरोप मे जेल में भेजा जा रहा है और वह भी न्यायालय द्वारा। यह विडंबना है और यह किसी भी देश के लिए शर्म का विषय होना चाहिए, परंतु जब मुल्क के लोग ही अपने मुल्क की पहचान बदलने के लिए उतारू हो जाएं तो उसमें कुछ नहीं किया जा सकता है।

शुक्रवार को बांग्लादेश की एक अदालत ने 16 लोगों को आतंकवाद विरोधी कानून के अंतर्गत जेल भेजा, और इससे एक दिन पहले भीड़ ने राजधानी में होने वाली उनकी सभा में अराजकता फैलाई थी। और उसके बाद पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया था। पुलिस ने गुरुवार को उन्हें जनता के असंतोष से बचाने के लिए जेल में रखा था। और अब अदालत ने उन्हें आतंकवाद विरोधी कानून के चलते जेल भेज दिया है। गिरफ़्तार किए गए कम से कम छह पूर्व सैनिक 70 साल से ज़्यादा उम्र के थे। जेल भेजे गए लोगों में पूर्व मंत्री और 1971 के युद्ध के पूर्व सैनिक अब्दुल लतीफ़ सिद्दीकी, ढाका विश्वविद्यालय के क़ानून के प्रोफ़ेसर हाफ़िज़ुर रहमान कर्ज़न और पत्रकार मंज़ूरुल आलम पन्ना भी शामिल थे।

मुक्ति संग्राम के समर्थकों को बता रहे फासीवादी

दरअसल बांग्लादेश में अब जो लोग सत्ता में है वे लोग हर उस व्यक्ति को फासीवाद का समर्थक बताते हैं जिन्होंने बांग्लादेश को पूर्वी पाकिस्तान की पहचान से अलग किया था। क्योंकि हाल ही में जो पूर्व सैनिकों का मंच “मोंचो 71’ बना है, उसमें अवामी लीग का कोई भी व्यक्ति सम्मिलित नहीं था, और इसमें 1971 का मुक्ति संग्राम लड़ने वाले लोग शामिल हैं, और उन्होनें ही ढाका में एक चर्चा का आयोजन किया था, जिसे इन ताकतों ने होने नहीं दिया और भीड़ ने उस आयोजन को तहसनहस कर दिया।

बदले में उन्हीं पर आतंकवाद विरोधी कानून के चलते कार्यवाही की गई।

बांग्लादेश, जहां अब कोई भी सुरक्षित नहीं न ही हिन्दू महिला, न ही हिन्दू बच्चे और न ही पूर्व सैनिक!

 

 

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