नई दिल्ली । संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में दिल्ली के विज्ञान भवन में मंगलवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) द्वारा आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला कार्यक्रम ‘100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ के तृतीय और अंतिम दिवस पर ‘जिज्ञासा समाधान’ कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने पंच परिवर्तन, नागरिक बोध, समाज जागरण, पर्यावरण, सेवा को लेकर किए गए प्रश्न का उत्तर दिया।
प्रश्न – आपने कल पंच परिवर्तन की बात की थी। परिवारों को संस्कार कैसे दिए जा सकते हैं और नागरिक कर्तव्यों का बोध कैसे बढ़ाया जा सकता है? भारतीय समाज का जागरण कैसे किया जा सकता है? सामाजिक परिवर्तन के इस दौर में बुजुर्गों का सम्मान बना रहे, युवा नशे से दूर रहें, वैवाहिक संबंधों के बाहर के मामलों से बचें— इन चुनौतियों से कैसे निपटा जाए? धार्मिक स्थलों, कुंभ मेले और पर्यटन स्थलों में पर्यावरण और सेवा के प्रति संकल्प का भाव कैसे विकसित किया जा सकता है?
विश्वसनीयता और व्यावहारिक उपाय
उत्तर – मैं एक उदाहरण देता हूँ। अभी हाल ही के महाकुंभ मेले और पर्यटन स्थलों के संदर्भ में हमारे पर्यावरण गतिविधि विभाग ने “एक थाली, एक थैला” साथ लाने का आह्वान किया। उसे पूरे देश से बड़ा प्रतिसाद मिला और सभी अखाड़ों ने उसे स्वीकार कर लिया। ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि जिन्होंने यह आह्वान किया, उनकी विश्वसनीयता (क्रेडिबिलिटी) थी और उनका सुझाव व्यावहारिक था, जो सबके मन की समस्या का समाधान करता था। इसलिए समाज में जो विश्वसनीय लोग हैं, उन्हें ऐसे व्यावहारिक उपायों के साथ हस्तक्षेप करना चाहिए।
गणेशोत्सव और सांस्कृतिक कार्यक्रम
जैसे महाराष्ट्र में गणेशोत्सव बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। वहाँ विश्व हिंदू परिषद और अन्य संगठन लोगों को एकत्र कर राष्ट्र, संस्कृति और संस्कार से जुड़े कार्यक्रम करने का आग्रह करते हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो केवल डीजे बजते हैं, दो बार आरती होती है और लोग प्रसाद खाने आते हैं। लेकिन अगर उसके साथ कुछ भाषण, प्रतियोगिताएँ और जागरूकता बढ़ाने वाले कार्यक्रम हों, तो उससे गुणवत्ता और समझदारी दोनों बढ़ती हैं। ऐसा हम अपने-अपने स्थान पर कर सकते हैं और करना चाहिए।
संस्कार और पुस्तिकाएँ
परिवारों को संस्कार देने के बारे में मैंने कल विस्तार से बताया है। इस कार्यक्रम की एक पुस्तिका भी प्रकाशित होगी, जो आपके पास पहुँच जाएगी। उसमें उत्तर मिल जाएगा। इसके अलावा बाहर पुस्तकों का स्टॉल होगा, वहाँ हमारे भाषणों की पुस्तकें उपलब्ध होंगी। उन्हें पढ़ने से भी यह बातें स्पष्ट होंगी।
नागरिक कर्तव्य और जागरण
अब नागरिक कर्तव्यों की बात करता हूँ। नागरिक कर्तव्य उदाहरण से बनते हैं। पहले जानकारी होनी चाहिए कि नागरिक कर्तव्य क्या हैं। हमारे संविधान में प्रीएम्बल (प्रस्तावना), नागरिक अधिकार, नागरिक कर्तव्य और राज्य के नीति निर्देशक तत्व — ये चार अध्याय हैं। इन्हें मिडिल स्कूल यानी पाँचवीं कक्षा से ही पढ़ाना चाहिए ताकि सभी छात्रों को इसकी जानकारी हो। साथ ही हमें भी इन कर्तव्यों को जानकर उनका पालन करना चाहिए, तभी नई पीढ़ी सीखेगी। यही जागरण है।
जागरण का वास्तविक माध्यम
जागरण केवल उपदेश से नहीं, बल्कि उदाहरण और आत्मीयता से होता है। आत्मीयता ही माध्यम है। यह विचार हृदय से हृदय तक जाना चाहिए। जो बोलने वाला है, उसे खुद भी करके दिखाना चाहिए। यह इतना बड़ा और कठिन न हो कि लोगों को डर लगे। कार्य करते समय बस इतना दिखना चाहिए कि हम सबके पाँच कदम आगे हैं, लेकिन अलौकिक नहीं। इस प्रकार धीरे-धीरे समाज में परिवर्तन आता है और सब बातें ठीक हो जाती हैं।

















