पाकिस्तान में तेल भंडार को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दावों की पोल खुल गई है। ट्रंप के इस संबंध में बयान फर्जी साबित हुए हैं और पाकिस्तानी सेना प्रमुख को डिनर कराकर अपने रौब तले लेने की कवायद भी बेनतीजा साबित होती दिख रही है। कुछ दिन पहले ट्रंप ने दावा किया था कि पाकिस्तान में भारी मात्रा में तेल मौजूद है और अमेरिका उसका दोहन करना चाहता है। वह एक राजनीतिक बयान से अधिक एक रणनीतिक संकेत माना जा रहा था। लेकिन अब पाकिस्तान की सरकारी तेल एवं गैस कंपनी ने ट्रंप के उन दावों को खारिज कर दिया है। कंपनी के बयान के अनुसार तो यह साफ होता है कि देश के ऊर्जा संसाधनों को लेकर कोई ठोस प्रमाण या व्यावसायिक संभावना फिलहाल मौजूद नहीं है।
सब जानते हैं कि पाकिस्तान में तेल और गैस की खोज लंबे समय से चल रही है, लेकिन अब तक कोई बड़ा वाणिज्यिक भंडार नहीं मिला है। ट्रंप के बयान को कई विशेषज्ञ अमेरिकी भू-राजनीतिक रणनीति का हिस्सा मानते हैं, जिसमें ऊर्जा संसाधनों के बहाने किसी क्षेत्र में प्रभाव जमाने की कोशिश होती है।
पाकिस्तान बस नाम के लिए ही एक लोकतांत्रिक देश है। वहां की सत्ता अधिष्ठान में चलती सेना की ही है, महत्वपूर्ण निर्णयों में उसी का कहा सबसे आगे रहता है। यह कोई नई बात नहीं है। 1947 के बाद से ही पाकिस्तान की राजनीति में सेना की भूमिका निर्णायक रही है और वह राजनीतिक सत्ता पर हावी रही है। हैरानी की बात नहीं कि पाकिस्तान में अब तक कोई भी प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया।

सेना ने कई बार सीधे सत्ता संभाली है। जनरल अयूब खान, जनरल जिया-उल-हक और जनरल परवेज मुशर्रफ ने चुनी हुई सरकारों को बर्खास्त करके अपनी सरकार बनाई है। वर्तमान सेना प्रमुख ‘फील्ड मार्शल’ असीम मुनीर का रौब भी ऐसा है कि वह सेना से इतर भी चलता है। यही कारण है कि राजनीतिक सत्ता नेतृत्व की बजाय उन्होंने पिछले दो महीनों में दो बार असीम मुनीर को वाशिंगटन बुलाकर महत्वपूर्ण विषयों पर बात की है, जिनमें से एक कथित रूप से बलूचिस्तान में दुर्लभ भू खनिज का दोहन करना है तो दूसरा तेल भंडार की खोज।
विशेषज्ञ कहते हैं कि यदि ट्रंप वास्तव में पाकिस्तान के सेना प्रमुख को रिझाने की कोशिश कर रहे हैं, तो यह एक कूटनीतिक रणनीति हो सकती है। अमेरिका को यह अच्छे से पता है कि पाकिस्तान में असली निर्णय लेने की शक्ति सेना के पास है, न कि राजनीतिक नेतृत्व के पास। असीम मुनीर ने हाल ही में चीन की यात्रा भी की हैं, जहां उन्होंने विदेश नीति और आर्थिक सहयोग जैसे मुद्दों पर चर्चा की। इससे साफ होता है कि जिन्ना के कट्टर इस्लामी देश की सेना अब केवल रक्षा नहीं, बल्कि विदेश नीति और आर्थिक रणनीति में भी सक्रिय भूमिका निभा रही है।
कहना न होगा कि पाकिस्तान की सेना आज केवल सैन्य बल नहीं, बल्कि एक आर्थिक संस्था भी बन चुकी है। सेना के पास रियल एस्टेट, खाद्य उद्योग, फैक्ट्रियों और अन्य वाणिज्यिक संस्थानों में निवेश है। 2011 से 2015 के बीच सेना की संपत्ति में 78 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। सेना के कई शीर्ष अधिकारी अरबपति बने बैठे हैं, जिनके नाम ‘पैंडोरा पेपर्स’ में भी सामने आए हैं। अमेरिका के लिए पाकिस्तान एक रणनीतिक साझेदार रहा है, खासकर अफगानिस्तान युद्ध के दौरान वह पाकिस्तान के कंधे पर रखकर ही बंदूक चलाता रहा था। पाकिस्तान की भू-राजनीतिक स्थिति उसे इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मौका देती है।
अमेरिका को पाकिस्तान की सेना के सहयोग की आवश्यकता रही है, चाहे वह आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई हो या क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर कोई संघर्ष। ट्रंप जैसे नेता इस सहयोग को बनाए रखने के लिए सेना प्रमुख से सीधे संवाद करना अधिक प्रभावी मान सकते हैं। ट्रंप के तेल भंडार वाले दावे को जिन्ना के देश की सरकारी कंपनी द्वारा ही खारिज कर दिया जाना रोचक बन पड़ा है। खुद पाकिस्तानी भी ट्रंप की यह बात सुनकर हैरान रह गए थे कि उनके देश में जमीन के नीचे तेल का भंडार है। इस पूरे परिदृश्य में पाकिस्तान की ऊर्जा नीति, सेना के दबदबे और अंतरराष्ट्रीय संबंधों का एक जटिल ताना-बाना सामने आता है, जिसमें तेल बस एक बहाना है, असली खेल तो सत्ता और प्रभाव का है।

















