पंच-परिवर्तन से आत्मनिर्भर बनेगा भारत : RSS सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने बताए सामाजिक समरसता के सूत्र
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पंच-परिवर्तन से आत्मनिर्भर बनेगा भारत : RSS सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने बताए सामाजिक समरसता के सूत्र

RSS शताब्दी वर्ष व्याख्यानमाला में मोहन भागवत जी ने पंच-परिवर्तन, सामाजिक समरसता, आत्मनिर्भरता, स्वदेशी, स्व-बोध और कानून पालन को समाज परिवर्तन की आधारशिला बताया।

Written byShivam DixitShivam Dixit
Aug 27, 2025, 10:51 pm IST
inभारत, संघ @100, दिल्ली
100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज कार्यक्रम में RSS सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी

100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज कार्यक्रम में RSS सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी

नई दिल्ली । संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में दिल्ली के विज्ञान भवन में मंगलवार, 26 अगस्त से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) द्वारा आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला कार्यक्रम ‘100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ के दूसरे दिवस पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने अपना व्याख्यान दिया।

सद्भावना और सकारात्मकता की आवश्यकता

सरसंघचालक जी ने कहा- सद्भावना और सकारात्मकता की बात आती है। सकारात्मकता भी आवश्यक है, क्योंकि कभी-कभी सब सुनकर समाज निराश हो जाता है। निराशा नहीं आनी चाहिए। इन दोनों बातों पर विचार करते हुए एक और विषय सामने आता है—हमारे देश और समाज में परंपरागत रूप से कई वर्ग रहे हैं। बाहर से भी कई वर्ग आए, विशेषकर धार्मिक वर्ग। ये विचारधाराएँ आक्रमणों के माध्यम से आईं। परंतु किसी कारणवश, उन्हें स्वीकार नहीं किया गया—वे यहीं के होकर रह गए।

हिंदू विचारधारा और वसुधैव कुटुम्बकम्

उन्होंने कहा- हिंदू विचारधारा वसुधैव कुटुम्बकम् की है। हर मार्ग को अच्छा मानने वाली। यह केवल बोलने की बात नहीं है, बल्कि संतों ने साधना करके इसे सिद्ध किया है। रामकृष्ण परमहंस ने तो इस्लाम और ईसाईयत की भी साधना कर यह सिद्ध किया कि सभी मार्ग अंततः उसी परम तत्व तक पहुँचाते हैं। यही हमारे समाज का सामान्य स्वभाव है।

दूरियाँ मिटाने का प्रयास

उन्होंने कहा-  लेकिन जो दूरियाँ बनी हैं, उन्हें पाटने के लिए दोनों ओर से प्रयास आवश्यक है। समाज को चाहिए कि परस्पर का दर्द समझे, विश्वास कायम करे, अविश्वास मिटाए। तभी सब लोग विविधताओं के बावजूद, एक देश, एक समाज, एक राष्ट्र के अंग के रूप में, समान पूर्वजों की संतान और समान संस्कृति के वारिस बनकर आगे बढ़ सकेंगे। यह सद्भावना और सकारात्मकता के लिए अत्यंत आवश्यक है।

स्वयंसेवकों का दृष्टिकोण

सरसंघचालक जी बताया कि आज स्वयंसेवकों के विचार भी इसी दिशा में हैं। हम सावधानीपूर्वक, सोच-समझकर, एक-एक कदम आगे बढ़ाने की बात करते हैं। यह कार्य केवल सिद्धांतों से नहीं होगा; उदाहरण प्रस्तुत करने होंगे। परिस्थितियों, समय और देशकाल के अनुसार यह देखना होगा कि क्या बदलना है और क्या नहीं। राष्ट्रीय स्तर पर भी और स्थानीय स्तर पर भी, इन मूल्यों के आधार पर जीवन का एक व्यावहारिक प्रतिमान प्रस्तुत करना होगा।

आर्थिक चिंतन और सहमति

उन्होंने कहा- अब अर्थनीति का उदाहरण लीजिए। हम कहते हैं कि हमारी अर्थनीति विकेंद्रीकृत उत्पादन की होगी। “मास प्रोडक्शन” नहीं, बल्कि “प्रोडक्शन बाय मास” होगा। इसमें ऊर्जा की कम खपत होगी, यह पर्यावरण के लिए हितकारी होगी, रोजगार देने वाली होगी, तकनीकी भी होगी और मानवीय भी।

ऐसा चिंतन पहले से चल रहा है। देश के आर्थिक विशेषज्ञ—विभिन्न मतों के लोग—इन मूल्यों पर सहमत हैं। मतभेद केवल अनुप्रयोग (application) के तरीकों को लेकर हो सकते हैं। इसलिए सभी को साथ बैठकर चर्चा करनी होगी और ऐसा प्रतिमान खड़ा करना होगा जो व्यावहारिक हो और मार्गदर्शक भी बने। छोटे-छोटे स्थानीय स्तर पर भी ऐसे प्रयोग करने होंगे। स्वयंसेवक आगे बढ़ रहे हैं, और भी लोग आगे आ रहे हैं। अब आवश्यकता है कि इन सबको जोड़कर, एक सूत्र में बाँधकर, पूरे देश का एक समन्वित चिंतन बनाया जाए।

इसके लिए संबंध और संपर्क आवश्यक हैं। केवल परिचय से बात नहीं बनती; बार-बार मिलना, अनुभव साझा करना और संबंधों को गहरा करना होगा। तभी विचार व्यवहार में उतरेगा और समाज को बदलेगा।

इसलिए यह आवश्यक है कि सर्वत्र संपर्क हो—सबसे पहले पड़ोसी देशों में। भारत के अधिकांश पड़ोसी देश कभी भारत ही थे। लोग वही हैं, भूगोल वही है, नदियाँ वही हैं, जंगल वही हैं—बस नक्शे पर रेखाएँ खिंच गईं।

अतः पहला कर्तव्य है कि इन पड़ोसी देशों के लोग अपनत्व की भावना से जुड़े। देश अलग-अलग रहेंगे, पहले भी अलग थे, परंतु विरासत में मिले मूल्यों के आधार पर इन सबकी प्रगति होनी चाहिए। भारत सबसे बड़ा है, इसलिए उसकी जिम्मेदारी भी सबसे बड़ी है।

भारत की भूमिका और योगदान

उन्होंने कहा- भारत का योगदान यह होना चाहिए कि पड़ोस में शांति रहे, स्थिरता रहे, विकास हो, पर्यावरण ठीक रहे और लोगों में अच्छे संस्कार विकसित हों। संप्रदाय भले अलग हों, लेकिन संस्कारों पर कोई मतभेद नहीं होता। इस कार्य में सभी जाति, वर्ग और संप्रदाय के लोग सहमत होते हैं।

आज की भाषा में इसे “आउटरीच” कहा जाता है, पर हम कहते हैं—जीवंत संपर्क। मनुष्य से मनुष्य का मिलन, हृदय से हृदय का उदय, व्यक्ति से व्यक्ति का सीधा संवाद। यही प्रक्रिया प्रारंभ होनी चाहिए।

इससे जो वातावरण बनेगा, उसमें संबंध परस्पर पूरक होंगे, सुदृढ़ होंगे और विश्व के लिए कल्याणकारी सिद्ध होंगे।

समाज की गुणवत्ता और परिवर्तन की आवश्यकता

उन्होंने कहा-  इस दृष्टि से हम क्या कर सकते हैं—यह प्रश्न भी लोगों के मन में चलता है। यह सब करना है तो मुख्यतः भारतवर्ष के समाज की गुणवत्ता ही काम करेगी। उसका जो चित्र सामने आएगा, वही सबको मार्ग दिखाएगा। केवल भाषण देना पर्याप्त नहीं है; लोग पूछेंगे—आपके यहाँ क्या है? आप कैसे हैं? इसलिए शुरुआत अपने घर से ही करनी पड़ेगी।

संगठित कार्यशक्ति और समाज परिवर्तन

सरसंघचालक जी ने आगे कहा कि इसी आधार पर हमने सोचा है कि एक संगठित कार्यशक्ति खड़ी हो और उसी के आधार पर समाज का परिवर्तन हो। समाज का परिवर्तन केवल व्यवस्थाओं का परिवर्तन नहीं है। समाज का परिवर्तन का अर्थ है—समाज के आचरण का परिवर्तन, समाज की संगठित अवस्था का निर्माण। उसके आधार पर ही व्यवस्था बदलती है। कोई व्यवस्था अपने आप नहीं बदलती। समाज तभी बदल सकता है जब वह गुणसंपन्न हो, संगठित हो, उसके सामने एक स्पष्ट दृष्टि हो और उसका आचरण वैसा हो। इसलिए आचरण से ही परिवर्तन की शुरुआत करनी है।

इस आचरण में परिवर्तन लाने के लिए कुछ कार्य हमने प्रारंभ किए हैं। ये कार्य स्वयंसेवकों और उनके घरों में भी होने चाहिए। उसके आधार पर आस-पड़ोस का समाज भी सहभागी बने और समाज में परिवर्तन आए। इन कार्यों को हम “पंच-परिवर्तन” कहते हैं। ये बहुत सरल कार्य हैं—कोई विशेष साधन नहीं चाहिए, केवल करने की इच्छा चाहिए और एक उदाहरण चाहिए। स्वयंसेवक ही वह उदाहरण बनें।

स्वयंसेवकों की भूमिका

सरसंघचालक जी ने स्पष्ट कहा- स्वयंसेवक 100% तो तुरंत नहीं बन सकते और न 100% बनने तक रुक सकते हैं, क्योंकि समय की आवश्यकता तत्काल है। इसलिए स्वयंसेवक पाँच कदम आगे बढ़ें और समाज को साथ लें। इसका एक लाभ है—यदि स्वयंसेवक दस हज़ार कदम आगे चले जाएँ और समाज को बुलाएँ तो समाज कहेगा, “यह हमारे बस का नहीं।” लेकिन यदि स्वयंसेवक पाँच कदम आगे बढ़ें तो समाज आसानी से साथ चल पड़ेगा।

पंच-परिवर्तन

ये पाँच कार्य इस प्रकार हैं :

1. कुटुंब प्रबोधन

आज सामाजिक पाप, संस्कारहीनता और संबंधों की दूरी बढ़ रही है। नई पीढ़ी का माइंडसेट व्यक्तिगत (individual) बनता जा रहा है। मोबाइल इसका सबसे बड़ा कारण है—बच्चा क्या देख रहा है, क्या कर रहा है, कोई नहीं जानता। वह सब कुछ निजी रखता है। यह संबंध-विहीनता की ओर जाने वाला मार्ग है, जिसके दुष्परिणाम सर्वत्र दिख रहे हैं।

इसे ठीक करने के लिए आवश्यक है कि बचपन से ही परिवार में संस्कार दिए जाएँ। परिवार के सभी सदस्य सप्ताह में एक बार निश्चित समय पर बैठें। श्रद्धा से भजन करें, घर में बना भोजन मिलकर बिना आलोचना किए खाएँ, और फिर 2–3 घंटे परिवार के साथ केवल बातचीत (गपशप) करें।

इस चर्चा में प्रश्न हों—हम कौन हैं? हमारे पूर्वज कौन थे? हमारी कुल-परंपरा क्या है? क्या भद्र है, क्या अभद्र है? परंपरा में जो बातें आईं, उनमें से आज क्या टिक सकती हैं, क्या बदलनी चाहिए? इस चर्चा के आधार पर परिवार में सहमति बने और सहमति का आचरण में प्रयोग हो।

इस बैठक में छोटा बच्चा भी रहे, भले उसे समझ न आए। केवल श्रवण से ही संस्कार पड़ते हैं। माता-पिता को ध्यान रखना होगा कि जो चाहते हैं, पहले स्वयं वैसा बनें। बच्चों के प्रश्नों के उत्तर देने की तैयारी भी रखें।

2. राष्ट्र परिचय

परिवार में केवल घर-गृहस्थी की चर्चा न हो, बल्कि देश और राष्ट्र का परिचय भी हो। हमारे पूर्वजों के आदर्श, हमारे इतिहास और परंपरा की दृष्टि, अच्छी कहानियाँ बच्चों को बताई जाएँ। इस पर चर्चा हो कि हम इनमें से क्या लागू कर सकते हैं।

3. राष्ट्र के लिए योगदान

हम रोज़ अपने और अपने परिवार के लिए कमाते-खर्चते हैं। पर हमें यह सोचना चाहिए कि अपने राष्ट्र, समाज और धर्म के लिए रोज़ क्या करते हैं। यह छोटे-छोटे कार्य हो सकते हैं, जो बच्चे भी कर सकते हैं।

उदाहरण के लिए—

  • नवमी में पढ़ने वाली लड़की अपने मोहल्ले में काम करने वालों के बच्चों को पढ़ा सकती है।
  • छोटा बच्चा घर में पौधा लगाकर उसकी देखभाल कर सकता है।

परिवार बैठकर चर्चा करे कि कौन कितना समय समाज के लिए देगा और क्या कार्य करेगा।

4. अनुभूति द्वारा शिक्षा

बच्चों को केवल भाषण से नहीं, बल्कि अनुभव से सीखाना होगा। घूमने के लिए केवल सिंगापुर या पेरिस न ले जाएँ; कभी कुम्भलगढ़ किला दिखाएँ, कारगिल की सीमा पर ले जाएँ, या अपने ही शहर की झुग्गी-झोपड़ी दिखाएँ कि वहाँ लोग कैसे रहते हैं। यह अनुभव बच्चों के मन पर गहरा प्रभाव डालते हैं।

इन छोटे-छोटे कार्यों से संबंधों का महत्व समझ आता है। भाषण से नहीं, बल्कि अनुभूति से संस्कार बनते हैं। यही “पंच परिवर्तन” समाज के आचरण में सकारात्मक बदलाव लाएगा। बच्चे के जीवन में 12 वर्ष की आयु तक एक स्थायी मानसिक स्थिति (mental position) बन जाती है। यह स्थिति सही दिशा में बने, यही कुटुंब प्रबोधन का उद्देश्य है।

सरसंघचालक जी ने पर्यावरण को लेकर कहा कि यह सबको समझ में आता है और लोग तुरंत उसका अनुकरण भी करते हैं। नीतिगत बदलाव तो बहुत बड़े होते हैं और उन्हें बदलने में समय लगता है। समाज बहुत आगे निकल चुका है—यदि अचानक मोड़ देंगे तो गाड़ी पलट जाएगी। अतः धीरे-धीरे परिवर्तन लाना होगा। परंतु अपने जीवन में कुछ छोटे-छोटे कार्य तुरंत किए जा सकते हैं। जैसे-

  • पानी बचाना
  • सिंगल-यूज़ प्लास्टिक हटाना
  • हरियाली के लिए पेड़ लगाना

लोग इसे उत्साह से करते हैं। इससे न केवल पर्यावरण का सुधार होता है, बल्कि मानवीयता भी बढ़ती है।

सरसंघचालक जी ने तीसरी बात सामाजिक समरसता की करते हुए कहा- यह कठिन है, परंतु करनी ही पड़ेगी। समानता और समता की बातें कहना आसान है, लेकिन विषमता कहाँ है—यह देखना कठिन है। यह विषमता किसी व्यवस्था में नहीं, बल्कि मनुष्य के मन में है।

यदि किसी व्यक्ति को देखकर, या उसका नाम सुनकर, तुरंत यह विचार आ जाए कि वह किस जाति का होगा—तो यह गड़बड़ी है। मनुष्य को केवल “मनुष्य” के रूप में न देखकर “जाति-विशेष” के रूप में देखना ही विषमता की जड़ है।

उन्होंने कहा- इसे मन से निकालने के लिए व्यवहार में बदलाव करना होगा। जिस इलाके में हम रहते हैं—हमारा दफ्तर, बस्ती, कार्यालय या समाज—वहाँ विभिन्न जातियों और वर्गों के लोग रहते हैं। हमें पूरे समाज को एक ही मानना चाहिए।

इसके लिए आवश्यक है कि—

  • हमारे व्यक्तिगत मित्र सभी वर्गों और जातियों से हों।
  • हमारे परिवार की मित्रता उनके परिवारों से हो।
  • उनके घर आना-जाना हो।
  • पर्व-त्योहार, सुख-दुख में सहभागिता हो।

जब यह व्यवहार होगा तो समाज की दूरी मिटेगी। कुछ वर्षों में यह पूरी तरह संभव हो जाएगा। साथ ही, समाज में सार्वजनिक स्थान जैसे— मंदिर, श्मशान, पानी के स्रोत—सबके लिए समान रूप से खुले हों। वहाँ किसी प्रकार का भेदभाव न हो। मंदिर भक्तों के लिए है, भक्त की जात नहीं पूछी जाती। पानी सबके लिए है। मृत्यु के बाद भी भेद क्यों होना चाहिए?

चौथी बात आत्मनिर्भरता पर करते हुए सरसंघचालक जी ने कहा- विकास करना है तो हर बात में देश आत्मनिर्भर होना चाहिए। शुरुआत घर से करनी है। स्वदेशी का अर्थ यह नहीं है कि विदेशी वस्तुएँ पूरी तरह बंद हो जाएँ। अंतरराष्ट्रीय व्यापार चलता रहेगा, लेकिन दबाव में नहीं— स्वेच्छा से।

उदाहरण-

  • गर्मियों में नींबू की शिकंजी घर में बन सकती है, फिर कोका-कोला क्यों लाना?
  • पोषक और स्वादिष्ट भोजन घर में ही मिलता है, फिर बार-बार पिज़्ज़ा क्यों खाना?
  • यदि गाँव में कोई वस्तु बनती है तो उसे बाहर से क्यों लाना? इससे स्थानीय रोजगार प्रभावित होता है।
  • यदि अपने राज्य में कार बनती है तो वहीं से खरीदें। यदि पड़ोसी राज्य में पेट्रोल सस्ता है तो वहीं से लाएँ।

स्वदेशी का तत्व यही है—अपने देश में जो बने, वही उपयोग करें। विदेश से वही लें, जो देश में न बने। यह स्वेच्छा और आत्मनिर्भरता का मार्ग है।

पाँचवीं बात स्व-बोध और अनुशासन की बताते हुए सरसंघचालक जी ने कहा- अपने घर की चौखट के अंदर अपनी भाषा, अपनी वेशभूषा, अपना भोजन और अपनी परंपरा होनी चाहिए।

  • भाषा : अपनी मातृभाषा का प्रयोग करें।
  • वेशभूषा : देश की जलवायु के अनुसार बनी परंपरागत पोशाक है। कम से कम पर्व-त्योहारों पर उसका प्रयोग करें।
  • घर : यदि घर भव्य है, तो उसमें पूजाघर भी उचित स्थान पर अवश्य होना चाहिए। यही हिंदू परंपरा का घर कहलाता है।

उन्होंने कहा- स्व-बोध का अर्थ है अपनी संस्कृति और परंपरा को पहचानना और उसका पालन करना।

छठी और अंतिम बात में सरसंघचालक जी ने संविधान और कानून का पालन को लेकर कहा- हर परिस्थिति में कानून का पालन करना चाहिए। यदि अपमान हो, श्रद्धा को गाली दी जाए, तो भी कानून हाथ में नहीं लेना चाहिए। विरोध करना है तो संविधानिक और शांतिपूर्ण तरीके से करें। केवल आत्मरक्षा की स्थिति में ही बल प्रयोग उचित है। अन्यथा, सामान्य जीवन में—

  • समय पर बिल भरना,
  • लाइसेंस समय से नवीनीकरण करना,
  • गैरकानूनी कार्यों में न पड़ना

यही देशभक्ति है। आज देश के लिए जीना ही सच्ची देशभक्ति है। एक जमाना था जब हमारे पूर्वज देश के लिए हँसते-हँसते फाँसी चढ़ जाते थे। आज हमें 24 घंटे देश के लिए जीना है—अपने आचरण, अपनी आदतों और अपने व्यवहार से।

समाज और देश के लिए आचरण का महत्व

सरसंघचालक जी ने कहा- छोटी-छोटी बातों में भी समाज का, देश का और सबका ख्याल रखकर स्वयं को आचरण में रखना चाहिए। जैसे—अकाल पड़ा और राजा ने आदेश दिया कि शिवजी का अभिषेक दूध से किया जाए। सब लोग एक-एक लोटा दूध लाएँ। एक चतुर आदमी ने सोचा—“सब लोग दूध डालेंगे, मैं एक लोटा पानी डाल दूँ, किसी को पता नहीं चलेगा।” परंतु जब अभिषेक हुआ तो देखा गया कि वहाँ केवल पानी ही है, क्योंकि सभी ने यही सोचा था।

ऐसे विचार नहीं करने चाहिए। आरंभ मेरे से होना चाहिए। मेरे घर से शुरू होगा, समाज तक पहुँचेगा, फिर भारत तक पहुँचेगा, और जब भारत करेगा तो दुनिया देखेगी। तब विश्व को लगेगा कि हमारी बातों में दम है। इस दिशा में समाज को आगे बढ़ाने का कार्य करना है। संघ ने यही करने का संकल्प लिया है। स्वयंसेवकों में इस पर चर्चा चल रही है। चर्चा के बाद निर्णय होगा और यह निश्चित है कि इसमें से अनेक बातें स्वीकार होंगी। ‘पंच परिवर्तन’ की बात तो होगी ही, पर और भी कई बातें जुड़ेंगी।

कार्य की आवश्यकता और समय

उन्होंने कहा-  यह कार्य आज हो या कल—होना ही है। आज करना है या नहीं, इसका निर्णय हमारी प्राचीन सभा करेगी और हमारे सरकार्यवाह जी बताएंगे। लेकिन यह करना आवश्यक है क्योंकि भारत रहना चाहिए, हम रहें या न रहें, भारतीय बने रहना चाहिए। यह मेरे लिए भी है, आपके लिए भी है, भारत के लिए भी है और विश्व के लिए भी। क्योंकि इस धर्म को देने वाला दूसरा कोई नहीं है, हमें ही देना होगा। यह हमारा कर्तव्य है, अहंकार नहीं।

विश्वगुरु पद का सच्चा अर्थ

उन्होंने कहा- हम कोई तीसमारखाँ नहीं हैं जो पूरी दुनिया को डाँट-फटकार कर सिखाएँगे। विश्वगुरु पद का अर्थ यही नहीं है। सच्चा विश्वगुरु पद है—अत्यंत विनम्रता से, अपने आचरण से सिखाना। भारत का समय-समय पर विश्व में अवधान होना, यह ईश्वरीय योजना है। उसके योग्य हमें बनना है, अपने देश को बनाना है और इसी उद्देश्य के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है। यह जीवन की विकास-यात्रा (evolution of life) और ‘हिंदू राष्ट्र’ के प्रश्न से जुड़ा हुआ है। इसलिए संघ किसी एक का है, किसी एक का नहीं भी है—वह सबका है।

देश सर्वोपरि विचार

उन्होंने कहा- यह मत-मतांतर अनेक हैं, पार्टियाँ अनेक हैं, स्वार्थ भी अनेक हैं। पर इन सबसे परे केवल देश का विचार सर्वोपरि होना चाहिए। “तेरा वैभव अमर रहे, माँ, हम दिन-दिन गाएँ”—यह विचार रहे, चाहे हम रहें या न रहें। यही सोचकर संघ अपनी सारी योजना करता है और संपूर्ण समाज को एकजुट करने का कार्य करता है।

संघ का योगदान और दृष्टिकोण

सरसंघचालक जी ने स्पष्ट कहा- संघ को न अहंकार है और न ही उसे क्रेडिट चाहिए। यह क्रेडिट समाज का होना चाहिए कि उसने इतनी बड़ी छलांग लगाई कि भारत का कायाकल्प ही नहीं हुआ, बल्कि विश्व में एक सुखी, शांतिपूर्ण नई व्यवस्था खड़ी हुई। संघ का यही कार्य है। इसे देखने के लिए आपको संघ के भीतर आना होगा। जो मैं बता रहा हूँ, वह सब वहाँ है। संघ की शाखाओं में जाइए, संघ के घरों में जाइए, संघ के कार्यक्रमों में रहिए—आपको यह सब बातें बीज रूप में या विकसित होते हुए मिलेंगी।

संघ की वास्तविकता

उन्होंने कहा-  मैं यह सब संघ का प्रचार करने के लिए नहीं बता रहा हूँ। मैं यह बता रहा हूँ कि संघ क्या है। यह तथ्य (fact) है। आप चाहे अनुकूल सोचें या प्रतिकूल, पर आपकी राय तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए।

उन्होंने आग्रह करते हुए कहा— केवल सुनी-सुनाई बातों पर मत जाइए। समय-समय पर आप स्वयं संघ में आएँ, देखें, समझें। और यदि यह बात आपको उचित लगे, और जो मैंने कहा वह आपको संघ में भी मिले, तो व्यक्तिगत जीवन से लेकर विश्व जीवन तक को संभालने वाले इस विश्वधर्म को विकसित करने के काम में भारत को तैयार करने वाले अभियान में आप भी सहयोगी कार्यकर्ता बनें।

इसके बाद अंत में सरसंघचालक जी ने सबको धन्यवाद देते हुए कहा- कल मैं आपसे प्रश्न आमंत्रित करूंगा। प्रश्न अनेक होंगे, इसलिए उन्हें थोड़ा संक्षिप्त करना पड़ेगा, परंतु कोई विषय छूटेगा नहीं। यही कहकर मैं अपने विचारों का समापन करता हूँ।

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Shivam Dixit
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अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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