100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ : सरसंघचालक जी ने बताया- 'RSS के सौ वर्ष के आगे का पड़ाव'
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100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ : सरसंघचालक जी ने बताया- ‘RSS के सौ वर्ष के आगे का पड़ाव’

RSS शताब्दी वर्ष के अवसर पर विज्ञान भवन, नई दिल्ली में मोहन भागवत जी ने अपने व्याख्यान में समाज परिवर्तन, संघ विस्तार, सज्जन शक्ति, सद्भावना और समन्वय की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।

Written byShivam DixitShivam Dixit
Aug 27, 2025, 10:00 pm IST
in भारत, संघ @100, दिल्ली
श्री मोहन भागवत जी, सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

श्री मोहन भागवत जी, सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

नई दिल्ली । संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में दिल्ली के विज्ञान भवन में मंगलवार, 26 अगस्त से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) द्वारा आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला कार्यक्रम ‘100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ के दूसरे दिवस पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने अपना व्याख्यान दिया।

लक्ष्मणराव भिड़े जी का बौद्धिक वर्ग

सरसंघचालक जी ने कहा- मुझे याद है, सन् 1991 में मैंने लक्ष्मणराव भिड़े जी (जो उस समय हमारे क्षेत्र के प्रचारक थे) का एक बौद्धिक वर्ग सुना था। यह सहायक समीक्षा वर्ग के उद्घाटन के अवसर पर हुआ था। उस वर्ग में भारत के बाहर रहने वाले लोग थे। भिड़े जी ने कहा—देखो, आप सब युवक हो, तीस वर्ष से कम आयु के। बाहर जो हिंदू संगठन का काम चल रहा है, उसमें आप तीसरी पीढ़ी हो।

पहली पीढ़ी ने यह सिद्ध कर दिया कि संघ की शाखा विदेशों में भी चल सकती है। जहाज पर शाखा शुरू हुई और आज विदेशों में संघ के स्वयंसेवक, स्थानीय हिंदुओं को संगठित करने का काम विभिन्न संगठनों के माध्यम से कर रहे हैं। शाखा पद्धति लेकर चलने से हर जगह अच्छा जीवन उत्पन्न हो सकता है।

दूसरी पीढ़ी ने यह प्रमाणित किया कि शाखा की ट्रेनिंग के बाद स्वयंसेवक व्यसन, उपभोग और अन्य बुरी आदतों से दूर रहता है। उसका परिवार अपने स्वभाव और प्रकृति के अनुसार अच्छा जीवन जी सकता है।

तीसरी पीढ़ी, अर्थात आप सबके कंधों पर यह दायित्व है कि जिस देश में आप रहते हैं वहाँ ऐसा संघ खड़ा करें कि उस देश के लोग कहें—“हमारे यहाँ भी ऐसा एक आरएसएस स्वयंसेवक होना चाहिए।” और फिर अपने स्वभाव, परिस्थिति और प्रकृति के आधार पर वे अपने देश का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ खड़ा करें।

उन्होंने कहा- यह प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। मुझे बड़ा आनंद हुआ जब मैंने देखा कि पिछली बार नागपुर में संघ शिक्षा वर्ग देखने आए कुछ लोग लौटते समय यही कहकर गए—“हमारे यहाँ भी एक आरएसएस होना चाहिए।” यही भारत का कार्य है।

भारत का संयम और सेवा

सरसंघचालक जी ने कहा- भारत हमेशा से अपनी हानि की अनदेखी कर संयम बरतता रहा है। भारत ने अपने नुकसान की परवाह किए बिना, संकट में पड़े लोगों की मदद की है—even उन लोगों की भी जिन्होंने भारत को नुकसान पहुँचाया। व्यक्ति का अहंकार शत्रुता पैदा करता है, और राष्ट्रों का अहंकार राष्ट्रों में शत्रुता कायम करता है। लेकिन इन सबके परे है हिंदुस्थान।

विश्व दृष्टि की आवश्यकता

उन्होंने कहा-  व्यक्तिगत जीवन से लेकर पर्यावरण तक—हर क्षेत्र में सही रास्ता दिखाने के लिए भारतीय समाज को अपना उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। यह विचार कोई नया नहीं है। चालीस साल पहले भी हमारे द्वितीय सरसंघचालक पूजनीय गुरुजी ने अपने भाषणों में कई बार कहा था। रज्जू भैया सरसंघचालक थे, फिर उन्होंने सुदर्शन जी को सरसंघचालक बनाया। उससे पहले एक प्रचार सभा में उन्होंने प्रतिदिन सभा के दौरान कहा था कि अब हमें विश्व की बात करनी चाहिए।

विचार तो पहले से था, पर उसे बोलने की स्थिति नहीं थी। अगर उस समय यह कहा जाता तो लोग सोचते कि यह तो केवल सपना है, होने वाला नहीं है। न भारत की स्थिति ऐसी थी, न संघ की।

आज की अनुकूल स्थिति

उन्होंने आगे कहा कि आज स्थिति बदली है। आज भारत की भी वह स्थिति है और संघ की भी। आज अनुकूलता है, समाज की मान्यता है। विचार सब मानते हों या न मानते हों, परंतु संघ की साख को सब मानते हैं। समाज का विश्वास है। इसलिए आज यदि हम कुछ कहते हैं तो समाज सुनता है।

संघ के सौ वर्ष और आगे का पड़ाव

उन्होंने कहा- संघ के सौ वर्ष पूरे हो रहे हैं। आगे का पड़ाव क्या होगा? आगे यह होगा कि जो काम हम संघ में कर रहे हैं—चरित्र निर्माण और देशभक्ति जगाने का कार्य—वह पूरे समाज में फैले।

ऐसा नहीं कि यह काम समाज में हो नहीं रहा। करने वाले लोग हैं। अलग-अलग पद्धतियों से करने वाले संगठन हैं। ऐसे व्यक्ति हैं जो अपने जीवन को आदर्श बनाकर उत्तम चरित्र का निर्माण कर रहे हैं। बस वे सामने नहीं आते।

मीडिया की नकारात्मक छवि

सरसंघचालक जी ने आगे कहा- मीडिया में तो हमें केवल नकारात्मक ही दिखाई देता है। एयरपोर्ट पर टीवी पर जब भी देखो, समाचार यही होते हैं—घर जल गया, बच्चा मर गया, एक्सीडेंट हो गया, किसने किसको मारा। यही “न्यूज़” है। कहा जाता है—कुत्ता आदमी को काटे तो न्यूज़ नहीं, आदमी कुत्ते को काटे तो न्यूज़ है।

इससे लगता है कि सब बहुत बुरा हो रहा है। बुरा तो हो रहा है, सात प्रकार के पापों के संकट भारत सहित पूरी दुनिया पर हैं। सबको इसकी चिंता करनी पड़ेगी। परंतु भारत में जितना बुरा दिखता है, उससे चालीस गुना अधिक अच्छा समाज में है।

भारत की सच्ची तस्वीर

उन्होंने कहा- मीडिया रिपोर्ट के आधार पर भारत का मूल्यांकन करना गलत होगा। हम प्रत्यक्ष अनुभव से जानते हैं कि अनेक लोग बिना किसी लाभ के सेवा कर रहे हैं। गरीब लोग भी सेवा कर रहे हैं—जबकि उनके अपने खाने के लाले पड़े रहते हैं।

सेवा का प्रेरक उदाहरण

सरसंघचालक जी ने उदाहरण देकर कहा- मैंने स्वयं देखा। एक प्राइमरी स्कूल का शिक्षक था, उसने नौकरी छोड़ दी। उसकी पत्नी नौकरी करके घर चलाती थी। वह शिक्षक रास्ते पर यदि कोई अनाथ बच्चा पाता—किसी भी आयु का—तो उसे घर ले आता। उसे तब तक पालता-पोसता जब तक वह अच्छा न बन जाए या जीवन समाप्त न हो जाए।

मैंने उससे पूछा—आप तो लोअर इकोनॉमिक ग्रुप से हैं, आय भी कम है, कैसे चलता है यह सब..? उसके घर में चालीस बच्चे पल रहे थे। उसने सीधा उत्तर दिया—“मुझे अच्छा लगता है, मुझे समाधान मिलता है।” ऐसे बहुत लोग भारत में हैं।

भारत का बल और धर्म का जीवन

सरसंघचालक जी ने कहा- धर्मगुरु व्याख्यान मैं यहाँ दे रहा हूँ। लेकिन धर्म को जीने वाले आपको गाँव-गाँव में मिलेंगे, शहरों की झुग्गी-झोपड़ियों में भी मिलेंगे। यही भारत का बल है—आज भले ही बिखरा हुआ है, पर सक्रिय है। इस बल को एक संगठित और पूरक रचना में बाँधना है।

संघ के 100 वर्ष पूरे होने के बाद क्या.?

उन्होंने आगे कहा-  इसीलिए प्रश्न उठता है कि 100 वर्ष पूरे होने के बाद क्या होना चाहिए?
मैं जो कह रहा हूँ, वह पहले संघ में अनुमोदित होगा, क्योंकि यह निर्णय संघ की प्रतिनिधि सभा लेती है, मैं नहीं। लेकिन उनके सामने क्या विचार हैं, यह बता सकता हूँ।

समाज को बदलने के लिए संघ का विस्तार

सरसंघचालक जी ने कहा- यदि हमें समाज को बदलना है, तो संघ को समाज के कोने-कोने तक पहुँचना होगा। ऐसा विस्तार करना होगा कि कोई व्यक्ति या कोई परिवार कार्य से अछूता न रहे।

  • भौगोलिक दृष्टि से—हर गाँव, हर गली-मोहल्ला, हर घर तक।
  • सामाजिक दृष्टि से—गरीबी रेखा के नीचे से लेकर अमीरी रेखा के ऊपर तक।
  • विविधताओं के दृष्टिकोण से—जाति, पंथ, संप्रदाय, सभी वर्गों तक।

यह विस्तार द्रुतगति (तेजी) से करना होगा। जल्द से जल्द ऐसा संगठन-जाल तैयार करना होगा कि समाज को संगठित करने वाला संघ का उपकरण—शाखा—हर गाँव-बस्ती तक पहुँचे। शाखाएँ अपने-अपने क्षेत्र की संभाल करें। पहली प्राथमिकता यही होगी। उसी पर भरोसा रखकर आगे का सब कार्य होगा।

समाज की सज्जन शक्ति

उन्होंने आगे कहा- अब दूसरी बात— समाज की शक्ति।
आज सज्जन शक्ति बिखरी हुई है, समाज के सभी वर्गों और स्तरों में। हमें उनसे संपर्क करना है। न केवल संपर्क, बल्कि उनका आपस में भी संपर्क कराना है।

इससे क्या होगा?

  • वे लोग अपने-अपने ढंग से समाज-कार्य करेंगे।
  • संघ में आकर ही करना है, ऐसा आग्रह नहीं।
  • केवल नेटवर्किंग बने, उन्हें यह पता रहे कि और भी लोग सेवा कर रहे हैं।

यह ज्ञान और आपसी जुड़ाव उनके उत्साह को बढ़ाएगा। जब उनका कार्य परस्पर पूरक और समन्वित हो जाएगा, तब समाज-परिवर्तन की गति और तेज होगी।

सद्भावना और समन्वय

उन्होंने आगे कहा-  तीसरी बात—सद्भावना और समन्वय।
इतना बड़ा समाज है, इतनी विविधताएँ हैं, और विविधता में विरोध भी है। इसी कारण टकराव, अविश्वास और दुर्भावना पैदा होती है। ऐसे समाज से कोई बड़ा कार्य नहीं हो सकता। अतः हमें समाज को तैयार करना पड़ेगा।

समाज नेतृत्व की भूमिका

उन्होंने कहा- प्रत्येक वर्ग के नेतृत्वकर्ता, मतनिर्माता (opinion makers) आपस में जुड़े रहें। उनका नित्य संपर्क बना रहे।

मिलते रहें और तीन काम करें—

  1. अपने वर्ग की उन्नति (भौतिक और नैतिक दोनों) करना। उनकी रूढ़ियों और कुरीतियों से मुक्ति दिलाना। उनके जीवन में सुधार लाना।
  2. यह भाव जगाना कि “हमारा वर्ग समाज का एक हिस्सा है।” समाज रहेगा तो हम रहेंगे, और हमारा होना समाज के विकास का कारण बने।
  3. मिलकर अपने क्षेत्र की समस्याओं का निराकरण करना। यदि कोई अभाव है तो उसे अपनी सामूहिक शक्ति से दूर करना।

समाज परिवर्तन का लक्ष्य

सरसंघचालक जी ने कहा- जब यह तीन बातें होंगी तो—

  • समाज का प्रत्येक वर्ग स्वयं को पूरे समाज का अंग मानकर कार्य करेगा।
  • यह भाव केवल कल्पना नहीं रहेगा, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव बन जाएगा।
  • दुर्बल वर्गों के लिए भी सामूहिक उत्तरदायित्व विकसित होगा।

यह प्रक्रिया सहज और स्वाभाविक रूप से समाज के स्वभाव में उतर जाए— यही हमारा प्रयास रहेगा।

यह भी पढ़ें – कट्टरता, कलह और अशांति की ओर जा रही दुनिया, समाधान केवल भारत : सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी
Topics: संघ शताब्दी वर्षSamajik Samrastaसंघ कार्यMohan Bhagwat ThoughtsMohan Bhagwat speechShakha Expansionपाञ्चन्जय विशेषसंघ विस्तारRSS 100 Yearsमोहन भागवत व्याख्यानराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघसज्जन शक्तिRashtriya Swayamsevak Sanghविज्ञान भवन कार्यक्रमRSS NewsSangh Shatabdiसमाज परिवर्तनसमाज की एकता
Shivam Dixit
Shivam Dixit
अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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