Rashtriya Swayamsevak Sangh: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला ‘100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ का दूसरा दिन बहुत ही महत्वपूर्ण और ज्ञानवर्धक रहा। इस अवसर पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने संगठन की यात्रा, उसके उद्देश्य, सामाजिक एवं राष्ट्रीय विकास में संघ की भूमिका और भविष्य की दिशा पर अपने विचार साझा किए। उनके व्याख्यान के माध्यम से संघ के इतिहास और उसकी सोच के नए आयाम खुलकर सामने आए।
- सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने बताया कि संघ एक ऐसा स्वयंसेवी संगठन है जिसने अपने स्थापना काल से लेकर अब तक अनेक चुनौतियों और कड़े विरोधों का सामना किया है। उन्होंने कहा कि संघ का मूल आधार है शुद्ध सात्त्विक प्रेम, जो इसके समस्त कार्यों की आत्मा है। यह प्रेम ही संघ को लगातार मजबूत बनाए रखने का कारण है। संघ के प्रथम प्रचारकों में से एक दादाराव परमार्थ जी ने इसे ‘हिंदू राष्ट्र के जीवन मिशन का विकास’ बताया था, जो संघ की विचारधारा और मिशन को सरल एवं स्पष्ट रूप में दर्शाता है।
- डॉ. भागवत ने संघ के स्वयंसेवकों के निःस्वार्थ समर्पण को भी उजागर किया। संघ में किसी प्रकार का बाहरी प्रोत्साहन या पुरस्कार नहीं होता, फिर भी स्वयंसेवक अपने कार्य में आनंद पाते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि उनका प्रयास विश्व कल्याण के लिए है। संघ का प्रमुख उद्देश्य सम्पूर्ण हिंदू समाज को एकजुट करना है और स्वयंसेवक इसी उद्देश्य के प्रति समर्पित रहते हैं।
- उन्होंने धर्म की व्यापक व्याख्या भी दी। धर्म केवल पूजा-पाठ या किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि वह जीवन में संतुलन स्थापित करने वाला मार्ग है। धर्म कट्टरता या अतिवाद की ओर नहीं जाता, बल्कि जीवन और समाज दोनों में सामंजस्य और संयम का संदेश देता है। भारत की संस्कृति ने सदैव संयम और दूसरों की सहायता को प्राथमिकता दी है, भले ही इसके लिए खुद को नुकसान उठाना पड़ा हो।
- डॉ. भागवत ने संघ के मूल तत्व शुद्ध सात्त्विक प्रेम को दोहराया, जो कर्म का आधार भी है। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म का सार सत्य और प्रेम है, जो दिखने में अलग होते हुए भी एक ही भावना के दो पहलू हैं। संसार केवल सौदों से नहीं चलता, बल्कि अपनत्व और मानवीय रिश्तों से चलता है। संघ के स्वयंसेवक दुर्जनों से घृणा नहीं बल्कि करुणा रखने की शिक्षा देते हैं, और विरोध के बावजूद संघ के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखते हैं।
- संघ की विचारधारा ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के सिद्धांत पर आधारित है, जिसका अर्थ है सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार मानना। संघ का लक्ष्य है सम्पूर्ण हिंदू समाज को चार मार्गदर्शक सिद्धांतों – मैत्री, करुणा, सहानुभूतिपूर्ण आनंद और समभावके माध्यम से एकजुट करना। संघ इस बात पर जोर देता है कि मंदिर, पानी और श्मशान में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए।
- डॉ. भागवत ने वर्तमान सामाजिक स्थिति पर भी चिंता जताई और कहा कि यदि हर कोई केवल उपभोग की होड़ में लगा रहेगा, तो इससे प्रतिस्पर्धा और झगड़े बढ़ेंगे, जो अंततः विनाश का कारण बनेंगे। संघ की विचारधारा सबके भले की बात करती है और इसे समझकर हम समाज में शांति और समरसता ला सकते हैं। भाषा,भजन, भोजन, भूषण और भ्रमण अपने घर की परंपरा के अनुसार होना चाहिए। यह स्वबोध है। हस्ताक्षर में भी अपनी भाषा का प्रयोग करें। स्व के आधार पर प्रगति होती है।
- उन्होंने परिवारों से भी आग्रह किया कि वे मिलकर सोचें कि वे देश के लिए क्या योगदान दे सकते हैं। छोटे-छोटे कार्य जैसे पौधा लगाना या वंचित बच्चों को पढ़ाना भी देशभक्ति की भावना को मजबूत करते हैं। बच्चों को संघर्ष और मेहनत के माहौल में लेकर जाना चाहिए ताकि वे जीवन की सच्चाई और समाज के महत्व को समझ सकें।
- संघ में अहंकार और क्रेडिट की कोई चाह नहीं है। संघ का उद्देश्य देश में बड़ा बदलाव लाना है जिससे भारत का कायापलट हो और सुख-शांति फैलें। यह केवल प्रचार नहीं, बल्कि एक वास्तविकता है, जिसे संघ के अंदर आकर महसूस किया जा सकता है।
- अंत में, डॉ. भागवत ने आत्मनिर्भरता को हर कार्य की सबसे बड़ी कुंजी बताया। उन्होंने कहा कि हमें देश में बने सामान का अधिक से अधिक उपयोग करना चाहिए ताकि देश आत्मनिर्भर बन सके। देश की नीतियां ऐसी होनी चाहिए कि हम अपनी मर्जी से विदेशों के साथ संबंध बनाएं, बिना किसी बाहरी दबाव के। यही सच्चा स्वदेशी है। संघ की विचारधारा और उसके कार्य समाज में एक नया उत्साह और एकता का संदेश लेकर आगे बढ़ रही है। पंच परिवर्तन के लिए स्वयंसेवक आगामी समय में कार्य करेंगे।

















