पाकिस्तान का खूब देखा जाने वाला यूट्यूबर और इस्लाम का ‘प्रसारक’ मोहम्मद अली मिर्जा पकड़ा गया है। उस पर पैगंबर मोहम्मद के बारे में गलत बातें बोलने का आरोप लगाया गया है। इस मिर्जा नामक इस्लामी यूट्यूबर के यूट्यूब वीडियो को लाखों लोग देखते हैं। उसके लाखों फॉलोअर्स हैं। फिलहाल मिर्जा को 30 दिन की हिरासत में रखा गया है।
कराची में रहने वाला मिर्जा अपने यूट्यूब चैनल पर मजहब तथा समाज को लेकर वीडियो डालता आ रहा है। अपने बयानों के कारण वह अनेक बार विवादों में घिरा है और उसकी जान को खतरा हुआ है। कारण यह कि जिन्ना के देश में ऐसे कट्टर मजहबी लोग हैं कि मजहब या पैगंबर को लेकर जरा अटपटा सुना तो खून के प्यासे हो जाते हैं। इसी वजह से मिर्जा पर ही कम से कम चार बार भयंकर हमले हुए हैं।
पुलिस ने मिर्जा को ‘शांति बनाए रखने’ के कानून के तहत गिरफ्तार किया है। 1960 में बना यह कानून सरकार को ऐसे लोगों को पकड़ने का आदेश देता है, जो समाज में शांति के लिए खतरा बन सकते हों। लेकिन ह्यूमन राइट्स वॉच और एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी संस्थाएं कहती हैं, यह कानून सही नहीं है।

इसी तरह जिन्ना के देश में ‘ईशनिंदा’ या ‘ब्लासफेमी’ के विरुद्ध कानून का भी खूब प्रयोग किया जाता है, जिसमें ‘खुदा’ या ‘पैगंबर मोहम्मद’ या कुरान के विरुद्ध कुछ ‘गलत’ कहने, करने वाले को इस दानवी कानून के तहत बंद कर के प्रताड़ित किया जाता है। कई मौकों पर तो मजहबी उन्मादी दोषी को पीट—पीटकर या जला कर मार देते हैं। वहां यह कानून (Blasphemy Law) एक विवादास्पद विषय बन गया है, जिसने देश की सामाजिक संरचना, न्याय प्रणाली और मानवाधिकार स्थिति की असलियत उजागर की है। मूलतः ‘मजहबी भावनाओं की रक्षा’ के लिए बनाया गया यह कानून आज अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न, हिंसा और सामाजिक बहिष्कार का औजार बन चुका है।
पाकिस्तानी दंड संहिता की 295 से 298 तक की धाराएं ईशनिंदा से संबंधित हैं। इनमें सबसे कठोर है धारा 295-C, जिसके तहत पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने पर मृत्युदंड या आजीवन कारावास की सजा दी जा सकती है। ईशनिंदा के आरोप लगने मात्र से ही पाकिस्तान में भीड़ की हिंसा भड़क उठती है। कई मामलों में आरोपी को कानूनी प्रक्रिया से पहले ही मार दिया गया या जिंदा जला दिया गया। जैसे, 2021 में सियालकोट में एक श्रीलंकाई नागरिक को फैक्ट्री मजदूरों ने ईशनिंदा के आरोप में जिंदा जला दिया। 2014 में लाहौर के पास एक ईसाई दंपति को भीड़ ने जला दिया, जब उन पर कुरान का अपमान करने का आरोप लगा।
इन घटनाओं का अक्सर कोई ठोस सबूत नहीं होता, लेकिन मजहबी उन्माद और अफवाहें हिंसा भड़का देती हैं। ईशनिंदा कानून का सबसे अधिक दुरुपयोग हिंदू, ईसाई, अहमदी मुसलमानों और सिख समुदायों के खिलाफ होता आया है। लेकिन पाकिस्तान की लचर न्याय प्रणाली इन मामलों में अक्सर दबाव में रहती है। न्यायाधीशों को धमकियां मिलती हैं, वकीलों पर हमला होता है और आरोपी वर्षों तक जेल में बिना सुनवाई के बंद रहते हैं। संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठनों ने बार-बार पाकिस्तान से इन कानूनों की समीक्षा और सुधार की मांग की है।
















