गणेशोत्सव: आस्था, इतिहास और राष्ट्र का उत्सव
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गणेशोत्सव: आस्था, इतिहास और राष्ट्र का उत्सव

नौ दिनों की भक्ति के बाद मूर्तियों को समुद्र या नदियों में विसर्जित करने से पहले, हर्षोल्लास के साथ सड़कों पर जुलूस निकाला जाता है। विसर्जन कोई त्याग का कार्य नहीं, बल्कि एक पवित्र मुक्ति है।

Written byएम. एस. भुवनचंद्रनएम. एस. भुवनचंद्रन
Aug 27, 2025, 01:39 pm IST
inभारत, धर्म-संस्कृति
भगवान गणेश जी

भगवान गणेश जी

भारत में तर्क और भक्ति के बीच एक नाजुक संतुलन हमेशा से रहा है। हजारों साल पहले हमारे ऋषि-मुनि न केवल प्रार्थना करने वाले थे, बल्कि दूरदर्शी भी थे, जो मानवीय दृष्टि की सीमाओं से परे देख सकते थे। उन्होंने नौ ग्रहों के बीच की दूरियां मापीं और उन्हें नाम दिए। आधुनिक विज्ञान से बहुत पहले उनके अस्तित्व की पुष्टि की। उन्हीं ऋषियों ने हमें ज्ञान और बुद्धि के अवतार भगवान गणेश के बारे में भी बताया और उस त्यौहार की नींव रखी, जिसे हम सब आज गणेशोत्सव के रूप में मनाते हैं। यदि ब्रह्मांड के बारे में उनकी खोजें सत्य सिद्ध हुई हैं, तो गणेश भगवान के बारे में उनकी कही बातों पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है।

समृद्धि ने आत्मसंतुष्टि को जन्म दिया और अहंकार ने जड़ें जमा लीं

प्राचीन काल में, मनुष्य सौहार्दपूर्ण वातावरण में रहते थे। न कोई छल-कपट था, न कोई चोरी, खाद्य भंडार हमेशा खुले रहते थे और पड़ोसी अपनी जरूरत की चीजें बेरोकटोक ले सकते थे। समृद्धि ने आत्मसंतुष्टि को जन्म दिया और अहंकार ने जड़ें जमा लीं। कष्ट के बिना आनंद की अनुभूति प्राप्त नहीं की सकती। अंधकार के बिना प्रकाश की समझ नहीं हो सकती। इसी वातावरण में देवताओं और दानवों के बीच संघर्ष शुरू हुआ। आठ विनाशकारी दानवों से त्रस्त देवताओं ने शांति स्थापित करने के लिए भगवान गणेश के आठ रूपों अष्ट गणपति का आह्वान किया। प्रत्येक रूप ने एक-एक दानव ईर्ष्या, मोह, अहंकार, लोभ, अहंकार, क्रोध, मद और वासना का नाश किया। लेकिन पराजय से पहले दानवों ने विनती की थी कि उनकी आत्माओं को पृथ्वी पर भेजा जाए और इस प्रकार वे मानव हृदयों में प्रवेश करने में सफल रहे। तब से ये असुर गुण हमारे बीच निवास करते रहे हैं। घरों, मित्रों और समाज को तोड़ते रहे।

विसर्जन को देखना ही मोक्ष माना जाता है

गणेशोत्सव की शुरुआत एक दिव्य उपचार के रूप में की गई थी। भगवान गणेश की मिट्टी की मूर्ति की स्थापना कर नौ दिनों तक उनकी पूजा की जाती है। हर दिन भक्त उनके चरणों में अपनी कमजोरियों, पापों और कमियों को समर्पित करते हैं। माना जाता है कि आठवें दिन, सभी नकारात्मक गुण मूर्ति में समाहित हो जाते हैं। नौवें दिन अशुद्धियों से भरी मूर्ति को एक जुलूस के रूप में ले जाया जाता है और जल में विसर्जित कर दिया जाता है, जो ब्रह्मांडीय लोक में वापस लौट जाती है और इंसानों के कष्टों को अपने साथ ले जाती हैं। इस विसर्जन को देखना ही एक आशीर्वाद, शक्ति और मोक्ष का क्षण माना जाता है।

महाकाव्यों और प्राचीन ग्रंथों में गणेशोत्सव का जिक्र

यह त्यौहार केवल आधुनिक युग की उपज नहीं है। यह हमारे महाकाव्यों और प्राचीन ग्रंथों में निहित है। जब राजा नल ने अपना राज्य खो दिया और निराशा में इधर-उधर भटक रहे थे, तो उनकी पत्नी दमयंती को भाद्रपद माह में भगवान गणेश पूजा करने की सलाह दी गई। भगवान गणेश की पूजा करने से उनके सभी कष्ट दूर हुए। कुरुक्षेत्र युद्ध से पहले, पांडवों ने भगवान कृष्ण के आदेश पर गणेश पूजा की और उन्हें विजय प्राप्त हुई। सदियों बाद छत्रपति शिवाजी महाराज ने मुगलों के खिलाफ अपनी लड़ाई में इस त्यौहार से दिव्य शक्ति प्राप्त की। शिवाजी से प्रेरित होकर, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान गणेशोत्सव मनाया और इसे राष्ट्रीय पहचान दिलाई।

केरल में गणेशोत्सव ने लगभग साढ़े तीन दशक पहले संगठित रूप धारण किया, इसके बाद गणेशोत्सव ट्रस्ट का गठन हुआ। तब से लेकर आज तक, बिना किसी रुकावट के यह उत्सव जोर-शोर से मनाया जा रहा है। मिट्टी की मूर्तियां प्रेमपूर्वक गढ़ी जाती हैं, भगवान गणेश को कोझुकट्टई, उन्नीअप्पम और लड्डू का भोग लगाया जाता है। नौ दिनों की भक्ति के बाद मूर्तियों को समुद्र या नदियों में विसर्जित करने से पहले, हर्षोल्लास के साथ सड़कों पर जुलूस निकाला जाता है। विसर्जन कोई त्याग का कार्य नहीं, बल्कि एक पवित्र मुक्ति है। मूर्ति, भक्तों के पापों और कष्टों को अपने में समाहित कर लेती है, इसलिए उसकी दोबारा पूजा नहीं की जा सकती। यह भक्तों को आशीर्वाद देकर ब्रह्मांडीय लोक में वापस लौट जाती है। प्रार्थनाओं के साथ-साथ, दान-पुण्य के कार्यों, भूखों को भोजन कराना, वस्त्र या पुस्तकें दान करना, जरूरतमंदों की मदद करने को सच्ची भक्ति के रूप में प्रोत्साहित किया जाता है।

सभी बाधाओं को दूर करता है गणेशोत्सव

गणेशोत्सव सभी बाधाओं को दूर करता है। गणेश भगवान में आस्था रखने वाला कोई भी व्यक्ति इसमें भाग ले सकता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि ये किसी की पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि द्वेष या नकारात्मकता से मुक्त सच्ची प्रार्थना है। गणेशोत्सव एक उत्सव से कहीं बढ़कर है। यह एक शाश्वत परंपरा है जो पौराणिक कथाओं, इतिहास, अध्यात्म और राष्ट्रवाद को एक साथ पिरोती है। यह हमें याद दिलाता है कि ज्ञान ही शक्ति का मार्गदर्शन करता है, विनम्रता ही शक्ति का सार है और एकता ही भक्ति का सर्वोच्च रूप है। हर साल, जब मिट्टी की मूर्तियां पानी में विलीन होती हैं, तो वे अपने साथ हमारी कमजोरियों और कष्ट को बहा ले जाती हैं और हमें नए सिरे से शुरुआत करने के लिए तैयार छोड़ जाती हैं।

(लेखक – )

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