नई दिल्ली: नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित हो रहे संघ के तीन दिवसीय व्याख्यानमाला में सरसंघचालक डॉक्टर मोहन भागवत ने कहा कि संघ स्वयंसेवकों के व्यक्तिगत समर्पण से चलता है। उन्होंने कहा, ‘संघ की विशेषता है कि यह बाहरी स्रोतों पर निर्भर नहीं, बल्कि स्वयंसेवकों के व्यक्तिगत समर्पण पर चलता है। गुरु दक्षिणा संघ की कार्यपद्धति का अभिन्न हिस्सा है। इसके माध्यम से प्रत्येक स्वयंसेवक संगठन के प्रति अपनी आस्था और प्रतिबद्धता प्रकट करता है।
गुट नहीं बनाना, सबको संगठित करना है
उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया निरंतर जारी है। हमारा प्रयास होता है कि विचार, संस्कार और आचार ठीक रहे। इतनी हमें स्वयंसवेक की चिंता करनी है, संगठन की चिंता वो करते हैं। हम सबको मिलकर भारत में गुट नहीं बनाना है। सबको संगठित करना है। उन्होंने कहा कि संघ के निर्मिति का प्रयोजन भारत है। संघ के चलने का प्रयोजन भारत है। संघ की सार्थकता भारत के विश्व गुरु बनने में है।
‘संघ परावलंबी नहीं हैं’ : सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने ‘हिंदू राष्ट्र’ की अवधारणा पर कहीं बड़ी बात
डॉक्टर मोहन भागवत ने अपने पहले दिन के व्याख्यानमाला में कहा कि संघ के उत्थान की प्रक्रिया धीमी और लंबी रही है जो आज भी निरंतर जारी है। संघ भले हिंदू शब्द का उपयोग करता है, लेकिन उसका मर्म ‘वसुधैव कुटुंबकम’ है। संघ कार्य पूरी तरह स्वयंसेवकों द्वारा संचालित होता है। कार्यकर्ता स्वयं नए कार्यकर्ता तैयार करते हैं।

















