चीन का सरकारी भोंपू, कम्युनिस्ट पार्टी का मुखपत्र, राष्ट्रपति शी जिनपिंग का प्रवक्ता जैसे विशेषणों से जाना जाने वाला ग्लोबल टाइम्स अखबार एक बार फिर भारत को बेमांगी सलाहें दे रहा है, विदेश नीति पर ज्ञान बांट रहा है और अमेरिकी टैरिफ पर भारत के लिए करने के कामों का अपनी नजर से विश्लेषण कर रहा है। यह पहली बार नहीं है जब ग्लोबल टाइम्स ने भारत को केन्द्र में रखकर चीन की नीतियों को सराहा है और चीनी सरकार के मंतव्यों को आगे रखा है। वैसे इसी, ग्लोबल टाइम्स ने अभी कुछ समय पहले, जाने कैसे भारत की ‘स्वतंत्र और स्वाभिमानी विदेश नीति’ की तारीफों के पुल भी बांधे हैं। लेकिन अमेरिकी टैरिफ के संदर्भ में भारत की विदेश नीति पर टिप्पणी करना उसकी ‘अति समझदारी’ और छुपी मंशाओं को झलकाता है।
ग्लोबल टाइम्स ने भारत के संदर्भ में कल के अपने संस्करण में एक आलेख में टिप्पणी करते हुए कहा कि अमेरिकी टैरिफ को देखते हुए क्वाड सुरक्षा वार्ता की मेजबानी को तैयार हो रहे भारत का उत्साह और विश्वास कमजोर हुआ है। दरअसल यह निष्पक्ष टिप्पणी कम एक सोची-समझी रणनीति अधिक लगती है।
आखिर ऐसा क्यों लिखा गया होगा? इस बारे में कम्युनिस्ट चीन के इस अखबार के कुछ उद्देश्य स्पष्ट नजर आते हैं और वे हैं, एक, भारत-अमेरिका संबंधों में दरार दिखाना। दूसरे, संभवत: चीनी चाहते हैं कि क्वाड की एकता को कमजोर किया जाए। तीसरे, भारत को दबाव में लाकर चीन के हितों के अनुरूप व्यवहार करने को प्रेरित करना।

जैसा पहले बताया, ग्लोबल टाइम्स और अन्य चीनी मीडिया संस्थान पहले भी भारत को “सीख देने” की कोशिश कर चुके हैं। जैसे, गलवान संघर्ष (2020) के बाद भारत-चीन सैनिकों के बीच हिंसक झड़प के बाद ग्लोबल टाइम्स ने भारत को ‘संयम बरतने’ की सलाह दी थी और चेतावनी दी थी कि भारत को ‘अमेरिका के इशारे पर’ काम नहीं करना चाहिए। यह एक प्रकार की मनोवैज्ञानिक रणनीति थी जिससे भारत को दबाव में लाया जा सके।
इसके बाद भारत ने हांगकांग में लोकतंत्र समर्थक आंदोलन या ताइवान के मुद्दे पर तटस्थ रुख अपनाया, तब भी ग्लोबल टाइम्स ने भारत को ‘अपने हितों को समझने’ की सलाह दी थी। फिर, जब कोविड 19 नाम के चीनी वायरस के संदर्भ भारत ने विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO की जांच का समर्थन किया, तब ग्लोबल टाइम्स ने भारत को ‘अमेरिका की कठपुतली’ कहकर इस बात की आलोचना की थी।
इन सभी उदाहरणों में एक समानता है और वह यह कि भारत को चीन के दृष्टिकोण के अनुरूप चलने की सलाह देना और यदि भारत स्वतंत्र नीति अपनाए तो उसे ‘अविवेकपूर्ण’ या ‘अस्थिर’ बताना। जबकि दूसरी ओर, भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी विदेश नीति को बहुपक्षीय और संतुलित बनाया है। चाहे वह क्वाड हो, ब्रिक्स या एससीओ, भारत हर मंच पर अपनी स्वतंत्र आवाज मुखर की है।
क्वाड की बात करें तो यह केवल अमेरिका पर निर्भर नहीं है। यह एक रणनीतिक समूह है जिसमें भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका शामिल हैं। इसका उद्देश्य हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखना है। उधर, टैरिफ और व्यापार समझौते इससे अलग विषय हैं। भारत और अमेरिका के बीच मतभेद हो सकते हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि इससे सुरक्षा सहयोग पर असर पड़े।
अपनी ओर से भारत ने चीन के दबाव में आने से इंकार करते हुए कई बार स्पष्ट किया है कि उसकी नीति ‘भारत प्रथम’ की है और रहेगी। ग्लोबल टाइम्स की उक्त टिप्पणी भारत को कमजोर दिखाने की एक कोशिश ही कही जा सकती है, यह भारत की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय भूमिका को देखकर उपजा असंतोष भी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को चाहिए कि वह ऐसी टिप्पणियों को राजनीतिक प्रोपेगेंडा के तौर पर देखे, न कि इसे तथ्यात्मक विश्लेषण माने। भारत की राह बिल्कुल सही है और उसे अपनी नीति को स्वतंत्र और आत्मनिर्भर बनाए रखना होगा। हमें अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सहयोग और संवाद को प्राथमिकता तो देनी है, लेकिन किसी के दबाव में आने की अब कोई जरूरत नहीं है और यह बात विदेश मंत्री एस जयशंकर अनेक मौकों पर स्पष्ट कर चुके हैं।

















