कांग्रेस की अगुआई में विपक्ष द्वारा ‘वोट चोरी’ के नाम पर फैलाए जा रहे दुष्प्रचार को हाल ही में तीन बड़े झटके लगे हैं। पहला, उच्चतम न्यायालय ने बिहार में मतदाता सत्यापन (एसआईआर) पर रोक लगाने संबंधी याचिका खारिज कर दी। दूसरा, महाराष्ट्र में मतदाता सूची में विसंगतियों के आंकड़े जारी करने वाली संस्था सीएसडीएस ने अपने गलत आंकड़े वापस ले लिए और सार्वजनिक रूप से माफी मांगी। तीसरा, बिहार की एक महिला द्वारा नाम हटाए जाने की जो शिकायत की गई थी, वह जांच में झूठी साबित हुई। इसके बावजूद, यह आशंका बनी हुई है कि ‘वोट चोरी’ के इस दुष्प्रचार का सिलसिला थमेगा नहीं, बल्कि किसी नए रूप में देश के अन्य राज्यों में भी फैलाने की कोशिश की जा सकती है।
झूठ को बनाया हथियार
नकारात्मक शक्तियों का सबसे बड़ा हथियार झूठ होता है। वे झूठ की ऐसी धुंध बुनते हैं कि सत्य पर संदेह होने लगता है, जनसाधारण भ्रमित हो जाता है और वास्तविकता पर शंकाएं उठने लगती हैं। इतिहास में अनेक विचारकों ने सत्ता पाने के लिए ऐसी रणनीतियों के सूत्र बताए हैं। समय के साथ इन कूटनीतियों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार कुछ नए तत्व भी जुड़ते चले गए। इसका एक खास पहलू यह है कि झूठ पर आधारित एक विशेष ‘ईकोसिस्टम’ तैयार किया जाता है, जहां बार-बार झूठ बोला जाता है, उसे निरंतर फैलाया जाता है और पकड़े जाने पर माफी मांग ली जाती है ताकि तुरंत एक नया झूठ गढ़कर वही खेल दोबारा शुरू किया जा सके। शब्द और शैली बदलते रहते हैं, लेकिन लक्ष्य हमेशा एक ही रहता है।

वरिष्ठ पत्रकार
हाल ही में बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के दौरान इसी तरह की कूटनीति अपनाई गई थी। भारत में भी इन दिनों यह प्रवृत्ति कांग्रेस और कुछ अन्य विपक्षी दलों के बीच देखने को मिल रही है। विषय चाहे जो भी हो और भाषा कितनी भी बदल दी जाए, विपक्षी हमलों का असली निशाना सदैव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वे संवैधानिक संस्थाएं ही होती हैं, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था की रीढ़ मानी जाती हैं। न्यायपालिका, चुनाव आयोग और प्रवर्तन निदेशालय जैसी संस्थाओं पर लगातार किए जा रहे हमले इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। यह रणनीति कोई नई नहीं है। वामपंथ और माओवादी विचारधाराएं हमेशा से इसी पद्धति को अपनाती रही हैं। एक ओर संगठित हिंसा और भय के सहारे सत्ता को चुनौती देना, वहीं दूसरी ओर शहरी समूहों द्वारा नकारात्मक कथा गढ़कर समाज में अविश्वास और भ्रम फैलाना। दुर्भाग्य से आज कुछ विपक्षी दल, खासकर कांग्रेस और तथाकथित ‘इंडी’ गठबंधन इसी फार्मूले पर चलते दिखाई दे रहे हैं।
2019 के लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद संवैधानिक संस्थाओं पर हमले और सच्चाई को ढकने के लिए धुंध फैलाने की राजनीति और तेज हो गई। पुलवामा में आतंकी हमले और उसके बाद भारत की सर्जिकल स्ट्राइक के उपरांत यह आक्रामकता और बढ़ी। अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य भी इस प्रवृत्ति को दिशा देता रहा—पाकिस्तान और अमेरिका की बढ़ती नजदीकियां, भारत पर अमेरिका द्वारा टैरिफ थोपना और बांग्लादेशी नेताओं की चीन यात्राएं इसी इसी पृष्ठभूमि में देखी जा सकती हैं। इसी संदर्भ में भारत में ‘वोट चोरी’ का नारा गढ़ा गया। इसकी शैली भी सुनियोजित है—हर दिन एक नया आरोप, एक नया संदेह। और जब कोई झूठ सामने आकर टूटता है तो तुरंत दूसरा झूठ उसकी जगह ले लेता है। झूठ की इस राख में सत्य को ढकने का प्रयास होता है ताकि जनता के सामने भ्रम बना रहे। लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं होती, बल्कि ऐसी राजनीति भी होती है जो संस्थाओं को कमजोर कर, जनता के विश्वास को खोखला करती है।
वोट चोरी का झूठ और लोकतंत्र पर प्रहार
राहुल गांधी ने हाल के दिनों में मतदाता सूचियों में विसंगति और कथित ‘वोट चोरी’ को लेकर जितने आरोप लगाए, उनमें से लगभग हर एक कुछ घंटों के भीतर ही झूठा साबित हो गया। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि आरोप झूठे साबित होने पर भी उनका सिलसिला थमता नहीं, बल्कि तुरंत एक नया आरोप सामने आ जाता है। यह पैटर्न ही इस पूरे दुष्प्रचार अभियान की असली पहचान बन चुका है।
पिछले सप्ताह कर्नाटक की महादेवापुरा विधानसभा क्षेत्र में इसका ताज़ा उदाहरण मिला। राहुल गांधी ने वहां दो महिलाओं, शकुन रानी और मिंता देवी के नाम लेकर सनसनीखेज आरोप लगाए। उन्होंने एक मतदाता पहचान-पत्र दिखाकर प्रेस कांफ्रेंस में शकुन रानी पर ‘डबल वोट’ होने का आरोप लगाया।
जांच में पता चला कि शकुन देवी ने एक ही बार मतदान किया था, जबकि मिंता देवी की उम्र 35 वर्ष है। इस प्रकार राहुल गांधी का झूठ उसी दिन उजागर हो गया था। कांग्रेस और ‘इंडी’ गठबंधन ने जिस मुद्दे पर सड़क से लेकर संसद तक वितंडा खड़ा किया, जिस मिंता देवी की तस्वीर टी-शर्ट पर छपवा कर प्रदर्शन किया, उसी ने इनकी झूठ की हवा निकाल दी। जांच में पता चला कि यह वोट चोरी का मामला नहीं था। यह कोई तकनीकी धोखाधड़ी नहीं थी, बल्कि तकनीकी गड़बड़ी के चलते उनकी उम्र अधिक दर्ज हो गई। फिर भी विपक्ष की मुहिम थमी नहीं। अब एक नया रूप सामने आया। तीन अलग-अलग घटनाएं घटीं। स्वर अलग-अलग, लेकिन लक्ष्य वही- मतदाता सूची और ‘वोट चोरी’ की कथा। इस बार राहुल गांधी की शैली में भी बदलाव देखने को मिला। जहां कर्नाटक में आरोप था ‘फर्जी मतदान’ का, वहीं बिहार में यह बदलकर ‘मतदाता सूची से नाम हटाने’ का हो गया।

इस प्रकार के लगातार झूठे आरोपों से यह स्पष्ट होता है कि असली उद्देश्य सच्चाई बताना नहीं, बल्कि समाज में निरंतर भ्रम और अविश्वास की दीवार खड़ी करना है। जनता के मन में शंका उत्पन्न की जाए, संस्थाओं की निस्पक्षता पर सवाल उठाए जाएं और लोकतंत्र की जड़ों में अविश्वास का जहर डाला जाए, यही इस रणनीति का मूल है। वोट और मतदाता सूची जैसी संवेदनशील संस्थाएं लोकतंत्र की रीढ़ होती हैं। जब उन पर बार-बार तथ्यहीन हमले किए जाते हैं, तो यह केवल राजनीतिक विपक्ष का अभियान नहीं रहता, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने का षड्यंत्र बन जाता है। राहुल गांधी और उनके सहयोगियों का यह रवैया इसी दिशा की ओर संकेत करता है। समाज के सामने अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि क्या जनता इन झूठों की परतों को पहचानकर सच्चाई की दिशा में खड़ी होगी या फिर बार-बार दोहराए जाने वाले आरोपों की धुंध में उलझती जाएगी? लोकतंत्र की मजबूती का उत्तर इसी में छिपा है।
कांग्रेस और ‘इंडी’ की नई शैली
इन दिनों बिहार में मतदाता सूची का सत्यापन (एसआईआर) चल रहा है। कांग्रेस और इंडी गठबंधन इससे असहमत हैं और आरोप लगा रहे हैं कि मतदाता सूची से योजनाबद्ध तरीके से नाम काटे जा रहे हैं। इस आरोप को बल देने के लिए हाल ही में रंजू देवी नामक महिला का एक वीडियो सामने लाया गया। वीडियो में वह राहुल गांधी के सामने कहती दिखती हैं, ‘‘उनके परिवार के छह सदस्यों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं, जबकि वे पिछले तीन-चार चुनावों से मतदान करते आ रहे हैं।’’ स्वाभाविक रूप से यह वीडियो मीडिया और सोशल मीडिया पर तुरंत प्रचारित किया गया।
लेकिन कुछ ही घंटे बाद एक दूसरा वीडियो सामने आया। इस बार रंजू देवी खुद कह रही थीं, ‘‘मैं पढ़ी-लिखी नहीं हूं। मुझे कहा गया था कि तुम्हारे परिवार का वोट कट गया है और इसकी शिकायत राहुल गांधी जी से करनी है। लेकिन अब पता चला है कि हमारे पूरे परिवार का नाम मतदाता सूची में शामिल है, किसी का नाम नहीं कटा।’’

इससे यह भी स्पष्ट होता है कि आरोप गढ़ने की शैली समय के साथ बदली जाती है। कर्नाटक में राहुल गांधी ने महिलाओं के नाम लेकर ‘फर्जी वोट’ का आरोप लगाया था, जबकि बिहार में थोड़ा अलग रास्ता अपनाया। यहां केवल महिला ही बोल रही थी और राहुल केवल प्रश्न पूछते दिख रहे थे। यह तकनीक एक दिलचस्प बदलाव की ओर इशारा करती है। आरोप झूठा साबित भी हो जाए तो भी राहुल गांधी प्रत्यक्ष झूठ बोलने के कठघरे में नहीं आते। रणनीति यही है—झूठ बोलो, प्रचार फैलाओ और अपने लिए बचाव का रास्ता खुला रखो। नतीजा, भले ही यह ‘प्रचार’ विफल हो जाए, लेकिन संस्थाओं पर संदेह का धुंध फैलाने का काम हो ही जाता है। यही इस राजनीति की असली सफलता मानी जा सकती है।
कर्नाटक और बिहार की इन तीनों महिलाओं के चयन में एक और बिंदु विचारणीय है। ये सभी महिलाएं हिंदू समाज के अपेक्षाकृत कमजोर और हाशिये पर खड़े वर्ग से आती हैं। शिक्षा के स्तर पर भी ये पिछड़ी हुई हैं। यह कोई संयोग नहीं माना जा सकता। मिशनरी तंत्र और वामपंथी राजनीति, दोनों ही प्रायः अपने लक्ष्यों को साधने के लिए इसी वर्ग को साधन बनाते रहे हैं। इसी प्रवृत्ति के तहत ‘वोट चोरी’ के आरोपों में भी इन्हीं महिलाओं को सामने लाया गया। झूठ गढ़ा गया, इनकी सादगी और अनपढ़ता का उपयोग कर उसे प्रचारित किया गया और फिर उसी झूठ के सहारे आगे बढ़ने का प्रयास हुआ। यानी लक्ष्य संवैधानिक संस्थाओं को कठघरे में खड़ा करना था और साधन बनीं समाज के सबसे कमजोर वर्ग की महिलाएं।
सीएसडीएस पर होगी कार्रवाई !
भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) ने 20 अगस्त को सीएसडीएस को कारण बताओ नोटिस जारी कर चुनाव आयोग के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) अभ्यास और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों पर किए गए अध्ययनों के लिए वित्तीय स्रोतों का खुलासा करने को कहा है। परिषद ने संस्थान पर जानबूझकर डेटा में हेरफेर करने और संवैधानिक प्राधिकरण चुनाव आयोग की विश्वसनीयता को कमजोर करने का आरोप लगाया है। इसके अतिरिक्त, आईसीएसएसआर ने सीएसडीएस पर कई अनियमितताओं का भी आरोप लगाया है, जिनमें यूजीसी नियमों का उल्लंघन कर संकाय नियुक्तियों में गड़बड़ी, शासी निकाय के अध्यक्ष के चुनाव न कराना, निदेशक की नियुक्ति में अपारदर्शी प्रक्रिया और विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम के तहत प्राप्त धन के उपयोग का विवरण न जमा करना शामिल है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, सीएसडीएस के वार्षिक खातों का कैग या एजी से ऑडिट न कराना तथा सरकारी आवास में रहने वाले कर्मचारियों को उनके जीवनसाथी के लिए आवंटित सरकारी आवास के बावजूद हाउस रेंट अलाउंस का भुगतान करना भी अनुदान नियमों का गंभीर उल्लंघन माना गया है। सीएसडीएस को नोटिस का जवाब सात दिनों के भीतर देना होगा। यदि जवाब नहीं मिला, तो आईसीएसएसआर अनुदान रद्द करने या वापस लेने सहित अन्य कड़ी कार्रवाई कर सकता है। परिषद ने यह भी बताया कि सीएसडीएस को पहले भी कई शिकायतों के माध्यम से अनियमितताओं की सूचना दी गई थी, लेकिन उस पर कार्रवाई नहीं हुई।
सीएसडीएस का झूठ और माफी
दूसरी घटना दिल्ली स्थित संस्था सीएसडीएस (सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज) से जुड़ी हुई है। यह संस्था समाज के विभिन्न वर्गों पर कथित अध्ययन करने और चुनाव सर्वेक्षण संबंधी रिपोर्ट जारी करने के लिए जानी जाती है। सीएसडीएस को भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) सहित कई सरकारी और प्रतिष्ठित राष्ट्रीय संस्थानों से करोड़ों रुपये का अनुदान मिलता है। इतना ही नहीं, कुछ विदेशी संस्थाएं भी इसे आर्थिक सहयोग देती हैं।
17 अगस्त को सीएसडीएस से जुड़े संजय कुमार ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डाली। इसमें दावा किया गया कि महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान मतदाता सूचियों में भारी विसंगतियां सामने आई हैं। उन्होंने कहा कि नासिक वेस्ट में लोकसभा चुनाव के बाद विधानसभा चुनाव तक मतदाताओं की संख्या में 47.38 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि हिंगणा में यह बढ़ोतरी 42.08 प्रतिशत रही। इतना ही नहीं, यह भी आरोप लगाया गया कि रामटेक और देवलाली में मतदाताओं की संख्या में लगभग 40 प्रतिशत की कमी आई है। लेकिन कुछ ही घंटों में वास्तविकता सामने आ गई। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, नासिक वेस्ट में मतदाता संख्या में वृद्धि मात्र 6 प्रतिशत और हिंगणा में 5.9 प्रतिशत रही। यानी संजय कुमार द्वारा प्रस्तुत आंकड़े पूरी तरह झूठे और भ्रामक साबित हुए। परिणामस्वरूप, सीएसडीएस को न केवल अपने आंकड़े वापस लेने पड़े, बल्कि सार्वजनिक रूप से माफी भी मांगनी पड़ी।
सच यह था कि रामटेक और देवलाली, दोनों ही क्षेत्रों में मतदाता घटे नहीं थे, बल्कि लगभग 3 से 4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई थी। लेकिन इसके ठीक विपरीत, सीएसडीएस द्वारा जारी झूठे आंकड़ों को कांग्रेस ने तुरंत हाथों-हाथ लिया और पूरे देश में प्रचारित कर दिया। लेकिन सच अधिक समय तक छिपा नहीं रह सका। 60 घंटे के भीतर ही संजय कुमार ने अपनी पोस्ट हटाई और सार्वजनिक रूप से माफी मांगी भी मांगी।

इस झूठे दावे के विरुद्ध 19 अगस्त को दो महत्वपूर्ण घटनाएं घटीं। पहली, सीएसडीएस को अनुदान देने वाली संस्था आईसीएसएसआर ने पूरे मामले का संज्ञान लिया। परिषद ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ है और सीएसडीएस व संजय कुमार के भ्रामक आंकड़े न केवल इसकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने वाले हैं, बल्कि गंभीर अपराध की श्रेणी में भी आते हैं। साथ ही, इसे अनुदान नियमों का उल्लंघन भी माना गया। दूसरी, उसी दिन दिल्ली के अधिवक्ता विनीत जिंदल ने संजय कुमार और राहुल गांधी के विरुद्ध पुलिस में नामजद शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि दोनों ने सोशल मीडिया और प्रेस के माध्यम से मनगढ़ंत व फर्जी आंकड़े फैलाकर समाज को भ्रमित किया।
यह भारत के लोकतंत्र को कमजोर करने की सुनियोजित कोशिश है। उन्होंने ऐसी हरकतों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की है। इन घटनाओं के दबाव के तुरंत बाद संजय कुमार ने अपनी पोस्ट हटा ली और माफी मांगते हुए सफाई दी कि ‘आंकड़े पढ़ने में भ्रम हो गया था।’ लेकिन यह सफाई अविश्वसनीय प्रतीत होती है। संजय कुमार नौसिखिए नहीं हैं। वे वर्षों से चुनावी आंकड़ों के विशेषज्ञ माने जाते रहे हैं और उनके पास प्रशिक्षित विशेषज्ञों की बड़ी टीम भी मौजूद है। मतदाता वृद्धि या कमी जैसे आंकड़ों में इतना बड़ा अंतर कोई साधारण व्यक्ति भी देखकर चौंक सकता है। ऐसे में यह मान लेना कि आंकड़े बिना सोचे-समझे प्रकाशित कर दिए गए, गले से नीचे नहीं उतरता।
सच्चाई यही है कि इन आंकड़ों का देश और विदेश में जिस तीव्रता से प्रचार हुआ, वह संयोग नहीं, बल्कि सुनियोजित रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है। बहरहाल, महाराष्ट्र में नागपुर और नासिक पुलिस ने चुनाव संबंधी झूठी जानकारी देने पर सीएसडीएस के शोध कार्यक्रम लोकनीति के सह-निदेशक संजय कुमार के खिलाफ महाराष्ट्र में भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं में अलग-अलग दो एफआईआर दर्ज की हैं। दो तहसीलदारों की शिकायत पर यह कार्रवाई की गई है।

अदालतों से लगे झटके
इसी तरह, नवंबर 2024 में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में धांधली के आरोप लगाते हुए वंचित बहुजन आघाड़ी (वीबीए) नेता चेतन चंद्रकांत अहिरे ने याचिका दायर की थी। अहिरे का दावा था कि मतदान समाप्ति के बाद 75 लाख से अधिक फर्जी वोट डाले गए। लेकिन बॉम्बे उच्च न्यायालय ने याचिका को ‘ठोस आधारहीन’ बताते हुए खारिज कर दिया। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने भी 18 अगस्त को उच्च न्यायालय के फैसले को सही ठहराते हुए याचिका को निरस्त कर दिया। यह फैसला चुनाव आयोग के लिए राहतभरा है, जबकि विपक्ष के फर्जी मतदान के आरोपों को बड़ा झटका लगा है।
दूसरी ओर, ‘वोट चोरी’ और मतदाता सूची में हेरफेर के बहाने से दुष्प्रचार कर रहे कांग्रेस और ‘इंडी’ गठबंधन को तीसरा बड़ा झटका उच्चतम न्यायालय से मिला है। इन दिनों बिहार में मतदाता सूची का सत्यापन कार्य चल रहा है, जिसे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कहा जाता है। इसे रोकने के लिए कांग्रेस और उसके गठबंधन ने सड़क से संसद तक पूरी ताकत झोंक दी। बिहार के ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में सभाएं आयोजित कर मतदाता सूची से नाम काटे जाने का भय दिखाया गया। मीडिया और सोशल मीडिया पर भी इसे जमकर उछाला गया।

अंततः मामला उच्चतम न्यायालय तक पहुंचा। यहां कांग्रेस की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी जैसे दिग्गज वकील पेश हुए। उन्होंने एसआईआर प्रक्रिया को रोकने की मांग की। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने इस याचिका को ठुकराते हुए साफ कह दिया कि ‘पहचान के लिए प्रमाण के रूप में दस्तावेजों की संख्या बढ़ाना मतदाता के हित में है।’ अदालत ने चुनाव आयोग की कार्रवाई को पूरी तरह उचित करार दिया और कहा कि नागरिकों तथा गैर-नागरिकों को मतदाता सूची में शामिल या बाहर करना चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में आता है। साथ ही, न्यायालय ने आयोग की प्रक्रिया को संविधान सम्मत भी माना।
यहां एक सवाल उठता है, कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी जैसे वरिष्ठ अधिवक्ता संविधान और चुनाव आयोग के अधिकारों से अच्छी तरह परिचित हैं। ऐसे में क्या वे सचमुच इन बुनियादी प्रावधानों से अनभिज्ञ थे? शायद नहीं। अदालत तक पहुंचना और वहां यह बहस खड़ी करना वस्तुतः एक मनोवैज्ञानिक रणनीति का हिस्सा है। इस रणनीति का लक्ष्य सरल है—किसी झूठ को बार-बार, हर मंच से दोहराओ ताकि आम व्यक्ति भी उसे सच मानने लगे। यही कारण है कि सड़क पर धरना, संसद में हंगामा और अदालत में दलील—सभी मंचों से एक ही नैरेटिव गढ़ी जाती है। उच्चतम न्यायालय में प्रस्तुत तर्क भी इसी मानसिक खेल का हिस्सा प्रतीत होते हैं।

…तो जारी रहेगा दुष्प्रचार अभियान
कर्नाटक व बिहार की महिलाओं के स्पष्टीकरण, महाराष्ट्र में झूठे आंकड़े वापस लेने और उच्चतम न्यायालय द्वारा याचिका खारिज कर देने के बाद भले ही ‘वोट चोरी’ के दुष्प्रचार का सच सामने आ गया हो, लेकिन इसके थमने की संभावना नगण्य है। इसके पीछे दो कारक साफ दिखते हैं—सत्ता पाने के लिए कुछ विपक्षी दलों की अधीरता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत विरोधी शक्तियों की मानसिकता।
यह भी याद रखना होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत के लोकतंत्र पर राहुल गांधी के हमले कोई नई बात नहीं हैं। वे भारत के भीतर ही नहीं, बल्कि विदेश यात्राओं के दौरान भी ‘भारत में लोकतंत्र समाप्त होने’ जैसी बातें दोहराते रहे हैं। ‘लाल किताब’ जैसी प्रतीकात्मक सामग्री को मंच पर लहराना, पहले ईवीएम को कठघरे में खड़ा करना और अब ‘वोट चोरी’ तथा मतदाता सूची में हेरफेर जैसे आरोपों को बार-बार प्रचारित करना—यह सब महज साधारण राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है। लेकिन इसकी वास्तविता बार-बार सामने आई।
जहां एक ओर सच्चाई सामने आ रही थी, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस इस दुष्प्रचार की भौगोलिक विस्तार रणनीति पर काम कर रही थी। इसका सटीक उदाहरण 19 अगस्त को मध्य प्रदेश में देखने को मिला। उस दिन मध्य प्रदेश कांग्रेस ने मीडिया को बुलाकर प्रदेश के 2023 विधानसभा चुनाव को लेकर ‘वोट चोरी’ का आरोप दोहराया और उन सीटों की सूची तक जारी की, जहां भाजपा बेहद कम अंतर से विजयी हुई थी। यह साफ संकेत है कि यह दुष्प्रचार अभियान किसी एक प्रदेश तक सीमित नहीं, बल्कि राष्ट्रव्यापी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है।
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी कांग्रेस के सुर में सुर मिलाते हुए ‘वोट चोरी’ का आरोप दोहराया। वस्तुतः यह केवल एक राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र को कमजोर करने के लिए रचा गया वह अभियान है, जिसे अंतरराष्ट्रीय शक्तियां भी समर्थन देती रही हैं। वे शक्तियां नहीं चाहतीं कि भारत अपनी उभरती हुई विकास यात्रा को जारी रखे।
आज भारत तीव्र गति से आगे बढ़ते हुए विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दहलीज पर खड़ा है। यह परिस्थिति स्वाभाविक रूप से कई वैश्विक ताकतों को विचलित कर रही है। इसीलिए भारत में अशांति और अस्थिरता फैलाकर सत्ता को कमजोर करने के प्रयास तेज हो रहे हैं। पाकिस्तान-अमेरिका की नई नजदीकियां और चीन-बांग्लादेश की बढ़ी हुई सक्रियता इसी दिशा की ओर इशारा करती हैं।

सिर्फ यही नहीं, जॉर्ज सोरोस जैसे पूंजीपतियों के नाम और ‘टूलकिट’ जैसी अवधारणाएं भी बार-बार सामने आती रही हैं। इनके साथ जुड़े संस्थानों द्वारा भारत में किस प्रकार के एनजीओ को फंडिंग होती है और उन एनजीओ से किन राजनीतिक दलों का रिश्ता है, यह अब कोई रहस्य नहीं रह गया है। यही संस्थान सर्वेक्षणों और अध्ययनों के नाम पर हिंदू समाज को बांटने के लिए नए-नए फार्मूले तलाशते रहते हैं। उन्हें भलीभांति ज्ञात है कि भारतीय समाज में जितना अधिक विखराव होगा, उतना ही लोकतंत्र की नींव पर
आघात लगेगा।
‘वोट चोरी’ का मौजूदा नारा और उसे लेकर छेड़ा गया आंदोलन इसी रणनीति का नया रूप है। आरोपों का तरीका चाहे नया क्यों न हो, लेकिन निशाना वही है—प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा और भारतीय लोकतंत्र की संस्थाएं। इसलिए यह मान लेना भूल होगी कि यह अभियान यहीं थम जाएगा। निकट भविष्य में इसे भाजपा शासित अन्य राज्यों में फैलाने की पूरी संभावना है। यही कारण है कि आने वाले समय में जनता और लोकतांत्रिक संस्थाओं को अतिरिक्त सतर्कता और सजगता बरतने की आवश्यकता है।

















