पड़ोसी ही बन गए थे दुश्मन'
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विभाजन – विभीषिका : ‘पड़ोसी ही बन गए थे दुश्मन’

फगवाड़ा में रहने वाली कृष्णा रानी की आयु 80 बरस से अधिक है। वे उन चंद भाग्यशाली लोगों में से हैं जो विभाजन के भीषण काल में अपने माता-पिता के साथ सही-सलामत इस पार भारत पहुंच सकीं

Written byप्रमोद कौशलप्रमोद कौशल
Aug 21, 2025, 11:13 pm IST
inभारत, विश्लेषण
कृष्णा रानी , मूल स्थान - ननकाना साहिब

कृष्णा रानी , मूल स्थान - ननकाना साहिब

India Pakistan Partition: फगवाड़ा में रहने वाली कृष्णा रानी की आयु 80 बरस से अधिक है। वे उन चंद भाग्यशाली लोगों में से हैं जो विभाजन के भीषण काल में अपने माता-पिता के साथ सही-सलामत इस पार भारत पहुंच सकीं।

उस दौर को याद करते हुए वे कहती हैं, ”मुझे उस समय की बहुत ज़्यादा बातें याद तो नहीं हैं, लेकिन पिताजी—जिन्हें हम ‘भापा जी’ कहकर पुकारते थे, वे हमें बताया करते थे कि हमारा परिवार वहां बहुत अच्छे हालात में था। हमारा व्यवसाय चल रहा था, घर में किसी चीज़ की कमी नहीं थी। हम खुश थे, संपन्न थे और जीवन सामान्य रूप से आगे बढ़ रहा था।” लेकिन यह सुख-शांति बहुत दिनों तक नहीं टिक सकी।

अचानक एक दिन सब कुछ बदल गया। खबर आई कि अब यह इलाका पाकिस्तान में है और हमें इसे छोड़कर जाना होगा।’’ कृष्णा रानी बताती हैं, ” हमारा गांव ननकाना साहिब के पास था, यह एक शांतिपूर्ण इलाका था जहां हिंदू-मुसलमान मिल-जुलकर रहते थे। परंतु बंटवारे की घोषणा होते ही मानो पूरे माहौल में जहर घुल गया। जो मुसलमान पड़ोसी पहले हमारे साथ बड़े प्रेम से रहते थे, वही अचानक दुश्मन बन गए थे, चीखें सुनाई देतीं थीं, एक भय का वातावरण-सा बन गया था”

वे बताती हैं, ‘‘मुझे बस इतना याद है कि मां और पिताजी मुझे और मेरी छोटी बहन को बारी-बारी से गोद में उठाए चल रहे थे। कभी मां गोद में लेतीं, कभी पिताजी। हम निरंतर चलते जा रहे थे—कभी खेतों से, कभी पगडंडियों से, शायद कहीं किसी बैलगाड़ी या ट्रक में भी थोड़ी देर बैठे। मुझे सिर्फ मां की कांपती आवाज और पिताजी की बेचैनी याद है।

रास्ते कच्चे थे, डरावने थे। चारों ओर अफरा-तफरी और चीख-पुकार मची हुई थी। हमने रास्ते में कई जगह धुएं के गुबार देखे। बड़ी कठिनाई से हम इस पार भारत पहुंचे।” सबसे पहले उनका परिवार अमृतसर में रुका। वहां कुछ दिन शरणार्थी शिविरों में गुजारने के बाद वे सरहिंद और अंततः फगवाड़ा आकर बस गए। सरकार ने उन्हें एक घर दिया, जो हमारा स्थायी ठिकाना बना।

भापा जी ने फिर से व्यापार शुरू किया। धीरे-धीरे सब कुछ थोड़ा-थोड़ा करके सामान्य होने लगा। कुछ दिनों बाद उनके ननिहाल के लोग भी इसी इलाके में आकर बस गए। परिवार फिर से एक हुआ, लेकिन पिताजी और मां के मन में एक खालीपन हमेशा बना रहा। दोनों मरने तक उस पीड़ा को नहीं भूल पाए जो बंटवारे के वक्त उन्होंने सही थी।

-कृष्णा रानी , मूल स्थान – ननकाना साहिब

 

 

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प्रमोद कौशल
प्रमोद कौशल
25+ वर्षों के पत्रकारिता अनुभव के साथ स्वतंत्र और टीम-आधारित काम में सक्षम। नेतृत्व, टीम विकास और प्रेरणा में सिद्ध कौशल। विशेषज्ञता: भारतीय व कनाडाई राजनीति। [Read more]
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