सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के निदेशक संजय कुमार ने हाल ही में एक ट्वीट के जरिए महाराष्ट्र चुनावों से संबंधित गलत डेटा साझा करने की बात स्वीकारी और इसके लिए माफी मांगी। उन्होंने कहा कि 2024 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों के डेटा की तुलना में त्रुटि हुई, जिसके कारण गलत जानकारी सामने आई। संजय ने अपने ट्वीट में लिखा, “मैं महाराष्ट्र चुनाव को लेकर किए गए ट्वीट के लिए ईमानदारी से माफी मांगता हूं। हमारी डेटा टीम ने डेटा को गलत तरीके से पढ़ा, जिसके बाद ट्वीट हटा लिया गया। मेरा गलत सूचना फैलाने का कोई इरादा नहीं था।”
हालांकि, इस माफी के समय तक कांग्रेस ने इस गलत डेटा का इस्तेमाल चुनाव आयोग (ईसीआई) पर सवाल उठाने के लिए कर लिया था। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा सहित कई नेताओं ने इस डेटा के आधार पर चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए और इसे राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। कांग्रेस के मुखपत्र नेशनल हेराल्ड ने भी इस डेटा को प्रमुखता से प्रकाशित किया। लेकिन जब डेटा की गलती सामने आई, तो कांग्रेस ने इससे किनारा करने की कोशिश की। कई नेताओं ने अपने ट्वीट और पोस्ट हटा लिए, लेकिन अब तक किसी ने इस मुद्दे पर सार्वजनिक माफी नहीं मांगी।
लोकनीति-सीएसडीएस ने माफी मांग ली, नेशनल हेराल्ड कब माफी मांगेगा
लोकनीति-सीएसडीएस के एक सर्वेक्षण में दावा किया गया कि चुनाव आयोग में जनता का भरोसा तेजी से घटा है। नेशनल हेराल्ड, 2025-08-18, को इस समाचार को प्रमुखता के प्रकाशित किया। इसके आधार पर कांग्रेस के समाचार पत्र ने नैरेटिव बनाने का प्रयास किया। संजय कुमार ने माफी मांग ली है, क्या अब नेशनल हेराल्ड भी माफी मांगेगा? इस सर्वे ने मतदाता सूची के विशेष संशोधन प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए, जिसे गरीब और वंचित वर्गों के मतदान अधिकारों के लिए खतरा बताया गया। इस सर्वेक्षण ने विपक्ष को चुनाव आयोग पर हमला करने का मौका दिया, लेकिन संजय कुमार की माफी ने सीएसडीएस की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए।

पवन खेड़ा ने जब मुंह आसमान की तरफ करके थूका
2024 के लोकसभा चुनाव के बाद पवन खेड़ा ने एक टीवी डिबेट में एक्सिस माय इंडिया के प्रदीप गुप्ता पर तीखा हमला बोला था, क्योंकि उनका सर्वेक्षण पूरी तरह सटीक नहीं था। खेड़ा ने तब सर्वेक्षणों में गलती की संभावना को खारिज करते हुए इसे जानबूझकर की गई साजिश करार दिया था। लेकिन अब जब सीएसडीएस की गलती सामने आई है, तो कांग्रेस असमंजस में है। पवन खेड़ा एक्स पर अपनी टिप्पणी डिलीट कर चुके हैं और अब तक फेक न्यूज फैलाने के लिए सार्वजनिक तौर पर कोई सफाई भी नहीं दी है।

राहुल गांधी का डर
कथित तौर पर राहुल गांधी ने भी इस गलत डेटा का इस्तेमाल कर चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने प्रेस कांफ्रेन्स करके जब दावा किया कि मतदाता सूचियों में हेरफेर हुआ है, लेकिन उनके द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों में कोई आधिकारिक मुहर या हस्ताक्षर नहीं थे। ऐसे में चुनाव आयोग ने राहुल गांधी से आधिकारिक शिकायत दर्ज करने को कहा। राहुल गांधी जानते थे कि फर्जी दस्तावेज प्रस्तुत करना भारतीय न्याय संहिता की धारा 238 के तहत सात साल की सजा का कारण बन सकता है। इसलिए वे चुनाव आयोग के बुलाने पर भी अब तक नहीं गए।
संदेह के घेरे में सीएसडीएस
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सीएसडीएस से संजय कुमार के साथ साथ, योगेंद्र यादव और अभय कुमार दुबे का पुराना संबंध। इन तीनों का सीएसडीएस से संबंध इस विवाद को और जटिल बनाता है। योगेंद्र यादव अब स्वराज इंडिया से जुड़े हैं, जबकि अभय कुमार दुबे अभी भी सीएसडीएस से संबद्ध हैं। इसके अलावा, सीएसडीएस फोर्ड फाउंडेशन जैसे विदेशी संगठनों से फंडिंग प्राप्त करता रहा है, जिसे लेकर कुछ लोग इसे भारतीय समाज को बांटने की साजिश का हिस्सा मानते हैं।

सोशल मीडिया पर इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कुछ यूजर्स ने 2017 के उत्तर प्रदेश चुनाव में सीएसडीएस की गलत भविष्यवाणियों का जिक्र किया, जहां बीजेपी और एसपी-कांग्रेस गठबंधन को बराबर वोट मिलने की बात कही गई थी। महाराष्ट्र चुनाव से ठीक पहले सीएसडीएस की गलती का उजागर होना, उनके कांग्रेस से मिलीभगत के संदेह को और बढ़ाता है।
बीजेपी और अन्य विपक्षी दलों ने इसे कांग्रेस की साजिश करार दिया है, जिसमें सीएसडीएस को विदेशी फंडिंग के जरिए भारत के लोकतंत्र को कमजोर करने का माध्यम बताया जा रहा है। सीएसडीएस की नेशनल इलेक्शन स्टडीज और ग्लोबल बैरोमीटर सर्वे जैसे कार्यक्रम इस आशंका को और बल देते हैं। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह साजिश साबित होती है, तो चुनाव कानूनों के तहत कार्रवाई संभव है। फोर्ड फाउंडेशन जैसे विदेशी संगठनों द्वारा वित्तपोषित सीएसडीएस के जाति और धर्म आधारित सर्वेक्षणों पर पहले भी आरोप लगते रहे हैं कि वे भारतीय समाज को तोड़ने की साजिश का हिस्सा हो सकते हैं।
इस घटनाक्रम ने चुनाव आयोग को ऐसे सर्वेक्षणों पर नियंत्रण की मांग को तेज कर दिया है। जनता के मन में सवाल उठ रहा है कि क्या यह कांग्रेस और सीएसडीएस की सुनियोजित रणनीति थी, या केवल एक तकनीकी चूक? सच्चाई सामने आने तक यह विवाद भारतीय राजनीति में चर्चा का विषय बना रहेगा।
















