भारतीय स्वाधीनता समर में सिनेमा का योगदान
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Liveblog - भारतीय स्वाधीनता समर में सिनेमा का योगदान

भारत में कला, संस्कृति और धर्म एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं। नाट्यशास्त्र की रचना ने यह स्पष्ट कर दिया था कि भारतीय जीवन में धर्म और कला एक ही स्रोत से प्रवाहित होते हैं। यदि किसी युग या समाज को समझना हो, तो उस समय में बनी फ़िल्में, कला और संस्कृति को देखना पर्याप्त है

Written byमाही दुबेमाही दुबे
Aug 18, 2025, 02:30 pm IST
inभारत, विश्लेषण, धर्म-संस्कृति

भारत में कला, संस्कृति और धर्म एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं। नाट्यशास्त्र की रचना ने यह स्पष्ट कर दिया था कि भारतीय जीवन में धर्म और कला एक ही स्रोत से प्रवाहित होते हैं। यदि किसी युग या समाज को समझना हो, तो उस समय में बनी फ़िल्में, कला और संस्कृति को देखना पर्याप्त है। इसी दृष्टि से देखें, तो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में कला— विशेषकर सिनेमा ने अमूल्य भूमिका निभाई। ब्रिटिश राज में जब प्रेस और फ़िल्म पर सख़्त सेंसरशिप थी, तब फ़िल्मकारों ने पौराणिक और प्रतीकात्मक कथाओं के माध्यम से स्वराज्य का संदेश पहुँचाया। प्रत्यक्ष राजनीतिक विरोध दिखाना जोखिम भरा था, लेकिन कला की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि वह संकेतों, रूपकों, प्रतीकों और मेटाफर्स से भी जनमानस को प्रेरित कर सकती है।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के समय, सिनेमा एक मूक सेनानी की तरह था—जो पर्दे पर कहानियों के माध्यम से अंग्रेजी शासन के विरुद्ध जनमत तैयार कर रहा था और स्वतंत्रता के संदेश को घर-घर पहुँचा रहा था। भारत में सिनेमा और स्वतंत्रता संग्राम दोनों सहयात्री रहे। देश में ‘महात्मा गांधी’ और सिनेमा में ‘दादा साहब फाल्के’ लगभग एक ही समय सक्रिय होते हैं। 1914 में महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से स्वदेश लौटे हैं वहीँ इसके आस पास ‘घुंडीराज गोविंद दादा साहेब फाल्के’ भी इंग्लैंड से फिल्म निर्माण की तकनीक लेकर लौटते हैं। यह केवल संयोग नहीं है कि महात्मा गांधी को ‘राष्ट्रपिता’ और दादा साहेब फाल्के को ‘भारतीय सिनेमा का पिता’ कहा जाता है।

महात्मा गांधी और दादा साहेब फाल्के की सक्रियता से स्वतंत्रता संग्राम और सिनेमा एक-दूसरे से प्रभावित होते हुए अपनी गति से आगे बढ़ता है। दादा साहेब का इंग्लैंड जाकर फिल्म अध्ययन करना भी मात्र संयोग नहीं था कारण जिस तरह अंग्रेज अपने विचार की फिल्मों को दिखाकर यहां की युवाओं का ब्रेनवाश कर रहे थे, दादा साहेब ने कठिन परिश्रम कर ’21 अप्रैल 1913′ को मुम्बई के ओलंपिया सिनेमा हॉल में पहली भारतीय फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ का प्रदर्शन किया। उनके प्रयासों से सिनेमा शीघ्र ही भारतीय समाज, स्वबोध, संस्कृति, धर्म और इतिहास को अभिव्यक्त करने लगा। उन्होंने 10 वर्षों में 100 से अधिक फिल्में बनाई और यह अप्रत्यक्ष रूप से स्वतंत्रता संग्राम में योगदान ही था।

वहीँ अंग्रेज सरकार ने प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान हुए अपने अनुभवों से सिनेमा की शक्ति और समाज पर पड़ने वाले उसके प्रभाव को पहचान लिया था। उन्होंने स्वयं भी प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान सिनेमा का अपने पक्ष में प्रोपेगैंडा के रूप में खूब उपयोग किया। 1917 में रूसी क्रांति के बाद लेनिन ने भी सिनेमा को विचारधारा प्रसार के हथियार के रूप में अपनाया और बोल्शेविज़्म के विरोध और काम्युनिसम के प्रचार के लिए उपयोग किया।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सिनेमा की किसी भी तरह की भूमिका को रोकने के “5 मार्च 1918” को अंग्रेजों ने ‘इंडियन सिनेमेटोग्राफी एक्ट’ लागू किया। इसके अंतर्गत सार्वजनिक प्रदर्शन से पहले किसी भी फिल्म को सेन्सर बोर्ड से प्रमाण पत्र लेना आवश्यक था। सेन्सर बोर्ड को जब लगता कि अमुक फिल्म से स्वतंत्रता का संदेश फैलने की संभावना है, वह फिल्म सेंसर की कैंची का शिकार हो जाती थी। उसे समय का सेंसर बोर्ड पूरी तरह सरकार के नीचे कार्य करता था तो प्रमाण पत्र लेना किसी युद्ध से काम नहीं होता था।

1918 से पहले बिना किसी रोक-टोक के फ़िल्में रिलीज़ हो सकती थीं, लेकिन जब स्वतंत्रता संग्राम जन आंदोलन का रूप ले रहा था और दर्शक ‘स्व’ केंद्रित फ़िल्में देखने के आदी हो गए थे, तभी सेंसरबोर्ड ने सिनेमा पर कड़ी पाबंदियाँ लगा दीं। चूंकि सिनेमा एक खर्चीला माध्यम था, इसलिए फ़िल्म निर्माताओं के लिए सरकार से शत्रुता मोल लेना महंगा सौदा बन गया। इसके कारण स्वतंत्रता संग्राम से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी फ़िल्में कम बनीं, लेकिन फिर भी कई राष्ट्रभक्त फ़िल्मकारों ने व्यावसायिक हितों से ऊपर राष्ट्रीय हित को रखा।

1918 से 1930 के बीच बनी अधिकांश फ़िल्में पौराणिक और ऐतिहासिक पात्रों पर आधारित थीं— लंका दहन (1917), कालिया मर्दन (1919), सावित्री (1923) जैसी फ़िल्में दर्शकों को अन्याय के विरुद्ध लड़ने की प्रेरणा देती थीं। सेंसर से बचने के लिए इन फ़िल्मों को मिथक के रूप में पेश किया जाता, यदि सेंसर बोर्ड को किसी फिल्मों पर शक होता था तो वह उन्हें सस्पीशीयस या आक्रामक घोषित कर बेन कर देता था। कई फ़िल्मकारों ने व्यावसायिक हितों से ऊपर राष्ट्रीय हित को रखा, औपनिवेशिक यातनाएं सही और जेल गए— जैसे वी. शांताराम की स्वराज्य तोरण (1929) और धरती माता (1938) सेंसर द्वारा बैन हुईं और वे गिरफ्तार हुए। बाबूराव पेंटर की महारथी कर्ण (1928), दोराबजी नौरोजी संपत की भक्त विदुर (1921) और 1935 की तुमचा आमचा संघर्ष को ब्रिटिश सरकार ने खतरनाक प्रसार सामग्री घोषित किया। ‘हरी लाल सेन’ जैसे अग्रणी फ़िल्मकारों के स्टूडियो तक जला दिए गए।

इन त्यागों और संघर्षों का असर हुआ ओर राष्ट्रभावना भारतीय समाज के अवचेतन का हिस्सा बन गई। यही कारण है कि आज स्वतंत्रता के बाद भी, जब बॉर्डर, गदर, LOC कारगिल, केसरी, छावा, उरी या लगान जैसी फ़िल्में बनती हैं, तो भारतीय समाज उसे किसी हीरो, जाति, और भाषा से ऊपर उठकर प्यार देता है। खेर सिनेमा ने स्वतंत्रता संग्राम में एक मूक योद्धा की तरह योगदान तो दिया ही है वह आज भी राष्ट्रीय चेतना को जगाने का कार्य कर रहा है। उस समय में जब “कई गुलाम मानसिकता वाले फिल्मकार” विश्व में पुरस्कृत और प्रख्यात हो रहे थे, कई राष्ट्रभक्ति फिल्मकारों ने स्वतंत्रता समर में अमूल्य योगदान दिया, अंग्रेजी यातनाएं सही, आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर स्वतंत्रता के संघर्ष को आगे बढ़ाया। जब हम स्वतंत्रता सेनानियों को याद करते हैं, तो हमें ऐसे फ़िल्मकारों को भी विस्मृत नही करना चाहिए।

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    माही दुबे
    माही दुबे
    फ़िल्म निर्देशक एवं फ़िल्म एडिटर, फीचर फिल्म 'टिकिट एक संघर्ष' का निर्देशन एवं 8 राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय फिल्मों में संपादन का कार्य। पञ्चजन्य, ऑर्गनाइजर एवं विभिन्न राष्ट्रीय पत्र, पत्रिकाओं में फ़िल्म एवं संस्कृति पर लेखन। चित्र भारती नेशनल फ़िल्म फेस्टिवल सहित 20 से अधिक फ़िल्म पुरस्कार प्राप्त किये। [Read more]
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