कांग्रेस और विपक्ष के द्वारा बार-बार फैलाए जा रहे झूठ और एसआईआर को लेकर विवाद खड़ा करने पर अब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जबाव दिया है। उन्होंने एक लेख लिखते हुए कहा कि लगभग सात दशकों तक कांग्रेस सरकारों ने मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति पर कार्यकारी नियंत्रण रखा। आजकल राजनीतिक मुकाबले में भी सच सबसे पहले प्रभावित होता है। पोस्ट-ट्रूथ राजनीति में झूठा प्रचार, बिगड़ी कहानियां और भावनाओं से भरे आरोप तथ्यों और सबूतों से ऊपर हो जाते हैं।
तार्किक बहस की जगह केवल भावनात्मक भाषण आ जाते हैं। गलत जानकारी फैलाने वाले अभियान अब आम हो गए हैं। इनसे न सिर्फ जनता की राय बदली जाती है बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं को भी बदनाम किया जाता है। आरोप बार-बार दोहराए जाते हैं भले ही उनके पीछे कोई ठोस सबूत न हो।
भारत की राजनीति भी इससे अछूती नहीं है। विपक्ष के कुछ हिस्से गुस्सा पैदा करने वाले प्रचार और गलत जानकारी का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे अराजकता फैलाने की कोशिश हो रही है और राजनीतिक फायदे को देश के हित से ऊपर रखा जा रहा है।
यह लेख विपक्ष के खिलाफ शिकायत नहीं है। लोकतंत्र में असहमति जरूरी है। लेकिन झूठ फैलाने की छूट नहीं होनी चाहिए। असहमति नीति बनाने में मदद करती है, लेकिन झूठे आरोपों से जनता का भरोसा तोड़ना सही नहीं है। मकसद इन झूठों को चुनौती देना और संवैधानिक संस्थाओं में जनता का भरोसा वापस लाना है। खासकर जब चुनावी प्रक्रिया पर हमले किए जा रहे हैं ताकि इस सच्चाई को छिपाया जा सके कि जनता बार-बार उन्हें नकार रही है।
ईवीएम पर बार-बार आरोप
विपक्ष बार-बार इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों में हेराफेरी के आरोप लगाता रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार इन चुनौतियों की जांच की। 2024 में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम चुनाव आयोग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कह दिया कि कागजी मतदान पर वापस जाने की मांग सही नहीं है। कोर्ट ने कहा कि बिना ठोस सबूत के सिर्फ शक के आधार पर बार-बार चुनौती देना गलत और अनावश्यक है। फिर भी विपक्ष वही बातें दोहराता रहा।
SIR पर विवाद क्यों
मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण एक कानूनी और प्रशासनिक रूप से सही कदम है। लेकिन कुछ लोग इसे राजनीतिक फायदे के लिए बदनाम कर रहे हैं। 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम चुनाव आयोग फैसले में कहा कि मतदाता सूची की शुद्धता, पूर्णता और ईमानदारी स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए जरूरी है। कोर्ट ने इसे चुनाव आयोग के संवैधानिक काम का हिस्सा बताया।
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चुनाव आयोग को बदनाम करने की कोशिश
मुख्य चुनाव आयुक्त के पद और चुनाव आयोग को बदनाम करने का अभियान चल रहा है। लगभग सात दशक तक कांग्रेस सरकारों ने मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति पर अपना नियंत्रण रखा। मौजूदा सरकार ने इसे बदला। अब बहु-सदस्यीय चयन समिति बनाई गई है जिसमें विपक्ष के नेता भी शामिल हैं।
कांग्रेस का संस्थाओं का सम्मान करने का रिकॉर्ड अच्छा नहीं रहा। 1951 में पहली संवैधानिक संशोधन से सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटकर बोलने की आजादी सीमित की गई। इमरजेंसी के दौरान संवैधानिक संशोधनों का इस्तेमाल सरकार के हित में किया गया। इमरजेंसी की घोषणा को अदालत के दायरे से बाहर रखा गया, प्रधानमंत्री के चुनाव को जांच से बचाया गया और न्यायिक समीक्षा सीमित की गई।
इसके उलट पिछले 12 साल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में संविधान का सम्मान दिखा। 99वें संवैधानिक संशोधन को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया। सरकार ने फैसले का सम्मान किया और उसे पलटने की कोशिश नहीं की। राम मंदिर का निर्माण सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ही शुरू हुआ। अनुच्छेद 370 हटाने के फैसले को भी कोर्ट ने सही ठहराया।
राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में भी झूठे दावे हुए। 2019 में एक कांग्रेस नेता ने राफेल फैसले को गलत तरीके से पेश किया और बाद में माफी मांगी। अगस्त 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी के भारतीय क्षेत्र पर कब्जे संबंधी दावों पर सबूत मांगे।तीन कृषि कानूनों पर जब लोगों ने चिंता जताई तो सरकार ने उन्हें वापस ले लिया।
















