भारत गांवों में बसने वाला देश है और गांव को संपूर्ण आत्मनिर्भर बनाए बिना आत्मनिर्भर भारत की कल्पना नहीं की जा सकती है। इसलिए सरकार को आत्मनिर्भर गांव से आत्मनिर्भर भारत बनाने की ओर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। कोविड-19 महामारी के दौरान देश के समक्ष जो परिस्थितियां बनीं, उन्हें ध्यान में रखते हुए कृषि व्यवस्था में कुछ सुधार अपेक्षित हैं। गांव को आत्मनिर्भर बनाना है, तो सर्वप्रथम गांवों की बाजारों पर निर्भरता कम करने के लिए रोडमैप बनाना होगा।

गांव की खाद्य सुरक्षा को सुरक्षित रखने के लिए ‘समन्वित कृषि प्रणाली’ के अनुसार कृषि व्यवस्था को दुरुस्त करना पड़ेगा। इस प्रणाली के तहत ग्रामीण आबादी के लिए अनाज, दलहन, तिलहन, फल-सब्जी आदि के साथ कपास, सन (जूट), गुड़, शक्कर, खांड, राब, सिरका आदि खांडसारी के लिए गन्ने की पैदावार करनी पड़ेगी। चूंकि पशुपालन भी किसानों व भूमिहीन आबादी की आय का स्रोत है। इसलिए फसल चक्र में पशुओं के चारे के लिए भी पर्याप्त व्यवस्था बनानी पड़ेगी। इससे खाद्य पदार्थों के लिए लोगों की बाजारों पर निर्भरता घटेगी और गांव आत्मनिर्भर व स्वावलंबी बन सकेंगे। साथ ही, गांव में होने वाले अतिरिक्त उत्पादन को बाजार तक पहुंचाना होगा। इसके लिए पंचायत स्तर पर गांव बाजार हाट विकसित करने की आवश्यकता है।
गांव की लगभग 60 प्रतिशत आबादी खेतों पर निर्भर है, शेष लगभग 40 प्रतिशत आबादी भूमिहीन है और अपनी आजीविका के लिए लघु उद्योगों पर आश्रित है। यह वैकल्पिक रूप में कृषि में भी सहयोग करती है। भारत विभिन्न कृषि जलवायु वाला क्षेत्र है। इसलिए पूरे देश की 127 कृषि जलवायु क्षेत्रों के अनुसार समन्वित कृषि प्रणाली के अलग-अलग प्रारूप हो सकते हैं।
बेहतर जीवन जीने की चाहत में शहर आने वाले लोगों की गांव वापसी पर उनके लिए रोजगार की अतिरिक्त व्यवस्था बनानी पड़ेगी। प्रत्येक ग्रामीण को काम मिले, इसकी व्यवस्था करनी होगी। इसके लिए कृषि के साथ खाद्य प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन एवं अपने उत्पादों को सीधे ग्राहकों तक पहुंचाने के लिए सुव्यवस्थित मार्केटिंग नेटवर्क तैयार करना पड़ेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी ‘फार्म टू फोर्क’ की चर्चा कर चुके हैं। इस व्यवस्था निर्माण से किसानों को फसल का लाभकारी मूल्य मिलेगा तथा मूल्य संवर्धन के लिए लगी छोटी-छोटी इकाइयों एवं मार्केटिंग द्वारा गांव में रहने वाली अतिरिक्त आबादी को भी सम्मानजनक रोजगार मिल सकेगा।
पशु आधारित कृषि की आवश्यकता
गांव तभी आत्मनिर्भर बन सकते हैं, जब ‘गो, कृषि और वाणिज्य’ के आधार पर खेती को बढ़ावा मिलेगा। इसका अर्थ है कि खेती में पशु का प्रयोग हो। फिर जो फसल पैदा हो, उसका प्रसंस्करण और फिर व्यापार हो। कृषि और पशु का चोली-दामन का संबंध है। खेती में पशु के उपयोग से लोग पशुपालन करेंगे। इससे पशुओं का संवर्धन होगा। पशु हमारे लिए हर तरह से लाभदायक हैं,बशर्ते उनके उत्पाद का सही तरीके से पशुपालकों को लाभ दिलाया जाए। इसके साथ ही खेती को व्यावसायिक रूप देने की जरूरत है। दुर्भाग्य से आज लोग पशु आधारित खेती से दूर जा रहे हैं, यह न तो मनुष्य के लिए ठीक है और न ही पशु के लिए। -दिनेश कुलकर्णी, राष्ट्रीय संगठन मंत्री, भारतीय किसान संघ
बदली हुई परिस्थितियों से सबक लेते हुए, जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में भी कहा है कि हमें गांव, जिला, राज्य और देश को आत्मनिर्भर बनाने की ओर बढ़ना है। इसलिए आत्मनिर्भरता की योजना बनाते समय तीन बातों का ध्यान रखना आवश्यक है-पहला, उस क्षेत्र में रहने वाली आबादी का घनत्व, दूसरा उस क्षेत्र में होने वाला कृषि उत्पादन और तीसरा, जल संरक्षण की संरचना।
व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकता भोजन और पानी है। इसलिए खाद्य सुरक्षा को सुदृढ़ करते हुए कम से कम एक वर्ष की अवधि के लिए पर्याप्त मात्रा में खाद्य सामग्री का संग्रह रहना चाहिए। साथ ही, वर्षा के समय जल संरक्षण यानी जितना जल धरती के पेट से निकाल कर उपयोग करें, उतना वर्षा के समय उसमें डालें। गांव का भोजन-पानी गांव में, प्रखंड का भोजन-पानी प्रखंड में तथा जिले का भोजन-पानी जिले में सुलभ रहना चाहिए।
आज महामारी के बावजूद देश खाद्य संपन्न है तो सिर्फ किसानों के कारण। अपनी खाद्य सुरक्षा व्यवस्था का विश्लेषण कर, उसके अंदर उजागर हुई खामियों को दूर करने का यही सही समय है। सरकार और प्रशासन द्वारा जिलेवार खाद्य सुरक्षा और सुदृढ़ करने के लिए किसानों के खेतों से ही खरीदारी की व्यवस्था और पर्याप्त संख्या में ‘वेयर हाउस’ एवं ‘कोल्ड स्टोर’ तथा जिले में कृषि उत्पादन की दृष्टि के अनुसार खाद्य प्रसंस्करण और पैकेजिंग की इकाइयां स्थापित की जाएं। इससे किसानों को उनके उत्पादों के सही दाम मिल सकेंगे एवं रोजगार के अतिरिक्त अवसर पैदा होंगे और प्रत्येक वर्ष हजारों टन अनाज की इधर से उधर अनावश्यक ढुलाई एवं बर्बादी पर रोक लग सकेगी। इस संकट के समय हमारी आपूर्ति शृंखला में बहुत सी खामियां उजागर हुई हैं, जिनसे सबक लेने की आवश्यकता है। हमें जनपद के अंदर और बाहर बड़े-बड़े महानगरों तक आपूर्ति शृंखला की खामियों को दूर कर, उन्हें दुरुस्त करने की आवश्यकता है।

अनुमान है कि भारत 2050 तक लगभग 170 करोड़ आबादी के साथ विश्व में सबसे अधिक आबादी वाला देश बन जाएगा। तब हमें 457 मिलियन टन खाद्यान्नों (दलहन 50 मिलियन टन सहित) का उत्पादन करना होगा। इसी प्रकार अन्य खाद्य सामग्रियों जैसे खाद्य तेल 45.2 मिलियन टन, सब्जियां 438.6 मिलियन टन, फल 183.4 मिलियन टन, दूध 483 मिलियन टन, चीनी 58.2 मिलियन टन, मांस 18.1 मिलियन टन, अंडे 202.5 बिलियन और मछली 27.2 मिलियन टन के मौजूदा स्तर में वृद्धि करनी होगी। इसके लिए भूमि की उत्पादकता 4 गुना, जल की आवश्यकता 3 गुना बढ़ाने के साथ ऊर्जा उपयोग दक्षता दोगुना और श्रम उत्पादकता में 6 गुना वृद्धि करनी होगी। बढ़ती आबादी के लिए खाद्यान्न की आपूर्ति करने हेतु देश को उत्पादकता में चौतरफा विकास वाली टिकाऊ नीति अपनानी होगी, क्योंकि खेती योग्य क्षेत्रफल के विस्तार की संभावना लगभग नहीं के बराबर है।
खेती किसानी: खेती-किसानी अब बिना परेशानी
इसके अलावा, लगातार खेती से मिट्टी के अंदर पोषक तत्व भी कम होते जा रहे हैं। इसलिए मिट्टी के मूल प्रमुख एवं लघु पादप पोषक तत्वों की पुनः पूर्ति की करने की आवश्यकता है। देश अदृश्य भुखमरी और कुपोषण से निबटने के लिए जरूरी पोषक तत्व आपूर्ति के मामलों पर कोई समझौता नहीं कर सकता है। आज की स्थिति के अनुसार मृदा की स्वास्थ्य उत्पादकता या किसानों की आय को ध्यान में रखते हुए रासायनिक उर्वरकों के अलावा पर्याप्त जैविक खाद, हरित खाद के उपयोग की आवश्यकता है। हमें बड़े-बड़े खेतों के नहीं, अपितु छोटी जोत वाले किसानों को ध्यान में रखते हुए ऐसी कृषि प्रणाली और प्रौद्योगिकियां विकसित करने की जरूरत है, जिनसे किसानों की आय बढ़े और वे पर्यावरण के अनुकूल भी हों। (समाप्त)















