India Pakistan Partition : साल 1947 में जब बंटवारा हुआ तो डॉ. बाबूराम चार बरस के थे। उन्हें उस समय की बहुत सी बातें याद नहीं हैं, लेकिन वे अपने पिता प्यारा लाल से सुनी हुईं बातों के आधार पर बताते हैं कि वे अपने पिता प्यारा लाल, मां राम प्यारी के साथ पाकिस्तान के जरनवाला से किसी तरह बचकर भारत पहुंचे थे।
जरनवाला, जो कि ननकाना साहिब से कुछ ही किलोमीटर दूर था, एक शांत और खुशहाल कस्बा था। वहीं उनका घर, ज़मीन, पशु, सब कुछ था। उनके पिता बताते थे कि वहां जीवन बेहद सुंदर था, सुबह गुरबानी होती थी। खेतों में फसल लहलहाती थी, सबमें आपसी सद्भाव था, लेकिन जैसे ही मजहबी जुनून ने इंसानियत को रौंदना शुरू किया, वह धरती नरक में बदल गई।
हर रात डर का माहौल रहता था। लोग पूरी—पूरी रात पहरा देते थे। अनहोनी की आशंका से कोई सोता नहीं था। माहौल बिगड़ता जा रहा था लेकिन फिर भी लोगों को उम्मीद थी कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जब परिस्थितियां ऐसी हो गई कि अब जान बचाना मुश्किल था तो परिवार ने वहां से निकलने का सोचा। सबकुछ पीछे छोड़कर जान बचाने के लिए हमें वहां से निकलना पड़ा।
बाबू राम बताते हैं, ” रात के अंधेरे में मेरे पिताजी मुझे और मेरी मां को लेकर बिना किसी तैयारी के, सिर्फ कुछ कपड़े और एक-दो बर्तन बांधकर किसी तरह वहां से निकले। रास्ते में जगह—जगह घायल लोग, शव पड़े हुए थे। किसी तरह बचते—बचाते हुए कभी पैदल चलकर, कुछ रास्ता बैलगाड़ी से तय करके हमारा परिवार ट्रेन के माध्यम से अमृतसर पहुंचा। पीछे अपना कुछ नहीं बचा था। हवेली, पशु, खेत, दोस्त सब पीछे छूट गए थे। जो बचा, वह था परिवार, हमारे संस्कार और जिंदा रहने की जिद।
जब हम अमृतसर पहुंचे तो स्टेशन पर बेहद भीड़ थी। अमृतसर आकर उन्होंने कुछ दिन राहत कैंपों में बिताए। कुछ समय बाद सरकार की ओर से उन्हें जालंधर जिले के गढ़ा इलाके में जमीन दे दी गई। यहीं से उनके नए जीवन की शुरुआत हुई।” वे कहते हैं, “यहीं आकर मैंने पढ़ाई शुरू की और डॉक्टर बना। मेरी तीन बेटियां हैं।” सभी की शादी अच्छे परिवारों में हुई है। तीनों अपने घरों में सुखी जीवन व्यतीत कर रही हैं। विभाजन की उस त्रासदी को अब 78 साल बीत चुके हैं, लेकिन उनके पिता द्वारा बताई गई बातों की स्मृतियां आज तक उनके अंदर समाई हैं।
— डॉ. बाबूराम, मूल स्थान — जरनवाला, ननकाना साहिब


















