राजनीतिक अग्निपरीक्षा में और निखरा संघ
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  के 100  साल : प्रतिबंधों के दर्पण में संघ

राजनीतिक दुर्भावनावश प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू के समय 30 जनवरी, 1948 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर पहली बार प्रतिबंध लगा। इंदिरा गांधी ने आपातकाल के समय 4 जुलाई, 1975 को और नरसिंहराव ने बाबरी ढांचे के विध्वंस के बाद 10 दिसंबर, 1992 को संघ पर तीसरी बार प्रतिबंध लगाया

Written byविजय कुमारविजय कुमार
Aug 15, 2025, 08:18 pm IST
in विश्लेषण, संघ @100

कैसा आश्चर्य है कि हिंसक, अलोकतांत्रिक और देशबाह्य निष्ठा रखने वाली संस्थाओं पर भारत में रोक नहीं है; पर रा.स्व.संघ को स्वतंत्र भारत में तीन बार प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा! भारत में हजारों हिंदू संगठन हैं। इनमें से अधिकांश के मंचों पर सत्तासीन नेता आदर पाते रहे; पर संघ किसी राजनीतिक दल की जेब में नहीं बैठा। वह ‘सहस्रशीर्ष, सहस्राक्ष और सहस्रपाद’ की तरह अपने सैकड़ों समविचारी संगठनों, हजारों शाखाओं, लाखों कार्यकर्ताओं और करोड़ों शुभचिंतकों द्वारा देश में व्यापक बदलाव ला रहा है।

विजय कुमार
वरिष्ठ प्रचारक, रा.स्व.संघ

इसीलिए हमला उस पर ही होता है। पहले प्रतिबंध के समय संघ कांग्रेस के आंतरिक सत्ता संघर्ष का शिकार हुआ। कांग्रेस संगठन के विरोध, पर गांधी जी की इच्छा से नेहरू जी प्रथम प्रधानमंत्री बन तो गए, पर वे विभाजनजन्य समस्याएं हल नहीं कर सके। गृहमंत्री सरदार पटेल को संगठन और देश की जनता का विश्वास प्राप्त था। ऐसे में नेहरू जी को लगा कि कहीं संघ का सहयोग लेकर पटेल उन्हें सत्ता से हटा न दें।

30 जनवरी, 1948 को हुई गांधी जी की हत्या में नेहरू जी ने संघ को घसीटते हुए एक फरवरी को सरसंघचालक श्रीगुरुजी को गिरफ्तार कर चार फरवरी को संघ पर प्रतिबंध लगा दिया। संघ ने इसके विरोध में 9 दिसंबर, 1948 से 21 जनवरी, 1949 तक सत्याग्रह किया, जिसमें 65,000 स्वयंसेवकों ने जेल की यातनाएं सहीं। पुलिस जांच में साफ हो गया कि संघ निर्दोष है। अब नेहरू जी फंस गए। उन्होंने कहा कि संघ के पास कोई संविधान नहीं है। संघ ने कुछ समय में अपना लिखित संविधान उपलब्ध करा दिया। अतः 12 जुलाई, 1949 को प्रतिबंध हटा दिया गया। नेहरू जी तो नहीं, पर उनकी पुत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने 1975 में फिर यह दुःसाहस कर डाला।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 साल : संघ की उपलब्धि

1971 में बांग्लादेश विजय से उनका नाम सर्वत्र गूंजने लगा था। ऐसे में वे और उनके पुत्र संजय गांधी निरंकुश हो गए। उधर गुजरात के कांग्रेसी मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल के विरुद्ध छात्रों ने बड़ा आंदोलन किया। बिहार में अब्दुल गफूर के विरुद्ध भी यही माहौल था। इस आंदोलन में संघ भी सक्रिय था। यह देख लोकनायक जयप्रकाश नारायण भी सड़क पर उतर आए। उधर इंदिरा गांधी द्वारा लोकसभा चुनाव में रायबरेली सीट पर की गई धांधली के विरुद्ध एक याचिका समाजवादी नेता राजनारायण ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में डाली थी।

25 जून, 1975 को आए निर्णय ने चुनाव को अवैध ठहराकर उनके चुनाव लड़ने पर छह वर्ष का प्रतिबंध लगा दिया। इससे वे भड़क गईं। उन्होंने राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद को सोते से जगाया तथा बिना मंत्रिमंडल द्वारा पारित आपातकाल के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करा लिए। अगले दिन जब लोग उठे, तो देश तानाशाही के जाल में फंस चुका था।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 साल : संघ कार्य में प्रशिक्षण का महत्व

4 जुलाई, 1975 को संघ पर प्रतिबंध लगाकर संघ कार्यकर्ताओं के साथ ही विरोधी राजनेताओं को भी जेल में ठूंस दिया गया। संघ ने पहले तो शासन को समझाया; पर फिर सत्याग्रह का मार्ग अपनाया गया। सामाजिक और राजनीतिक संस्थाओं के साथ ‘लोक संघर्ष समिति’ बनाकर 14 नवंबर, 1975 से 26 जनवरी, 1976 तक पूरे देश में सत्याग्रह किया गया। लगभग एक लाख लोग गिरफ्तार हुए। इनमें 80 प्रतिशत संघ विचार वाले थे। संघ ने देश तथा विदेशों में भी इस तानाशाही के विरुद्ध जनजागरण किया। इससे इंदिरा गांधी पर वैश्विक दबाव पड़ने लगा।

खुफिया विभाग ने इंदिरा गांधी से कहा कि ‘देश में शांति है। ऐसे में चुनाव होने पर आपको पूर्ण बहुमत मिलेगा और विरोधियों के मुंह बंद हो जाएंगे।’ इंदिरा गांधी ने चुनाव घोषित कर दिए। कुछ बड़े नेता रिहा किए गए। संघ के प्रयास से ये सब जनता पार्टी के नाम से एक मंच पर आ गए। संघ ने चुनाव में अपनी पूरी ताकत लगा दी। इंदिरा गांधी की भारी हार हुई। उन्हें मजबूरी में त्यागपत्र देना पड़ा। त्यागपत्र से पूर्व 22 मार्च, 1977 को उन्होंने प्रतिबंध हटा लिया।

इन अग्नि परीक्षाओं में से निकल कर संघ कुंदन बन गया। उसका काम समाज के सभी क्षेत्रों में तेजी से बढ़ने लगा। विश्व हिंदू परिषद ने श्रीराम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए एक क्रमबद्ध आंदोलन चलाया। 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी ढांचा ढह गया। तब केंद्र में नरसिंहराव की कांग्रेसी सरकार थी। नरसिंहराव ने अपने साथियों के दबाव में 10 दिसंबर को संघ, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल आदि पर प्रतिबंध थोप दिया। इसके विरोध में संघ न्यायालय में गया। न्यायमूर्ति बाहरी न्यायाधिकरण ने प्रतिबंध को अवैध ठहराया।

फलस्वरूप 4 जून, 1993 को प्रतिबंध हट गया। यदि तुलना करें, तो ध्यान में आता है कि पहले प्रतिबंध के समय शासन के साथ जनता भी संघ के विरोध में थी। नेहरू जी ने ऐसा वातावरण बनाया मानो गांधी जी की हत्या संघ ने ही की है। अतः संघ स्वयंसेवकों के घरों और कार्यालयों पर हमले हुए। प्रतिबंध हटने पर भी यह आक्रोश समाप्त नहीं हुआ।

रा.स्व.संघ के 100 साल : गौरवशाली सफर का सम्मान और भविष्य की दिशा

इस प्रतिबंध से संघ को बहुत हानि हुई। दूसरे प्रतिबंध के समय शासन तो विरोध में था, पर पुलिस और प्रशासन संघ के प्रति उदार था। जनता संघ की समर्थक, पर आतंक के कारण चुप थी। उसने यह आक्रोश वोट के रूप में प्रकट किया। प्रतिबंध हटने पर संघ के काम में तेजी आई और पहले प्रतिबंध वाली हानि पूरी कर ली गई। तीसरा प्रतिबंध तो वास्तव में प्रतिबंध था ही नहीं। संघ कार्यालय खुले रहे। स्वयंसेवक प्रतिदिन खुले मैदानों में व्यायाम और चर्चा करते थे। व्यक्तित्व विकास शिविर के नाम पर प्रशिक्षण वर्ग भी लगे। सच तो यह है कि सत्ता पक्ष के अतिरिक्त शेष प्रशासक वर्ग तथा जनता संघ के साथ थी।

अतः जनभावना को देखकर न्यायालय ने ही प्रतिबंध हटा दिया। राम मंदिर आंदोलन में सक्रियता से भारतीय जनता पार्टी को कुछ वर्ष बाद केंद्र में सत्ता मिली। ऐसे में ‘बाबरी राग’ गाने वाले दल भी सत्ता के लालच में उसके गठबंधन में आ बैठे। ये प्रतिबंध साक्षी हैं कि हर बार हार सत्ता पक्ष की ही हुई, जबकि संघ का प्रभाव और स्वीकार्यता लगातार बढ़ी। शायद इसीलिए अब शासन संघ पर प्रतिबंध की बात सोचता भी नहीं है।

Topics: श्रीराम जन्मभूमिराजनीतिक षड्यंत्रRSSnehruगांधी जीShri Gurujiपाञ्चजन्य विशेषनेहरूHindu organization25 जून 1975CourtCongress organizationन्यायालयChimanbhai Patelइंदिरा गांधीनरसिंह रावसत्याग्रहआपातकाल-Emergency
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