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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 साल : समाज सुधार के कुछ आयामों से देश और समाज आगे बढ़ेगा 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने गठन के बाद 100 वर्ष के कालखंड में दो चरण पूरे करके तीसरे में प्रवेश कर चुका है। उसने अब समाज सुधार के कुछ आयाम हाथ में लिए हैं। नागिरक इनका सतत ध्यान रखेंगे तो देश और समाज आगे बढ़ेगा 

Written byRajpal Singh RawatRajpal Singh Rawat
Aug 12, 2025, 03:18 pm IST
in भारत, विश्लेषण, संघ @100, पर्यावरण, महाराष्ट्र
विश्व पर्यावरण दिवस पर हिण्डोन  (राजस्थान) में वृक्षारोपण करते हुए रा.स्व.संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत     (फाइल चित्र)

विश्व पर्यावरण दिवस पर हिण्डोन  (राजस्थान) में वृक्षारोपण करते हुए रा.स्व.संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत     (फाइल चित्र)

एक व्यक्ति की तरह हर संस्था की भी एक जीवन यात्रा होती है। व्यक्ति के चिंतन में उसकी अवस्था के अनुसार कई पड़ाव आते हैं। संघ भी गत सौ वर्ष में दो मुख्य पड़ाव-जमीनी विस्तार और बढ़ते व्याप-के बाद तीसरे पड़ाव यानी समाज सुधार की ओर बढ़ रहा है।

जमीनी विस्तार

डाॅ. केशव बलिराम हेडगेवार ने 27 सितम्बर, 1925 (विजयादशमी) काे नागपुर में अपने घर पर आयोजित एक बैठक में संघ की स्थापना की थी। तब उनके साथ नागपुर के 15-20 लोग थे। कुछ दिन बाद पहली शाखा शुरू हुई और इस तरह काम बढ़ने लगा। डाॅ. हेडगेवार पहले कांग्रेस में थे। देश के कई लोगों से उनका संपर्क था। उन्होंने कोलकाता से चिकित्सा की पढ़ाई की थी। अपने सहपाठियों से भी उन्होंने संपर्क बनाये रखा था।

विजय कुमार
वरिष्ठ प्रचारक, रा.स्व.संघ

नागपुर की शाखा के मजबूत होने पर वे पुराने मित्रों से मिले और उन्हें संघ के बारे में बताया। फिर उन्होंने एक बुजुर्ग कार्यकर्ता बाबासाहेब आप्टे को कई जगह भेजा। इससे कुछ शाखाएं खड़ी हुईं, पर उनके ध्यान में आया कि जब तक युवा नहीं जुड़ेंगे, तब तक काम नहीं बढ़ेगा। इसके लिए उन्होंने उन छात्रों को चुना, जो अब डिग्री की पढ़ाई करना चाहते थे।

डाॅ. साहब ने उन्हें प्रेरित किया कि वे अन्य राज्यों में जाकर पढ़ें। उन छात्रों के बल पर संघ का काम फैला। डाॅक्टर जी ऐसी शाखाओं पर प्रवास भी करते थे। 1940 में उनके निधन के समय संघ सभी राज्यों में पहुंच चुका था। उनके बाद 34 वर्षीय श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर (श्री गुरुजी) सरसंघचालक बने। 1973 में उनके देहांत के समय अधिकांश जिलों में संघ पहुंच गया था। फिर श्री बालासाहब देवरस सरसंघचालक बने। 1975 के आपातकाल में संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। संघ ने इस चुनौती का सामना किया और 1977 में प्रतिबंध हट गया। इसके बाद संघ कार्य की वृद्धि का दूसरा दौर शुरू हुआ।

संघ का बढ़ता व्याप

अब संघ ने सभी दिशाओं में बढ़ने का निर्णय लिया। वस्तुतः शाखा की रचना कुछ ऐसी है कि उसमें सब लोग नहीं आ सकते। अतः किसान, मजदूर, वनवासी, वकील, डाॅक्टर, अध्यापक, छात्र, शिक्षा, सहकार, महिला, धर्म, साहित्य, कला, चिकित्सा, सेवा… आदि क्षेत्रों में स्वयंसेवकों ने संस्थाएं बनाई। कुछ पूर्णकालिक प्रचारक भी इनमें भेजे गये।

आज विश्व हिन्दू परिषद, विद्या भारती, भारतीय मजदूर संघ, भारतीय जनता पार्टी, वनवासी कल्याण आश्रम, सेवा भारती, भारतीय किसान संघ, राष्ट्र सेविका समिति.. आदि बाकी संस्थाओं से मीलों आगे हैं। उनकी आवाज हर जगह सुनी जाती है। आम संस्थाएं प्रायः किसी राजनीतिक दल या नेता की पिछलग्गू होती हैं। कुछ किसी राज्य या जिले तक सीमित हैं। संघ ने शुरू से ही ध्यान रखा कि उसके संस्कारित स्वयंसेवकों द्वारा खड़ी की गईं संस्थाएं स्वतंत्र, स्वावलम्बी तथा देशव्यापी हों। जैसे परिवार में चार भाइयों के अलग काम, नौकरी, खेती आदि होने पर भी सुख-दुख में सब एक रहते हैं। वैसे ही इनके मूल में संघ विचार होने से ये एक परिवार की तरह काम करते हैं।

इन खबरों को भी पढ़े-

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समाज सुधार 

  • संघ ने तीसरे चरण में प्रवेश किया है। आज समाज में सुधार और परिवर्तन की बात तो होती है, पर केवल बातों से कुछ नहीं होता, जब तक कि कुछ कार्यक्रम न हों। इसके लिए 5 विषयों पर काम हो रहा है। 

  1. परिवार प्रबोधन: आजकल परिवार का बिखराव एक बड़ी चिंता का विषय है। टी.वी. और मोबाइल ने एक छत के बावजूद सबको अकेला कर दिया है। इसलिए भाषा, भूषा, भोजन, भजन, भवन और भ्रमण जैसे छह सूत्र दिये गये हैं। भाषा का अर्थ है, घर में अपनी भाषा और बोली का प्रयोग करें। कामकाजी दुनिया के बाद घर, उत्सव या पर्व आदि में अपनी परम्परागत वेशभूषा पहनें। रात का भोजन सब साथ करें। सप्ताह में एक बार मिलकर पूजा आदि करें। घर का परिवेश भारतीयता से ओतप्रोत हो तथा साल में एक बार पूरा परिवार एक साथ घूमने जाए। इन छह बिन्दुओं से हजारों परिवार टूटने से बचे हैं।

  2. पर्यावरण संरक्षण: इसके लिए पेड़, पानी और प्लास्टिक की बात की जा रही है। पौधे लगाकर पेड़ बनने तक उनका संरक्षण करें। पानी का सीमित और बार-बार प्रयोग करें तथा ‘सिंगल यूज’ प्लास्टिक को हटाएं। इसके लिए प्रयागराज महाकुंभ में ‘एक थाली एक थैला’ अभियान लिया गया था। श्रद्धालुओं से आग्रह किया गया था कि वे थैला-थाली साथ रखें, सामान थैले में लें, अपनी थाली में ही खाएं।

  3.  सामाजिक समरसता: समाज व्यवहार में आज भी जातिगत भेदभाव दिखता है। संघ का मानना है कि जैसे हर अंग का आकार और काम अलग होने पर भी वे एक ही शरीर के अंग होते हैं वैसे ही अनेक भिन्नताओं के बावजूद पूरा हिन्दू समाज एक है। इसकी मजबूती के लिए अनेक कार्यक्रम किये जाते हैं।

  4.  स्वदेशी: जिस वस्तु का निर्माण भारतीयों द्वारा हो तथा जिसका लाभ भारत में ही रहे, मोटे रूप से उसे स्वदेशी कहते हैं। किसी समय इंग्लैंड या अमेरिका से अरबों-खरबों रु. का सामान आता था। अब चीन निर्मित माल की भरमार है। इससे देश का धन बाहर जाता है और उसका दुरुपयोग हमारे ही विरुद्ध होता है। अतः हम अधिकतम सामान स्वदेशी कंपनियों का लें, इसके लिए लोगों का मन बनाने का प्रयास होता है।

  5. नागरिक कर्तव्य: संविधान ने हमें कई अधिकार दिये हैं, उसके साथ कुछ कर्तव्य भी हैं; पर प्रायः हम कर्तव्य की ओर से उदासीन रहते हैं। सफाई, सड़क के नियम, समयपालन, लाइन न तोड़ना…आदि ऐसे ही विषय हैं। इनसे हमारा और दूसरों का जीवन सुखद बन सकता है। इस बारे में संघ गरूकता का प्रयास कर रहा है।

    यद्यपि समाज में सुधार आसान नहीं है। किसी व्यवस्था को बिगड़ने में यदि 50 साल लगते हैं, तो उसे सुधारने में 100 साल लगेंगे; पर कहीं से तो शुरू करना ही होगा। इसलिए संघ ने यह काम हाथ में लिया है। संघ को इसमें भी सफलता मिलेगी, यह निश्चित है। 

     

Topics: विश्व हिन्दू परिषदMadhavrao Sadashivrao Golwalkarविश्व पर्यावरण दिवसVijayadashmiRSSविद्या भारतीIndian farmersपर्यावरण संरक्षणपरिवार प्रबोधनभारतीय मजदूर संघFirst branch of RSSवनवासी कल्याण आश्रमMohanrao Bhagwatस्वदेशीभारतीय जनता पार्टीShri Gurujiसामाजिक समरसतापाञ्चजन्य विशेष
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