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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ @100 : सांस्कृतिक पुनर्जागरण का नूतन पर्व

रा.स्व.संघ ने आरम्भ से ही समष्टि को ध्यान में रखते हुए काम किया है। हिन्दू संगठन करते हुए संघ आज देश और दुनिया में अपने कार्य से न सिर्फ पहुंचा है, बल्कि सम्मानित स्थान भी प्राप्त किया है

Written byविजय कुमारविजय कुमार
Jul 4, 2025, 06:32 am IST
in भारत, विश्लेषण, संघ @100

इस साल विजयादशमी पर रा.स्व.संघ 100वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। ऐसे में इस यात्रा के कुछ पड़ावों पर नजर डालना उचित होगा। डाॅ. केशव बलिराम हेडगेवार ने संघ को देश की राष्ट्रीय आवश्यकता कहा था। उन्होंने कोलकाता में क्रांतिकारियों और नागपुर में कांग्रेस के साथ काम किया; पर संघ स्थापना के बाद पूरी शक्ति यहीं लगा दी। इसलिए पहले 50 साल संघ ने केवल संगठन किया। सुप्रसिद्ध विचारक एवं वरिष्ठ संघ प्रचारक दत्तोपंत ठेंगड़ी इसे ‘प्रोग्रेसिव अनफोल्डमेंट’ कहते थे। इसके बल पर ही संघ ने हर संकट को झेला। इस पहले दौर में स्वयंसेवकों ने कई संस्थाएं बनायीं। इनमें राष्ट्र सेविका समिति (1936), अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (1949), वनवासी कल्याण आश्रम (1952), भारतीय मजदूर संघ (1955), विश्व हिन्दू परिषद (1964), भारतीय जनसंघ/भारतीय जनता पार्टी (1951), सरस्वती शिशु मंदिर/विद्या भारती (1952) आदि प्रमुख हैं।

संघ पर प्रतिबंध

विजय कुमार
वरिष्ठ प्रचारक, रा.स्व.संघ, बाबरी विध्वंस,

संघ पर 1932 और 1940 में शासन ने आंशिक प्रतिबंध लगाये; पर वे ज्यादा नहीं चले। 1948 में गांधी जी की हत्या के बाद संघ पर फिर प्रतिबंध लगा। तब शासन, प्रशासन और जनता संघ के विरोध में थी। प्रचार माध्यम सरकार के पास थे। संघ के पास अपनी बात कहने का कोई साधन नहीं था। फिर भी संघ ने सत्याग्रह से सरकार को झुका दिया। पर फिर शाखा के साथ ही समविचारी संगठनों का विस्तार और प्रभाव बढ़ने लगा। इसीलिए जब 1975 में इंदिरा गांधी ने आपातकाल घोषित करके संघ पर प्रतिबंध लगाया, तो जनता संघ के साथ रही। संघ ने फिर सत्याग्रह किया। चुनाव में जनता का आक्रोश फूट पड़ा और इंदिरा चुनाव हार गईं। समाज में बढ़ती स्वीकार्यता का संबल लेकर संघ ने संगठन को फैलाया तथा स्वयंसेवकों ने अनेक नयी संस्थाएं बनायीं।

1992 में बाबरी विध्वंस के बाद सरकार ने फिर संघ पर प्रतिबंध लगाया, जिसे न्यायालय ने ही खारिज कर दिया। 1975 और 1992 के प्रतिबंधों से संघ के संगठन और प्रभाव में वृद्धि ही हुई। उसका नाम दुनिया भर में फैल गया।

सेवा क्षेत्र में प्रवेश

साल 1977 के बाद के कालखंड को हम संघ का दूसरा 50 वर्षीय कालखंड कह सकते हैं। संघ ने अनुभव किया कि हमारा काम समाज के निर्धन वर्ग में नहीं है। इनकी पहली जरूरत रोटी, कपड़ा और मकान है। इस कारण लोग लालच में आकर कन्वर्जन तक करा लेते हैं। मीनाक्षीपुरम् कांड इसका उदाहरण था। अतः सेवा के क्षेत्र में प्रवेश किया गया। 1989 में डा. हेडगेवार की जन्मशती पर ‘सेवा निधि’ एकत्र कर हजारों पूर्णकालिक कार्यकर्ता बनाये गये। निर्धन बस्तियों को ‘सेवा बस्ती’ नाम देकर शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के हजारों छोटे प्रकल्प शुरू किये। आज इनकी संख्या डेढ़ लाख से भी अधिक है। अब सैकड़ों बड़े प्रकल्प भी हैं; पर मुख्य ध्यान छोटी इकाइयों पर है। केवल संघ ही नहीं, आज सभी समविचारी संस्थाएं सेवा कार्य कर रही हैं। इनमें से पुरुष और महिला कार्यकर्ता भी आगे आ रहे हैं।

चुनौतियों के दौर

साल 1947 में देश विभाजन एक बड़ी चुनौती थी। इस दौरान पंजाब और सिंध में संघ ने सीमित शक्ति के बावजूद लाखों हिन्दुओं की रक्षा की, महिलाओं की लाज बचाई और उनका पुनस्र्थापन किया। बंगाल में शक्ति कम होने से यह कार्य प्रभावी ढंग से नहीं हो सका। 1950 में संघ से प्रतिबंध हटने पर कुछ लोगों का विचार था कि निर्दोष होते हुए भी संसद या किसी विधानसभा में कोई हमारे पक्ष में नहीं बोला। अतः हमें शाखा छोड़कर केवल राजनीति करनी चाहिए; पर तत्कालीन सरसंघचालक पूज्य श्री गुरुजी नहीं माने। उन्होंने कहा कि राजनीति जरूरी होते हुए भी सब कुछ नहीं है। यद्यपि आगे संघ ने राजनीति में भी कई कार्यकर्ताओं को भेजा, हिन्दुत्व के मूल्यों पर बनी पार्टी में उन कार्यकर्ताओं ने खूब सहयोग किया और अब भी कर रहे हैं।

संगठन होने के कारण संघ तथा संघप्रेरित संस्थाएं नई टीम में अनुभवी कार्यकर्ताओं के संरक्षण में उन्हें लगातार पदस्थापित करते रहते हैं; पर 1968 में भारतीय जनसंघ को एक झटका लगा। पं. दीनदयाल उपाध्याय जी का निधन हो चुका था। भारतीय जनसंघ के कार्यकर्ता अटल बिहारी वाजपेयी को नेतृत्व में लाना चाहते थे। इससे रुष्ट होकर श्री बलराज मधोक ने पार्टी छोड़ दी; पर वे जल्दी ही समझ गये कि कुछ लोग कुछ समय के लिए कोई संस्था तो चला सकते हैं, पर संगठन नहीं। अतः वे क्रोध को भुलाकर, फिर संघ के कार्यक्रमों में आने लगे। यद्यपि उनके अलगाव से श्री गुरुजी सहित सभी स्वयंसेवकों को दुख हुआ था; पर संघ में व्यक्ति नहीं, संगठन महत्वपूर्ण है। ऐसी ही एक चुनौती 2018 में विश्व हिन्दू परिषद में आयी। एक प्रभावी कार्यकर्ता ने अपनी नयी संस्था बना ली। यहां भी टकराव व्यक्ति और संगठन में ही था।

आगे की ओर

कभी ‘संगठन के लिए संगठन’ की बात कही जाती थी; पर 50 साल संगठन और 50 साल विस्तार के बाद अब संघ समाज परिवर्तन की ओर बढ़ रहा है। जहां संघ का काम काफी समय से चल रहा है, वहां परिवार प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी और स्थानीय वस्तुओं का प्रयोग, सामाजिक समरसता, एक मंदिर, एक श्मशान, एक जलस्रोत, नागरिक कानूनों के पालन आदि का आग्रह किया जा रहा है। संघ के प्रयास से इस दिशा में भी निःसंदेह सुधार होगा। समाज में हजारों संस्थाएं और लोग अच्छे काम कर रहे हैं। संघ उन्हें भी साथ लेकर सम्मान और श्रेय देता है। संस्थागत अभिनिवेश से मुक्ति संघ की एक बड़ी विशेषता है। यद्यपि जब से केन्द्र और राज्यों में भाजपा या भाजपानीत सरकारें बन रही हैं, तब से संघ से बहुत अधिक लोग जुड़ने लगे हैं। यह स्थिति सुखद है।

‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे’ से लेकर ‘परम वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रम्’ की इस अविराम यात्रा में अभी बहुत काम बाकी है। निःसंदेह अगले कुछ वर्ष में करोड़ों स्वर ‘भारत माता की जय’ बोलेंगे और विश्वगुरु भारत का सपना साकार होगा।

Topics: विद्या भारतीडा. हेडगेवारपर्यावरण संरक्षणहिन्दुत्व के मूल्यराष्ट्र सेविका समितिदेश विभाजन एक बड़ी चुनौती‘भारत माता की जय’परिवार प्रबोधनपं. दीनदयाल उपाध्यायविजयादशमीविश्वगुरु भारतसंघ पर प्रतिबंधसरस्वती शिशु मंदिरस्वदेशीविश्व हिन्दू परिषदहिन्दू संगठनरा.स्व.संघपाञ्चजन्य विशेष
विजय कुमार
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