रक्षाबंधन के अगले दिन लड़ा गया था एक ऐतिहासिक युद्ध, जानिए भुजरिया पर्व की वह विस्मृत गाथा जो आज भुलाई जा रही है
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रक्षाबंधन के अगले दिन लड़ा गया था एक ऐतिहासिक युद्ध, जानिए भुजरिया पर्व की वह विस्मृत गाथा जो आज भुलाई जा रही है

द्वापर युग के महाभारत की गाथा की पुनरावृत्ति है कलयुग में आल्हाखण्ड की गाथा,परंतु केवल श्रीकृष्ण नहीं हैं अन्यथा सभी पात्रों की पुनरावृत्ति आल्हाखण्ड में हुई।

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Aug 10, 2025, 01:07 pm IST
inभारत

भारत में पर्व युगों से चली आ रही सांस्कृतिक परम्पराओं, प्रथाओं, मान्यताओं, विश्वासों, आदर्शों, नैतिक, धार्मिक तथा सामाजिक मूल्यों का वह मूर्त प्रतिबिम्ब हैं जो जन-जन के किसी एक वर्ग अथवा स्तर-विशेष की झाँकी ही प्रस्तुत नहीं करते, वरन सामाजिक समरसता का संदेश देते हैं। श्रावण मास में रक्षाबंधन के अगले दिन भाद्रपद कृष्ण पक्ष प्रतिपदा को भुजरिया पर्व मनाया जाता है। यह पर्व मुख्‍य रुप से बुंदेलखंड का लोकपर्व है।

आइए लोकपर्व कजलियों के ऐतिहासिक और सामरिक महत्व को जानते हैं। द्वापर युग के महाभारत की गाथा की पुनरावृत्ति है कलयुग में आल्हाखण्ड की गाथा,परंतु केवल श्रीकृष्ण नहीं हैं अन्यथा सभी पात्रों की पुनरावृत्ति आल्हाखण्ड में हुई। उदाहरण के लिए युधिष्ठिर – आल्हा, भीमसेन- ऊदल, ब्रह्मानंद – अर्जुन, दुर्योधन – पृथ्वीराज चौहान, शकुनि – माहिल और बेला – द्रोपदी के रुप में पुनर्जन्म लेते हैं। महोबा के राजा परमाल देव के यहाँ आल्हा – ऊदल सेनाओं के प्रमुख बन जाते हैं। सब कुछ ठीक चलता रहता है परंतु एक षडयंत्र के चलते उरई के राजा मामा माहिल सन् 1181 में राजा परमाल देव को भड़का देते हैं परिणामस्वरूप आल्हा – ऊदल को महोबा से निष्कासित कर दिया जाता है। तदुपरांत आल्हा-ऊदल कन्नौज में शरण लेते हैं।

महोबा का संकट और चंद्रावलि का दुःख

आल्हा – ऊदल के देश निकाला की खबर माहिल पृथ्वीराज चौहान को देते हैं और महोबा पर आक्रमण करने के लिए उकसाते हैं क्योंकि महोबा धन – धान्य से बहुत ही सम्पन्न था। नौलखा हार, पारस पत्थर और उड़न बछेरे प्रमुख आकर्षण का केंद्र थे। उधर आल्हा-ऊदल के चले जाने से उनकी बहन चंद्रावलि दुख के सागर में डूब जाती है और रह रहकर याद करती है और अपने मायके, पिता राजा परमाल देव के यहाँ आ जाती है। चंद्रावलि महोबा में अपने भाइयों को न पाकर बहुत दुखी होती है और रक्षाबंधन के लिए अपने भाईयों को संदेश भेजती है परंतु कोई उत्तर नहीं मिलता है। भाईयों के वियोग में चंद्रावलि और अन्य स्त्रियाँ भुजरिया गीत गाती हैं। इसी प्रकार छत्तीसगढ़ में इसे भोजली कहा जाता है, स्त्रियों के द्वारा गाये जाने वाले गीत में मायके ,सखियों, भाइयों का बहुत सुंदर करूणा, स्मृति और नारी मन की व्यथा का चित्रण मिलता है। अंततः रक्षाबंधन के कुछ दिन पहले पृथ्वीराज चौहान, माहिल के सुझाव पर महोबा घेर लेते हैं।

राजा परमाल देव सामना करने की स्थिति में नहीं होते हैं इसलिए चंद्रावलि नौलखा हार, पारस पत्थर सहित अन्य बहुमूल्य साम्रगी देने के लिए तैयार हो जाते हैं परंतु चंद्रावलि वीरांगना थीं इसलिए वे युद्ध आरंभ कर देती हैं। घमासान युद्ध होता है परंतु विजय किसी की निश्चित नहीं होती है।युद्ध में माहिल के पुत्रों का बलिदान होता है। उधर कन्नौज में चंद्रावलि का पत्र मिलता है परंतु आल्हा-ऊदल को जिन शर्तों पर देश निकाला दिया था, उनके अनुसार महोबा जाना मुश्किल था। आल्हा चुप्पी साध लेते हैं परंतु ऊदल वेश बदलकर अपनी बहन चंद्रावलि के लिए निकल पड़ते हैं। इधर महोबा में बड़े संकट में रक्षाबंधन होता है और दूसरे दिन कीरतसागर में भुजरियों को सिराने के लिए चंद्रावलि अपनी सखियों के साथ पहुंचती हैं परंतु पृथ्वीराज चौहान की सेना पुनः घेर लेती है तथा विसर्जन के लिए मना कर दिया जाता है। युद्ध पुनः आरंभ हो जाता है तभी वेश बदले ऊदल और कन्नौज के युवराज लाखन पहुंच जाते हैं और युद्ध घमासान हो जाता है, इसे ही कीरतसागर भुजरियों के युद्ध के नाम से जाना जाता है।

एक पहर के युद्ध में ऊदल और लाखन पृथ्वीराज चौहान की सेना को खदेड़ देते हैं और फिर ऊदल और लाखन अपनी बहन चंद्रावलि और उनकी सखियों की भुजरियों को कीरतसागर में सिरवाते हैं। इसी बीच भुजरियों सिराते समय चंद्रावलि अपनी सखियों से कहती हैं कि ये वेश बदले योद्धा ऊदल भैय्या जैंसे लगता है, ये आवाज ऊदल के कानों में पड़ती है वो मुस्कराकर चंद्रावलि की ओर देखते हैं तभी चंद्रावलि की आंखें अपने भाई से मिलती हैं और एक पहचान भी देख लेती हैं और फूट-फूटकर रोने लगती हैं क्योंकि वे ऊदल को पहचान जाती हैं, अब ऊदल से नहीं रहा जाता है और वे वेश उतारकर अपनी बहिन चंद्रावलि के चरण स्पर्श करते हैं, और आँसुओं की धार लग जाती है। तदुपरांत आन – बान – शान के साथ बहनें कीरतसागर में भुजरियों को विसर्जित करती हैं। उसके बाद आल्हा मनौआ होता है, इसकी फिर कभी चर्चा होगी।यह उपाख्यान मूलतः जगनिक के आल्हाखड से ही है परंतु जनश्रुतियों को भी लिया है।

महान लोक कवि जगनिक के वीर रस प्रधान काव्य आल्हाखंड में वर्णित कथा के आलोक में यह पर्व जहाँ एक ओर भाई – बहिन के प्रेम और विजय का प्रतीक है, तो वहीं दूसरी ओर अच्छी बारिश, फसल एवं सुख-समृद्धि की कामना के लिए भी मनाया जाता है। इसे कजलियों का पर्व भी कहते हैं। छत्तीसगढ़ में इसे भोजली कहा जाता है। यह पर्व एक समय संपूर्ण भारत वर्ष में धूमधाम से मनाया जाता था और कजलियां मिलन के माध्यम से सुख – दुख साझा किए जाते थे साथ ही बैर भाव मिटा दिए जाते थे। यह पर्व समाज के सभी वर्गों के पारस्परिक मिलन और सामाजिक समरसता का प्रतीक था।एक समय था,जब पूरे भारतवर्ष में यह सामाजिक समरसता का पर्व धूमधाम से मनाया जाता था, परन्तु कल्चरल मार्क्सिज्म, मिशनरियों और तथाकथित सेक्युलरों के षड्यंत्र के चलते हिंदू पर्व और त्योहारों दुष्प्रभाव पड़ा है। इस कड़ी में कजलियों का पर्व भी शिकार बना और सीमित होता जा रहा है, इसलिए समय रहते, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पंच प्रण के आलोक में सामाजिक समरसता की स्थापना के उद्देश्य से पुनः इस पर्व का लोकव्यापीकरण करना आवश्यक है।

Topics: भुजरिया पर्व कैसे मनाया जाता हैfestival of KajalisHindu festival‘पृथ्वीराज चौहानभुजरिया पर्वकजलियों का पर्वकजलियों का ऐतिहासिक महत्वहिन्दू पर्व
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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