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‘भारत की आत्मा है संस्कृत’ 

स्वस्तिवाचनम् की 15वीं वर्षगाँठ पर नई दिल्ली में संस्कृत दिवस के अवसर पर विशेष डाक आवरण का विमोचन। संस्कृत, योग, आयुर्वेद, और भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रचार में संस्था का योगदान।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Aug 10, 2025, 10:52 am IST
inदिल्ली
Sanskrit India post

प्रतीकात्मक तस्वीर

नई दिल्ली – संस्कृत पत्रकारिता, योग, आयुर्वेद, वास्तुशास्त्र, इंडोलॉजी और भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित प्रतिष्ठित संस्था ‘स्वस्तिवाचनम्’ की 15वीं वर्षगाँठ के उपलक्ष्य में, भारत सरकार के संचार मंत्रालय के डाक विभाग ने संस्कृत दिवस के अवसर पर विशेष आवरण – स्पेशल कवर का विमोचन नई दिल्ली के संसद मार्ग स्थित प्रधान डाक घर स्थित फिलैटेलिक ब्यूरो में किया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी उपस्थित रहे। अपने संबोधन में प्रो. वरखेड़ी ने कहा— “संस्कृत ऐसी भाषा है जो सभी सीमाओं से परे, सभी के लिए है। इसके साथ जुड़ा युवा वर्ग शिक्षा, नवाचार और प्रौद्योगिकी में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रहा है और हमारे विरासत के ध्वजवाहक और दूत बन रहा है। बीते पंद्रह वर्षों में ‘स्वस्तिवाचनम्’ संस्था ने संस्कृत पत्रकारिता, योग, आयुर्वेद, वास्तुशास्त्र, इंडोलॉजी और भारतीय ज्ञान परंपरा के संवर्धन में अनुकरणीय योगदान दिया है। यह भी प्रसन्नता का विषय है कि संस्था अपने संस्थापक, सुप्रसिद्ध संस्कृत विद्वान, स्व. आचार्य दिनेश चंद्र जोशी की जन्मशताब्दी वर्ष को संस्कृत के प्रति उनके आजीवन समर्पण की वर्षव्यापी श्रद्धांजलि के रूप में मना रही है।”

आवरण की खासियत

इस अवसर पर जारी विशेष आवरण में सात चक्रों की उन्नति के माध्यम से चेतना के जागरण को कलात्मक रूप में दर्शाया गया है। साथ ही वेदों के चार महावाक्यों—”प्रज्ञानं ब्रह्म”, “अहं ब्रह्मास्मि”, “तत्त्वमसि” और “अयमात्मा ब्रह्म”—को भी अंकित किया गया है। बाहरी किनारों पर उत्तराखंड की पारंपरिक ‘ऐपन’ कला का प्रयोग किया गया है, जो ‘स्वस्तिवाचनम्’ के संस्थापक की मातृभूमि को सम्मानित करता है।

विशिष्ट अतिथि के रूप में महार्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय, उज्जैन, मध्य प्रदेश सरकार के कुलपति प्रो. शिव शंकर मिश्र उपस्थित रहे। उन्होंने कहा— “हमारे समाज का युवा वर्ग हमारी संस्कृति, शास्त्रों और विरासत को विश्व पटल पर पहुँचा रहा है। यह हमारे लिए गर्व का क्षण है कि ‘स्वस्तिवाचनम्’ जैसी स्वैच्छिक संस्था अपने संस्थापक स्व. आचार्य दिनेश चंद्र जोशी के सपनों को साकार कर रही है और भारतीय ज्ञान प्रणाली को आगे बढ़ा रही है। मैं विशेष रूप से प्रभावित हूँ कि यह संस्था पूर्व और पश्चिम के संस्कृत विद्वानों के बीच पांडुलिपियों में संरक्षित ज्ञान के उद्घाटन और संस्कृत शास्त्रों में वर्णित वास्तु एवं स्थापत्य की भव्यता को प्रदर्शित करने हेतु सार्थक संवाद और सहयोग का वातावरण बना रही है।”

डाक विभाग की ओर से नई दिल्ली मध्यवर्ती मंडल के वरिष्ठ अधीक्षक डाकघर, वीरेन्द्र सिंह ने संस्कृत दिवस के महत्व पर प्रकाश डाला और छात्रों से संस्कृत सीखने तथा शाश्वत शास्त्रों के ज्ञान को लोकप्रिय बनाने का आग्रह किया, जो एक अनुशासित और सार्थक जीवन के लिए अमूल्य मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।

संस्कृत भारत की आत्मा है

‘स्वस्तिवाचनम्’ के न्यासी, हरीश चंद्र जोशी ने कहा—”संस्कृत भारत की आत्मा है, और संस्कृत के माध्यम से हम प्रत्येक राज्य, संस्कृति और जीवन शैली को आलोकित करते हैं। यह जितनी प्राचीन ज्ञान की भाषा है, उतनी ही आधुनिक युग की भी है। हम पारंपरिक संस्कृत अध्ययन केंद्रों, विद्यालयों और गुरुकुलों के उत्थान, तथा हमारी महान सभ्यता की धरोहर स्वरूप पांडुलिपियों के संरक्षण व संवर्धन के लिए प्रतिबद्ध हैं। हमारा लक्ष्य पश्चिमी और पारंपरिक संस्कृत विद्वानों को एक मंच पर लाना है, ताकि संस्कृत शास्त्रों का गूढ़ और ठोस सार संपूर्ण विश्व तक पहुँचे और मानवता में शांति व समृद्धि का संचार हो। हम उत्तराखंड से आरंभ करते हुए संस्कृत ग्रामों के विकास का कार्य भी कर रहे हैं, जो ‘स्वस्तिवाचनम्’ के संस्थापक और संतस्वरूप स्व. आचार्य दिनेश चंद्र जोशी की स्मृति को समर्पित है। उनकी जन्मशताब्दी के अवसर पर आज से पूरे वर्षभर भारत और नेपाल के विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में संस्कृत से संबंधित शैक्षिक गतिविधियों का आयोजन किया जाएगा।”

इस अवसर पर संस्कृत के छात्र, विद्वान, और डाक विभाग के अधिकारी उपस्थित रहे, जिससे कार्यक्रम में सांस्कृतिक गर्व और विद्वत् प्रेरणा का जीवंत वातावरण बना।

Topics: Indian knowledge traditionभारतीय ज्ञान परंपरासंस्कृत दिवसस्वस्तिवाचनम्विशेष डाक आवरणSanskrit DaySwastivachanamSpecial Postal Cover
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