आम आदमी को जीवन में सदा शिक्षण और प्रशिक्षण की आवश्यकता पड़ती है। यद्यपि कुछ प्रतिभाएं जन्मजात होती हैं; पर प्रशिक्षण से वे अपनी अधिकतम क्षमता का प्रदर्शन कर पाती हैं। इस बारे में देहरादून निवासी निशानेबाज एवं प्रशिक्षक नारायण सिंह राणा का नाम लेना उचित होगा। उनके परिवार के सभी सदस्य अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी हैं। उनका बड़ा बेटा जसपाल राणा प्रख्यात खिलाड़ी एवं कोच है। उ.प्र. के बागपत जिले के जोहड़ी गांव की निशानेबाज दादियों पर एक फिल्म बनी है।

पंजाब का संसारपुर तथा झारखंड के कुछ गांव हॉकी की फैक्ट्री कहलाते हैं। यह सब प्रशिक्षण का ही कमाल है। जब रा.स्व.संघ का कार्य शुरू हुआ, तो डॉ. हेडगेवार स्वयंसेवकों को सैन्य प्रशिक्षण देना चाहते थे। वे मानते थे कि अनुशासन तथा समूह भावना निर्माण करने में यह बहुत सहायक है; पर वे स्वयं इस बारे में अनभिज्ञ थे। अतः उन्होंने कुछ पूर्व सैनिकों का सहयोग लिया। इसलिए पहले संघ में अंग्रेजी आज्ञाएं, क्रॉस बेल्ट, कंधे पर आर.एस.एस. का बैज आदि का प्रचलन था। संघ के विकास के साथ क्रमशः संस्कृत आज्ञाएं प्रचलित हुईं। कुछ समय बाद डॉ. जी को लगा कि संघ विस्तार के लिए युवा स्वयंसेवकों का गहन प्रशिक्षण जरूरी है।
अतः जून, 1927 से ‘मोहिते का बाड़ा’ संघ स्थान पर प्रशिक्षण होने लगा। सुबह चार घंटे शारीरिक तथा दोपहर में बौद्धिक कार्यक्रम होते थे। इसी में से क्रमशः संघ शिक्षा वर्ग का स्वरूप बना। पहले ये वर्ग 40 दिन के होते थे तथा इन्हें ओ.टी.सी. (ऑफिसर्स ट्रेनिंग कैम्प या अधिकारी शिक्षण वर्ग) कहते थे। इसी क्रम में आगे चलकर दस दिवसीय वर्ग को आई.टी.सी (इन्स्ट्रक्टर ट्रेनिंग कैम्प) कहा गया। संघ शिक्षा वर्ग, प्राथमिक शिक्षा वर्ग आदि की अवधि कई बार बदली है। अब जिले तथा प्रांत के अनुसार होने वाले प्रारंभिक वर्ग (तीन दिन), प्राथमिक वर्ग (सात दिन), संघ शिक्षा वर्ग (15 दिन), कार्यकर्ता विकास वर्ग (एक) (21 दिन) तथा कार्यकर्ता विकास वर्ग (दो) (25 दिन, नागपुर) होता है। नागपुर का वर्ग पूरे देश का होता है। इसमें स्वयंसेवकों को संघ के अखिल भारतीय स्वरूप का ज्ञान होता है।
अब युवा और प्रौढ़ स्वयंसेवकों के अलग वर्ग भी होने लगे हैं। प्रशिक्षण वर्ग में स्वयंसेवक पूरी तरह से संघ के वातावरण में रम जाता है। अनेक प्रांतीय तथा केंद्रीय कार्यकर्ता वहां रहते हैं। उनके बौद्धिक, चर्चा, बैठक तथा अनौपचारिक वार्ता में उसकी संघ संबंधी जानकारी बढ़ती है। मन की जिज्ञासाओं का समाधान होता है। हर स्वयंसेवक में कुछ प्रतिभा भी छिपी रहती है। कोई अच्छा वक्ता होता है, तो कोई लेखक। कोई अच्छा गायक होता है, तो कोई खिलाड़ी। किसी में तर्कशक्ति प्रबल होती है, तो किसी में श्रद्धा और समर्पण। वर्ग में उसकी प्रतिभा प्रकट होती है। अनुभवी कार्यकर्ता इसे पहचानकर उसे विकसित करते हैं। इसका लाभ स्वयंसेवक को आजीवन मिलता है। वर्ग में स्वयंसेवक की शारीरिक और मानसिक क्षमता बढ़ती है। इसका लाभ उसकी शाखा को मिलता है तथा नए स्थानों पर कार्य विस्तार होता है।
2025 में 100 प्रशिक्षण वर्ग
इस वर्ष अप्रैल से जून तक देश भर में 100 प्रशिक्षण वर्गों का आयोजन किया गया। 40 वर्ष से कम आयु वर्ग के स्वयंसेवकों के लिए आयोजित 75 वर्गों में 17,609 स्वयंसेवकों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया। इसी प्रकार 40 से 60 वर्ष की आयु के लिए आयोजित 25 वर्गों में 4,270 शिक्षार्थियों ने भाग लिया। इन प्रशिक्षण वर्गों में देश के 8,812 स्थानों से स्वयंसेवकों की सहभागिता रही।
वर्ग में सब एक साथ रहते, खेलते और खाते-पीते हैं। कौन किस जाति और क्षेत्र का है, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। वह किसान है या मजदूर, वकील है या डॉक्टर, छात्र है या व्यापारी, नौकरी करता है या बेरोजगार, धनी है या निर्धन, शिक्षित है या अशिक्षित, ये सब बातें गौण हो जाती हैं। वर्ग के अनुशासन का स्वयंसेवक के जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ता है। घर पर वह अपनी इच्छानुसार सोता और जागता है; पर वर्ग में सब धरती पर अपना बिस्तर लगाकर एक साथ रहते हैं। कठिन दिनचर्या का पालन करते हैं। भोजन अति साधारण और निश्चित समय पर होता है। सब अपनी बारी आने पर भोजन वितरण भी करते हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि खानपान आदि के लिए प्रत्येक शिक्षार्थी शुल्क देता है। अपने साबुन, तेल, मंजन आदि का प्रबंध भी वही करता है।
वर्ग संचालन के लिए बड़ी संख्या में अनुभवी कार्यकर्ता भी वहां रहते हैं। इनमें से अधिकांश शारीरिक और बौद्धिक शिक्षण की व्यवस्था देखते हैं; जबकि बुजुर्ग कार्यकर्ता भोजनालय, जल, चिकित्सा, यातायात, कार्यालय आदि संभालते हैं। ये सब भी अपना शुल्क देते हैं। ग्रीष्मावकाश में ऐसे वर्ग कुछ अन्य संस्थाएं भी आयोजित करती हैं; पर वे सरकारी पैसे से पिकनिक का साधन मात्र बनकर रह जाते हैं। इनमें जाने का उद्देश्य जैसे-तैसे कुछ प्रमाणपत्र पाना ही होता है, जिससे भविष्य में नौकरी या पदोन्नति आदि में सहायता मिल सके; पर यहां शिक्षार्थी यह सोचकर आता है कि उसे अपनी शाखा को प्रभावी बनाना है। इसलिए वह पूर्ण मनोयोग से हर कार्यक्रम में भाग लेता है। वह किसी के दबाव या लालच से नहीं, अपितु स्वयं प्रेरणा से आता है। इसलिए अन्य संस्थाओं के वर्गों में जहां उच्छृंखलता व्याप्त रहती है, वहां संघ के प्रशिक्षण वर्ग में प्रेम और अनुशासन की गंगा बहती है।
जहां वर्ग लगता है, वहां के कार्य और कार्यकर्ताओं को भी इसका लाभ मिलता है। समाज के प्रभावी लोगों तथा संस्थानों से संपर्क कर वर्ग के लिए साधन जुटाने होते हैं। अतः सब कार्यकर्ता सक्रिय हो जाते हैं। स्थानीय कार्यकर्ता नए लोगों को वर्ग दिखाने लाते हैं। इससे वे भी संघ से जुड़ते हैं। वर्ग के दौरान पथ संचलन तथा सार्वजनिक समापन कार्यक्रम से स्थानीय हिंदू समाज में उत्साह निर्माण होता है। इस प्रकार संघ के प्रशिक्षण वर्ग न केवल शिक्षार्थियों, अपितु प्रबंधकों और स्थानीय कार्यकर्ताओं के लिए भी वरदान बनकर आते हैं।

















