बांग्लादेश में लगीं एक बार फिर से रजाकारों की तस्वीरें: कौन थे रजाकार?
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बांग्लादेश में लगीं एक बार फिर से रजाकारों की तस्वीरें: कौन थे रजाकार?

बांग्लादेश में रजाकारों की तस्वीरें ढाका यूनिवर्सिटी में प्रदर्शित होने से विवाद और हिंसा भड़की। शेख हसीना के जाने के बाद रजाकारों की बहस फिर तेज। जानें 1971 मुक्ति संग्राम में उनकी भूमिका और वर्तमान स्थिति।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Aug 7, 2025, 09:05 am IST
in विश्व, विश्लेषण
Bangladesh Pakistan Supporter Razakar

ढाका यूनिवर्सिटी में रजाकारों के पोस्टर लगाए गए (फोटो साभार: एक्स)

बांग्लादेश में एक बार फिर से रजाकार उभर कर आ गए हैं। हालांकि रजाकार बांग्लादेश के लिए कोई नया शब्द नहीं है, बल्कि ये तो वे लोग हैं, जिनका बांग्लादेश की पाकिस्तान की पहचान के साथ नाता है। जब पिछले वर्ष शेख हसीना ने कहा था कि आरक्षण स्वतंत्रता सेनानियों को नहीं मिलेगा तो क्या रजाकारों को मिलेगा? तो उस समय कथित छात्र सड़क पर यह कहते हुए उतर आए थे कि “अमी रजाकार!” अर्थात हम रजाकार हैं!

अब जब बांग्लादेश से शेख हसीना को गए हुए एक साल हो गया है और नई आजादी का ‘जश्न’ यह देश मना रहा है तो एक बार फिर से रजाकार की बहस तेज हो गई है। और रजाकार भी एक बार फिर से चर्चा में आ गए हैं। शेख हसीना के देश छोड़कर जाने के और दूसरी आजादी के जश्न में ढाका यूनिवर्सिटी में कुछ तस्वीरें लगाई गईं। अब जश्न था कि “तानाशाह” शेख हसीना गईं मगर जश्न इस बात पर एकदम मौन है कि आया कौन? शायद जश्न वालों ने आया कौन वालों की ही तस्वीरें लगाई थीं।

ये तस्वीरें उन लोगों की भी थीं, जिन्होनें बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम में पाकिस्तान का साथ दिया था। ढाका यूनिवर्सिटी में अगस्त के जश्न में रजाकारों की भी तस्वीरें लगाई गईं। रजाकार वे लोग थे जिन्होनें बांग्लादेश के पाकिस्तान से अलग होने का विरोध किया था और साथ ही वे उन लाखों लोगों के कत्ल के भी जिम्मेदार हैं, जिन्हें मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तानी सेना ने निशाना बनाया था।

ढाका यूनिवर्सिटी छात्र शिबिर, जिसे पहले इस्लामी छात्र संघ के रूप में जाना जाता था, वह 1971 के कत्लेआम में सीधे रूप में शामिल थे।

At TSC,Dhaka University, the July rioters are commemorating the Razakars the collaborators who aided the Pakistani army in killing 3 million people during Bangladesh’s Liberation War in 1971. They are trying to frame this commemoration as a celebration of their so-called "July… pic.twitter.com/21tkKNOJJS

— Redowan Ibne Saiful (@Redowanshakil) August 5, 2025

जब मुक्ति संग्राम के विरोधियों की तस्वीरें ढाका यूनिवर्सिटी में लगने के समाचार सामने आए तो लोगों ने विरोध किया। जब छात्रों ने विरोध किया तो उन पर हमला भी किया गया। वॉयस ऑफ बांग्लादेशी हिंदूज नामक हैंडल ने लिखा कि इस समय ढाका यूनिवर्सिटी में हमले हो रहे हैं। कुछ विद्यार्थियों ने “उन रजाकारों” की तस्वीरें हटाने की कोशिश की, और जिसके जबाव में पाकिस्तान समर्थक जमात-ए –इस्लामी ने उनपर हमला कर दिया।

यूनिवर्सिटी प्रशासन में जैसे ही यह तस्वीरें पहुंचीं, वैसे ही हंगामा मच गया और वहाँ के असिस्टेंट प्राक्टर एसोसिएट प्रोफेसर रफीकुल इस्लाम वहाँ पर पहुंचे और उन्होनें तमाम विवादास्पद तस्वीरों को हटाया और मंगलवार की शाम को उन्हें प्राक्टर ऑफिस में रख दिया।

जैसे ही यह खबर वायरल हुई थी कि रजाकारों की तस्वीरें प्रदर्शन में लगी हुई हैं, वैसे ही कुछ छात्र और कुछ लेफ्ट छात्र संगठन प्रदर्शन करने लगे थे। वे नारे लगा थे थे कि “मेरी भूमि, मेरी माँ, रजाकार की नहीं होगी”, “तानाशाह और रजाकार, एक ही हैं!। मंगलवार को तनाव काफी बढ़ गया था।

प्रदर्शन में युद्ध अपराधियों गुलाम आज़म, मतिउर रहमान निज़ामी, अली अहसन मोहम्मद मोजाहिद, डेलवर हुसैन सईदी, क्वाडर मोल्ला, सलाउद्दीन क्वाडर चौधरी और मीर काशेम अली की तस्वीरें शामिल थीं।

लोगों ने कहा था कि जिन लोगों ने बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम का विरोध किया था, उनकी तस्वीरें ढाका यूनिवर्सिटी में लगाया जाना अनुचित है और यह बहुत गलत संदेश दे रहा है।

वॉयस ऑफ बांग्लादेशी हिंदूज नामक हैंडल ने लिखा कि “हिंदू वामपंथी और ढाका विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष मेघमल्लर बोस को ढाका विश्वविद्यालय से रज़ाकारों की तस्वीर हटाने पर जमात-ए-इस्लामी के उग्रवादियों ने पीटा।“ और उसके बाद उन्होनें लिखा कि “चिंता न करें, उन्होंने बांग्लादेशी हिंदुओं पर हमलों के बारे में कभी कुछ नहीं कहा। वह भी हिंदू विरोधी हैं। बस यह सुनिश्चित करें कि वह शरण के लिए भारत न भाग जाएँ।“

कौन थे रजाकार?

प्रश्न यह उठता है कि रजाकार कौन थे? जब पश्चिमी पाकिस्तान के भेदभाव और अत्याचारों से तंग आकर शेख मुजीबुर्रहमान ने जब मुक्ति संग्राम के लिए आह्वान किया था तो पाकिस्तान ने अपने ही एक भूभाग पर सेना भेजी थी।

पाकिस्तानी सेना का नेतृत्व टिक्का खान ने किया था और टिक्का खान को रावलपिंडी का हीरो कहा जाता था। टिक्का खान ने आजादी के लिए प्रदर्शन कर रहे मुक्ति वाहिनी मोर्चे को नियंत्रण में लाने के लिए तीन तरह की सेना बनाई। अल बद्र, अल शम्स और रजाकार।

रजाकारों ने बांग्लादेश निर्माण का विरोध किया था और आँकड़े यह बताते हैं कि लगभग 2 से 4 लाख महिलाओं के साथ बलात्कार किया था। और जिन महिलाओं के साथ बलात्कार और हत्या हुई, उनमें हिन्दू महिलाओं की संख्या अधिक थी। कलकत्ता में एक अखबार में कालम्निस्ट रही अमिता मलिक ने अपनी पुस्तक The Year of the Vulture में यह वाक्य लिखा है। रजाकारों के विषय में उन्होनें लिखा है कि सीमा पर और शरणार्थी शिविरों पर पाकिस्तानी सेना और बंगाल और बिहार के कट्टरपंथी मुस्लिमों रजाकारों की क्रूरता के किस्से होते थे कि कैसे उन्होनें भारत आने वाले लोगों के साथ लूटपाट की, लड़कियों को अलग किया। हालांकि यह भी बात पूरी तरह से सत्य है कि हजारों की संख्या में मुस्लिम महिलाओं के साथ भी इन्होनें बर्बरता की थी।

फिर प्रश्न यही उठता है कि क्या शेख हसीना को अपदस्थ करने में उन्हीं ताकतों का हाथ था, जिन्होनें पाकिस्तान का साथ मुक्ति संग्राम के दौरान दिया था?

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