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क्या बांग्लादेश एक और पाकिस्तान बनता जा रहा है? पिछले एक साल की कहानी क्या कहती है…

पिछले एक साल में बांग्लादेश में यूनुस की अंतरिम सरकार ने देश में केवल अराजक स्थिति पैदा की है

Written byलेफ्टिनेंट जनरल एम के दास,पीवीएसएम, बार टू एसएम, वीएसएम ( सेवानिवृत)लेफ्टिनेंट जनरल एम के दास,पीवीएसएम, बार टू एसएम, वीएसएम ( सेवानिवृत)
Aug 7, 2025, 09:08 am IST
in मत अभिमत

भारतीय सशस्त्र सेनाओं ने पूर्वी पाकिस्तान को मुक्त करने के लिए पाकिस्तान के साथ 1971 का युद्ध लड़ा। यह उद्देश्य तब पूरा हुआ जब भारतीय सशस्त्र बलों ने 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान को हराया और नए देश के रूप में बांग्लादेश का उदय हुआ। 1971 के युद्ध में भारत ने पाकिस्तान के 93,000 सैनिकों को बंदी बनाया, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से किसी भी युद्ध में सबसे अधिक आंकड़ा था। भारत और बांग्लादेश के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध बने, हालांकि अतीत में बांग्लादेश में कुछ भारत विरोधी शासन भी रहा है। लेकिन पिछले साल 5 अगस्त को प्रधानमंत्री शेख हसीना के अपदस्थ होने से पड़ोस में भू-राजनीति का परिदृश्य हमारी कल्पना से परे हो गया।

भारत की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिए भविष्य की चुनौतियों को समझने के लिए बांग्लादेश में इस बदलाव का विश्लेषण करना महत्वपूर्ण है। पिछले एक साल में बांग्लादेश में बहुत कुछ अनदेखा हुआ है। शेख हसीना की दोस्ताना सरकार को हटाने के बाद बांग्लादेश ने पाकिस्तान के साथ राजनयिक और सैन्य संबंध जल्दी से फिर से स्थापित किए। जैसा कि अपेक्षित था, बांग्लादेश चीन के जाल में फंस गया, इस हद तक कि चीनियों को लालमोनिरहाट हवाई अड्डे के पुनरुद्धार की पेशकश की गई। यह निष्क्रिय एयरबेस भारतीय सीमा से सिर्फ 20 किमी दूर स्थित है और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सिलीगुड़ी कॉरिडोर के बहुत करीब है। इस प्रकार, चीन-पाकिस्तान-बांग्लादेश धुरी से भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा उसकी सीमाओं के पश्चिम, उत्तर और पूर्व में एक चिंताजनक वास्तविकता है।

छात्र आंदोलन ने राजनीति को किया प्रभावित

बांग्लादेश में छात्र आंदोलन शुरू से राजनीति और शासन को प्रभावित करता रहा है। 1952 में भाषा आंदोलन में बांग्ला को आधिकारिक भाषा बनाने की मांग करने का नेतृत्व छात्रों ने किया था। छात्रों का सहारा लेकर पिछले साल विरोध प्रदर्शन हुए और शेख हसीना को देश छोड़ना पड़ा। यह उभर कर सामने आ रहा है कि छात्र आंदोलन केवल निष्कासन के पीछे दिखाई देने वाला चेहरा था। आईएसआई समर्थित जमात-ए-इस्लामी तत्वों, खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी), अमेरिकी हितों, चीनी हाथ, डीप स्टेट आदि के अलावा, बांग्लादेश सेना के शासन में बदलाव के लिए प्रमुख खिलाड़ी होने के इनपुट अब उभर रहे हैं।

सत्ता ढांचे में सेना प्रमुख का स्थान

बांग्लादेश के सत्ता ढांचे में सेना प्रमुख सरकार के सभी महत्वपूर्ण निर्णयों में शामिल होते हैं। यहां तक कि बांग्लादेश में एक सबसे लोकतांत्रिक सरकार के तहत भी सेना प्रमुख एक प्रभावशाली व्यक्ति होता है। बांग्लादेश में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख के बीच सत्ता की तिकड़ी, इस अलिखित मानदंड का पालन करती है। शेख हसीना के दौर में सत्ता का यह ढांचा जारी रहा, लेकिन बांग्लादेश में कुछ तत्व उनके बढ़ते भारत समर्थक रुख और प्रधानमंत्री मोदी के साथ उनके अच्छे व्यक्तिगत संबंधों से खुश नहीं थे।

शेख हसीना के तहत, बांग्लादेश एशिया में सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में उभरा था और देश आर्थिक रूप से समृद्ध बन रहा था। जाहिर है, उनके निष्कासन का बाहरी कारकों, विशेष रूप से सेना प्रमुख की महत्वाकांक्षा और युवाओं के बड़े पैमाने पर कट्टरपंथ से अधिक लेना-देना था।

एक साल में बांग्लादेश में कितनी बढ़ी अराजकता

पिछले एक साल में बांग्लादेश में नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने देश में केवल अराजक स्थिति पैदा की है। बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यक, जिनकी संख्या लगभग 1.3 करोड़ (कुल 16.5 करोड़ आबादी का लगभग 8%) है, को कट्टरपंथी इस्लामी ताकतों द्वारा लगातार सताया गया है। हिंदू मंदिरों को अपवित्र किया गया है और हिंदुओं के साथ बर्बरता की गई। कई स्थानों में, बांग्लादेश सेना और स्थानीय पुलिस ने हिंदुओं के खिलाफ अत्याचारों पर आंखें मूंद ली हैं। यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि ऐसे हालात को बांग्लादेश सेना का मौन समर्थन प्राप्त है।

यूनुस ने राजनीतिक महत्वाकांक्षा का संकेत दिया है, लेकिन बांग्लादेश की सेना बीएनपी के नेतृत्व वाली सरकार का समर्थन करने के लिए अधिक इच्छुक हो सकती है। बीएनपी पारंपरिक रूप से बांग्लादेश में इस्लामी ताकतों के लिए अधिक स्वीकार्य रही है और बीएनपी को भारत समर्थक नहीं माना जाता है।

छात्र आंदोलन बिखर चुका है

मुख्य छात्र नेता नाहिद इस्लाम ने नेशनल सिटिजन पार्टी (एनसीपी) नाम से राजनीतिक पार्टी बनाई है। लेकिन बांग्लादेश में छात्र आंदोलन काफी बिखर चुका है और चार छात्र नेता पहले ही अंतरिम सरकार छोड़ चुके हैं। इसलिए, एक सोची समझी योजना के तहत युवाओं को बांग्लादेश में कट्टरपंथी इस्लामवादियों द्वारा दरकिनार कर दिया गया है। मेरा यह मानना है कि बांग्लादेश में नई शक्ति संरचना एक सच्ची लोकतांत्रिक सरकार को पसंद नहीं करेगी। सेना का वर्चस्व पाकिस्तान के मॉडल में सुरक्षित दिखता है।

बांग्लादेश की सत्ता पर सेना की पकड़

ऐसा लगता है कि बांग्लादेश के सेना प्रमुख जनरल वाकर-उज़-ज़मान ने बांग्लादेश में सत्ता पर अपनी पकड़ धीरे धीरे मजबूत कर ली है। वहां अप्रैल 2026 से पहले चुनाव होने हैं, लेकिन अब तक तारीखों की घोषणा नहीं की गई है। जनरल जमान पाकिस्तान के अपने समकक्ष जनरल असीम मुनीर से प्रभावित हो सकते हैं। पाकिस्तान में सत्ता का ढांचा पूरी तरह से उनके सेना प्रमुख के नियंत्रण में है। इस प्रकार का शक्ति समीकरण अधिक अनुकूल है क्योंकि मार्शल लॉ लगाने के बजाय परोक्ष रूप से शासन करना एक बेहतर विकल्प है। बांग्लादेश में चुनावों की अतीत में संदिग्ध प्रतिष्ठा रही है और जनरल ज़मान के लिए बांग्लादेश के अगले कठपुतली पीएम के रूप में अपनी पसंद स्थापित करना आसान होगा।

सेना के प्रभुत्व वाले सत्ता ढांचे की ओर बांग्लादेश

ऐसा प्रतीत होता है कि बांग्लादेश एक सेना के प्रभुत्व वाले सत्ता ढांचे की ओर बढ़ रहा है, जो हमारे पड़ोसी पाकिस्तान के समान है। चीन-पाकिस्तान-बांग्लादेश धुरी का उदय, जिनमें से सभी निरंकुश शक्ति संरचना वाले हैं, भारत के लिए गंभीर रणनीतिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय चुनौतियां पेश कर सकते हैं। भविष्य में होनी वाली चीजों का संकेत ढाका विश्वविद्यालय में प्रदर्शित ‘ग्रेटर बांग्लादेश’ मानचित्र की रिपोर्ट से स्पष्ट है जिसमें भारत के कुछ हिस्से दिखाए गए हैं। भारतीय विदेश मंत्री जयशंकर ने हाल ही में कहा है कि भारत सरकार बांग्लादेश से उठ रही उन घटनाक्रमों की बारीकी से निगरानी कर रही है जिनका भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रभाव पड़ता है। अमेरिका भी बांग्लादेश में अधिक दिलचस्पी दिखा रहा है। अमेरिका की ओर से बांग्लादेश में विकासात्मक सहायता में पर्याप्त वृद्धि के साथ-साथ सुरक्षा सहयोग भी बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर क्षेत्र में अमेरिका के व्यापक हित को दर्शाते हैं।

ट्रंप के टैरिफ वार का असर

ट्रंप के टैरिफ वार को देखते हुए भारत बांग्लादेश में होने वाली घटनाओं पर करीब से नजर रखेगा। बांग्लादेश से सताए गए हिंदुओं के बड़े पैमाने पर शरणार्थी संकट की भारी आशंका है और हमारे बांग्लादेश से सटे राज्यों को इस तरह की स्थिति के लिए तैयार रहना होगा। भारत और नेपाल के बाद बांग्लादेश में तीसरी सबसे बड़ी हिंदू आबादी है। हम पहले से ही असम और पश्चिम बंगाल में एक बड़ा जनसांख्यिकीय परिवर्तन देख रहे हैं। इसलिए बांग्लादेश में हिंदुओं के हितों की रक्षा के लिए भारत को गंभीर कदम उठाने पड़ सकते हैं। भारत को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि जहां तक आपसी आर्थिक सहयोग का संबंध है, बांग्लादेश भारत से दूर न जाए। इसके लिए,भारतीय कूटनीति को बांग्लादेश में मालदीव की तरह एक और कायाकल्प करना पड़ेगा।

बांग्लादेश को फिर से पाकिस्तान नहीं बनने देना चाहिए

ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान पर ध्यान केंद्रित करना उचित है, साथ ही बांग्लादेश के मामलों पर ध्यान देना कम महत्वपूर्ण नहीं है। भारत बांग्लादेश को दूसरा पाकिस्तान नहीं बनने दे सकता क्योंकि बांग्लादेश का भविष्य भारत के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों में सुरक्षित है। हमें बांग्लादेश को बताना होगा कि आपसी रिश्तों में चीन और पाकिस्तान कभी भी हमारी बराबरी नहीं कर सकते हैं।

Topics: बांग्लादेशशेख हसीनाजमात-ए-इस्लामीभारत-बांग्लादेश संबंधमोहम्मद यूनुसबांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन
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