हिमालय की गोद में बसा बेहद संवेदनशील पहाड़ी राज्य उत्तराखण्ड एक बार फिर भीषण प्राकृतिक आपदा की गिरफ्त में है। 5 अगस्त को बादल फटने की घटनाओं ने पहाड़ी जनजीवन को हिलाकर रख दिया है। उत्तराखण्ड के उत्तरकाशी जिले के धराली गांव में बादल फटने की विनाशकारी घटना ने न केवल कई जानें ली बल्कि आशियाने, बाजार, खेती, सड़क, तीर्थ और लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को एक झटके में तहस-नहस कर दिया। दोपहर के समय बादल फटने से भारी बारिश के साथ ऐसा मूसलधार पानी गिरा कि देखते ही देखते गांव के ऊपर मलबा, जलप्रवाह और चट्टानों का पहाड़ टूट पड़ा। महज 34 सैकेंड में दर्जनों घर, होटल, दुकानें जमींदोज हो गई, कम से कम चार लोगों की जान गई, 50 से ज्यादा लापता हैं। एसडीआरएफ, एनडीआरएफ, आईटीबीपी, सभी टीमें रेस्क्यू में जुटी हैं लेकिन इलाका इतना दुर्गम है और मलबा तथा जलप्रवाह इतना तीव्र कि राहत के पुख्ता नतीजे सामने आने में समय लगेगा। स्थानीय बाजार, स्कूल, धार्मिक स्थल सब उजड़ गए। लोग जान बचाने को इधर-उधर भागते दिखे, आसपास 30 फीट तक जमा मलबा, चीख-पुकार और अस्त-व्यस्तता का मंजर।
धराली कोई साधारण गांव नहीं, गंगोत्री धाम से केवल 18 किमी दूर स्थित यह गांव तीर्थयात्रियों का एक प्रमुख पड़ाव रहा है। धराली जैसे गांव वर्षों से प्राकृतिक आपदाओं के खतरे में हैं। उनकी भौगोलिक स्थिति ऐसी घाटी में है, जहां विशाल चढ़ाव-उतार, संकरी नालियों-नदियों और अत्यधिक बारिश की संभावना रहती है। 5 अगस्त को जब बादल फटा तो बाजार की दुकानें, मकान, होटल, सब तबाह हो गए और देखते ही देखते 30 फीट तक मलबा जमा हो गया। तीर्थ, पर्यटन, खेती, सेब-बगीचे और बाजार जीवन की धड़कन हैं लेकिन जब इस तरह बादल फटते हैं तो सब कुछ मिनटों में मिट्टी में मिल जाता है। सड़कों का संपर्क टूट जाता है, बिजली, पानी, टेलीफोन, इंटरनेट जैसी बुनियादी सुविधाएं ठप हो जाती हैं, लोग अपने परिजनों की खोज में भटकने को मजबूर हो जाते हैं। धराली की घटना अविस्मरणीय है क्योंकि यह न केवल प्राकृतिक त्रासदी की तस्वीर है बल्कि मानवजनित असंतुलन और जलवायु परिवर्तन के भयानक इशारे भी हैं।
दूसरे पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश की बात करें तो वहां भी इस साल मानसून की शुरूआत से ही लगातार बादल फटने की खबरें सामने आ रही हैं, जिन्होंने राज्य के विकास, सुरक्षा और भावी पीढ़ी के लिए इच्छाशक्ति व दूरदृष्टि की चुनौती खड़ी कर दी है। हिमाचल में मानसून की शुरुआत से अब तक बादल फटने की डेढ़ दर्जन से भी ज्यादा घटनाएं दर्ज हो चुकी हैं। मंडी, कुल्लू, धर्मशाला, किन्नौर जैसे जिले बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। कभी एक रात में पूरी बस्ती बह जाती है तो कभी मुख्य मार्ग के किनारे का गांव, कभी लोगों के साथ पशुधन तो कभी स्कूल जाती बसें। सर्पिल चाल में बहती पहाड़ी नदियां जब एकाएक भयंकर रौद्र होकर बस्तियों पर कहर बनती हैं तो जान-माल की भारी क्षति होती है, जिसमें गांव-शहर उजड़ जाते हैं, सैंकड़ों लोग लापता हो जाते हैं और सड़क, पुल, बिजली, जल आपूर्ति, बाजार, होटल, मकान इत्यादि तमाम बुनियादी ढ़ांचा नष्ट हो जाता है। विड़ंबना है कि ऐसी ही त्रासदी से पहाड़ अब हर साल सिहरने लगे हैं।
क्या है बादल फटना और कैसे बनती है यह आपदा?
वैज्ञानिक परिभाषा के अनुसार, जब सीमित क्षेत्र (आमतौर पर कुछ किलोमीटर दायरे में) बेहद कम समय (एक घंटा या उससे कम) के लिए 100 एमएम या उससे अधिक बारिश होती है तो उसे बादल फटना कहते हैं। इससे एकाएक बाढ़ जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। ऐसा तब होता है, जब नमी से भरी गर्म हवा पहाड़ों, खासकर हिमालय-श्रृंखला के ऊंचे इलाकों से टकराकर ऊपर उठती है, वहां अचानक ठंडी होकर स्कंधीकृत (कंसोलिडेटेड) भारी वज्रपातीय बादलों में बदल जाती है। जब पानी का भार बादलों में बहुत अधिक हो जाता है तो वे अचानक गुरुत्वाकर्षण की वजह से भारी जलवर्षा के रूप में फूट पड़ते हैं। फटने की इसी प्रक्रिया में महज कुछ ही मिनटों में लाखों लीटर पानी धरती पर गिरता है, पहाड़ी ढ़लान होने के कारण यह पानी बहुत तेज बहाव के साथ मिट्टी, चट्टान, पेड़, घर, इंसान और जानवर तक, सब कुछ बहा ले जाता है। पहाड़ों की ढ़लानें पानी को रोक नहीं सकती, इसलिए बरसात का सैलाब तेजी से नीचे की ओर बहता है और प्रलय का दृश्य बन जाता है। जलपीड़ित गांव, टूरिस्ट, खेती, परिवहन, बाजार, सब कुछ मिनटों में बर्बाद हो जाता है। यही घटना उत्तरकाशी के धराली में घटी और यही भयानक दृश्य बार-बार हिमाचल के विभिन्न इलाकों में सामने आ रहे हैं।
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क्यों बढ़ रही हैं ऐसी घटनाएं?
इन आपदाओं का सबसे बड़ा कारण पहाड़ी क्षेत्रों की भौगोलिक-जलवायु संवेदनशीलता है। हिमालय क्षेत्र टेक्टॉनिक दृष्टि से बेहद सक्रिय है, यह हरिनिया प्लेट और यूरेशियन प्लेट के टकराव की उपज है। पहाड़ी ढ़लान, गहरी घाटियां, संकरी नालियां, इन सबका मिला-जुला असर है कि नमी के भारी बादल टकराकर वहीं जम जाते हैं, यही ‘ऑरोग्राफिक लिफ्ट’ कहलाता है। गर्मियों में बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से नमी लादे मानसूनी हवाएं जब उत्तराखण्ड और हिमाचल की पर्वत-श्रेणियों से टकराती हैं तो अचानक भारी बारिश का खतरा पैदा हो जाता है। प्राकृतिक कारकों के अलावा मानवीय दखल जैसे भारी सड़क निर्माण, सुरंगें, अंधाधुंध कटाई, अव्यवस्थित शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन भी इसके लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं। वनों की कटाई से पहाड़ कमजोर हुए हैं, जलवायु परिवर्तन से बारिश के पैटर्न में बदलाव आया है, नदियों और नालों के मार्ग पर ढ़ांचागत निर्माण ने जल बहाव को अवरुद्ध कर दिया है, जिससे जल के अचानक बहाव की विनाशक शक्ति कई गुना बढ़ जाती है। साथ ही, ग्लेशियर पिघलने से नई झीलों की संख्या बढ़ी है, जो अचानक वर्षा में टूट जाती हैं और बाढ़ को बढ़ा देती हैं।
सामाजिक-आर्थिक असर और पर्यावरणीय त्रासदी
इस तरह की आपदाओं से जीवन और आजीविका पर जबरदस्त असर पड़ता है। स्कूल बंद, परिवहन ठप, जीवनरक्षक सेवाएं बाधित, बेरोजगारी, कृषि-कारोबार ध्वस्त, यह सब पीढ़ियों तक असर छोड़ता है। महिलाएं-बच्चे सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। स्वास्थ्य स्थिति बिगड़ती है, संक्रमण, भोजन-पानी की कमी, मानसिक तनाव, विस्थापन का डर, ये सब समस्याएं आम हो जाती हैं। ऐसी प्राकृतिक आपदाओं में सबसे ज्यादा नुकसान पर्यावरण को होता है। जैव विविधता नष्ट हो जाती है, पहाड़ जख्मों से भर जाते हैं, वनों की हार, भूमि का कटाव, नदियों का मार्ग बदलना, ये सब न केवल भविष्य में आपदाओं की आशंका बढ़ाते हैं बल्कि स्थायी प्रागतिकीय असंतुलन भी पैदा करते हैं। ऐसी तबाही से बचना है तो उत्तराखण्ड और हिमाचल जैसे राज्यों को टिकाऊ विकास की तरफ ध्यान देना होगा। बरसात के दौर में डॉपलर रडार, रियल-टाइम रेन गेज जैसे तकनीकी उपकरणों, मौसम पूर्वानुमान व त्वरित चेतावनी प्रणाली, मजबूत सड़क, ड्रेनेज, एवैकुएशन योजना, राहत-शिविर, वन्य क्षेत्र का सरंक्षण, वैज्ञानिक निर्माण, ये सब कदम जरूरी हैं।
देश-प्रदेश और स्थानीय प्रशासन को नीति स्तर पर प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जल-जंगल-जमीन का सरंक्षण करते हुए बेतरतीब विकास पर नियंत्रण लगाना होगा, तभी धराली जैसे गांव और समूचे हिमालयी क्षेत्र को आपदाओं से बचाया जा सकेगा। धराली हादसा पूरे हिमालयी क्षेत्र की चिंता एवं चुनौती का प्रतीक है। मानसून के इस विकराल रूप में प्रकृति, विज्ञान, समाज और प्रशासन, सबको नई दृष्टि व योजना की जरूरत है। यदि हम अभी भी नहीं चेते तो उत्तराखण्ड-हिमाचल की पर्वत श्रृंखलाएं हर साल ऐसे ही बादल फटने, जान-माल की तबाही और सैंकड़ों-हजारों लोगों के जीवन-मरण संघर्ष की कहानियां दोहराती रहेंगी। यह समय है चेतावनी का, पर्यावरण संतुलन की दिशा में निर्णायक कदम उठाने का ताकि प्राकृतिक खूबसूरती और सांस्कृतिक विरासत के ये क्षेत्र सुरक्षित, समृद्ध और आत्मनिर्भर बन सकें।

















