उत्तराखंड की भागीरथी नदी कई सहायक नदियों को अपने साथ लेकर बहती है। इन्हीं में से एक है खीरगंगा नदी, जो धराली गांव के पास भागीरथी में मिलती है। यह नदी श्रीकंठ पर्वत से निकलती है। बाहर से देखने पर इसका पानी शांत और सुंदर दिखता है, लेकिन इसका इतिहास बहुत ही डरावना और दुखद है।
19वीं सदी की भयानक बाढ़- कभी धराली गांव में 240 मंदिरों का एक बड़ा समूह हुआ करता था, जो कत्यूरी शैली में बनाए गए थे। इन मंदिरों का जिक्र अंग्रेज यात्री जेम्स विलियम फ्रेजर ने भी किया है, जो वर्ष 1816 में गंगा के उद्गम की खोज में इस क्षेत्र में आए थे। उन्होंने अपने यात्रा वृतांत में इन मंदिरों का वर्णन किया है। लेकिन 19वीं सदी की शुरुआत में खीरगंगा नदी में ऐसी भीषण बाढ़ आई कि ये सभी मंदिर मलबे में दब गए और हमेशा के लिए मिट्टी में समा गए। उस बाढ़ ने पूरे क्षेत्र को तहस-नहस कर दिया।
समय-समय पर आती रही बाढ़- खीरगंगा नदी में केवल एक बार नहीं, बल्कि विभिन्न वर्षों में कई बार बाढ़ आई है। इन बाढ़ों ने इस क्षेत्र को बार-बार नुकसान पहुँचाया है। वर्ष 2013 में जब उत्तराखंड में बड़ी आपदा आई थी, तब भी खीरगंगा में भारी बाढ़ आई थी। इसने भागीरथी नदी के आसपास के क्षेत्रों को बुरी तरह प्रभावित किया।
2018 की विनाशकारी बाढ़- अगस्त 2018 में रात के करीब 10 बजे, खीरगंगा नदी में फिर से बाढ़ आ गई। इस बाढ़ में पानी के साथ भारी मात्रा में मलबा आया। यह मलबा धराली के पास गंगोत्री हाईवे पर बनी पुलिया (छोटी पुल) को जाम कर गया। पुलिया के जाम हो जाने से पानी और मलबा पीछे की ओर जमा होता गया। जब दबाव अधिक बढ़ा, तो मलबा सुरक्षा दीवार को पार कर गया और सीधा 50 से अधिक घरों और होटलों में घुस गया। इस आपदा में कई लोगों की संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचा। यहां तक कि प्राचीन कल्पकेदार मंदिर का भी आधा हिस्सा मलबे में दब गया। इसके अलावा, जो सेब के बागान नदी के पास थे, वे भी इस बाढ़ में बह गए या मिट्टी में दब गए। कई लोगों की रोजी-रोटी और आय का साधन भी इस बाढ़ में छिन गया।
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खीरगंगा की प्रकृति- खीरगंगा नदी आम दिनों में बहुत शांत और सुंदर लगती है। इसकी धारा इतनी शांत होती है कि लोग इसके किनारे आराम से बैठते हैं। लेकिन बारिश के मौसम में इसका रूप बिल्कुल बदल जाता है। भारी बारिश या ग्लेशियर पिघलने की वजह से इस नदी में अचानक तेज बहाव और मलबे का सैलाब आ जाता है। यही इसे खतरनाक बनाता है। आज भी खीरगंगा नदी के आस-पास बसे गांवों के लोग डर के साये में जीते हैं, खासकर बारिश के मौसम में। वे जानते हैं कि यह नदी कभी भी उग्र रूप ले सकती है। सरकार और स्थानीय प्रशासन ने यहां बाढ़ सुरक्षा दीवारें बनाई हैं लेकिन भारी मलबे और तेज़ पानी के आगे ये दीवारें भी कई बार टिक नहीं पातीं।

















