Raksha Bandhan 2025: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क्यों मनाता है ‘रक्षाबंधन’?
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Raksha Bandhan 2025: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क्यों मनाता है ‘रक्षाबंधन’?

रक्षाबंधन संघ के लिए सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है, जिसमें समाज की रक्षा और सेवा का संकल्प लिया जाता है।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Aug 6, 2025, 08:39 am IST
inभारत, संघ @100

संघ रक्षाबंधन क्यों मनाता है ? इसका औचित्य क्या है ? ये भी प्रश्न सामान्य जनमानस के मन में रहता है। रक्षाबंधन के पर्व का महत्व भारतीय जनमानस में प्राचीन काल से है। ध्यातव्य है कि पुरातन भारतीय परंपरा के अनुसार समाज का शिक्षक वर्ग ‘रक्षा सूत्र’ के सहारे देश की महान ज्ञान परंपरा की रक्षा का संकल्प शेष समाज से कराता था। अभी भी हम देखते हैं कि किसी भी अनुष्ठान के बाद ‘रक्षा सूत्र’ के माध्यम से उपस्थित सभी लोगों को रक्षा का संकल्प कराया जाता है। इस सबके मूल अध्ययन में यही ध्यान में आता है कि लोग शक्ति व सामर्थ्य के अनुसार समाज की रक्षा का संकल्प लेते हैं। संघ के संस्थापक परमपूज्य डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार जी ने हिन्दू समाज में ‘समरसता’ स्थापित करने के उद्देश्य से इस उत्सव को मनाने का निर्णय उन्होंने इस संकल्प के साथ किया कि समस्त हिन्दू समाज मिलकर समस्त हिन्दू समाज का रक्षक बने।

सामान्यतः रक्षा बंधन पर्व के दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती हैं। किन्तु संघ के उत्सव में इसका विस्तृत अर्थ हुआ जो कि सम्पूर्ण समाज को अपने में समेटता है। पराधीनता के कालखंड में समाज का विघटन हुआ, समाज में दूरियाँ बढीं, समाज का प्रत्येक अंग एक-दूसरे अलग रहकर सुरक्षित अनुभव करने लगा। लेकिन इससे जो नुकसान प्रत्येक वर्ग का हुआ वो अकल्पनीय था। भाषा और क्षेत्र के आधार पर समाज में द्वेष पनपने लगा, और विधर्मी व विदेशी शासकों ने इस समस्या को हल करने के बजाय इस आग में घी डालने का कार्य किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने हिन्दू समाज की इस दुर्दशा को देखा तो न केवल पीड़ा का अनुभव किया बल्कि इसके स्थायी निवारण का संकल्प भी लिया।

रक्षाबंधन का पर्व आपसी विश्वास का पर्व है। इस सक्षम समाज अन्य को विश्वास दिलाते हैं कि वे निर्भय रहें। किसी भी संकट में सक्षम समाज उनके साथ खड़ा रहेगा, संघ ने इसी विश्वास को हजारों स्वयंसेवकों के माध्यम से समाज में पुनर्स्थापित करने का बीड़ा उठाया। रक्षाबंधन के पर्व पर स्वयंसेवक परम पवित्र भगवा ध्वज को रक्षा सूत्र बांधकर उस संकल्प का स्मरण करते हैं, जिसमें कहा गया है कि धर्मो रक्षति रक्षित: अर्थात् हम सब मिलकर धर्म की रक्षा करें। पहले स्वयंसेवक स्नान-ध्यान कर शाखा पर एकत्रित होकर बौद्धिक सुनते इसके पश्चात भगवा ध्वज को रक्षासूत्र बांधते हैं। राष्ट्र सेविका समिति की बहनें और सेवा भारती की बहनें सीमा पर जाकर सैनिकों को और सेवा बस्तियों में जाकर बंधुओं को रक्षा सूत्र बांधती हैं। इसके साथ ही सुख-दुःख में खड़े रहने, समानता-समरसता को सशक्त करने, संस्कारयुक्त, समरस व समतामूलक समाज का वचन लेती हैं। ये किसी भी ‘आदर्श समाज’ के लक्षण हैं जिसके निर्माण में संघ अनवरत रत है। ‘रक्षाबंधन’ उत्सव इसी दिशा में एक सोपान स्वरुप है जो ‘विश्वगुरु भारत’ का मार्ग प्रशस्त करेगा।

 

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