इस्राएली आंतरिक सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-गवीर यरुशलम में ‘अल अक्सा मस्जिद’ में क्या गए, इस्लामी देशों ने तलवारें उठा लीं। गवीर ने बीते रविवार को ‘अल-अक्सा मस्जिद’ में जाकर यहूदी प्रार्थना की। हालांकि वे पहली बार उस ‘मस्जिद’ में नहीं गए थे, वे पहले भी वहां गए हैं लेकिन उन्होंने वहां प्रार्थना पहली बार की है। गवीर इस्राएल के ‘धुर दक्षिणपंथी’ मंत्री माने जाते हैं इसलिए भी इस प्रकरण ने इतना तूल पकड़ लिया है, इस घटना को वैश्विक विवाद के केंद्र में ला खड़ा किया है।
यरुशलम की यह प्राचीन ‘अल-अक्सा मस्जिद’ इस्लाम के मानने वालों के हिसाब से मक्का और मदीना के बाद उनका ‘तीसरा सबसे पवित्र स्थान’ है। मुसलमानों का मानना है कि पैगंबर मोहम्मद ने यहीं से मिराज की यात्रा की थी। लेकिन इसके उलट, यहूदी मान्यता में इसे “टेम्पल माउंट” कहते हैं, जहां उनके अनुसार दो प्राचीन मंदिर थे। यह स्थान यहूदी पंथ का सबसे पवित्र स्थल माना जाता है।
यहूदी और इस्लामी आस्थाओं की टकराहट और इतिहास में हुईं कुछ घटनाओं ने इस स्थल को संवेदनशील और विवादित बना दिया है। 1967 के अरब-इस्राएल युद्ध के बाद इस्राएल ने पूर्वी यरुशलम पर कब्जा कर लिया था, लेकिन जॉर्डन को अल-अक्सा परिसर का संरक्षक माना गया था।

इस्राएल के आतंरिक सुरक्षा मंत्री गवीर ने ‘मस्जिद’ परिसर में यहूदी रीति-रिवाज से प्रार्थना की, जिसे अब इस्लामी देश दशकों पुराने समझौते का उल्लंघन बता रहे हैं। उनका कहना है कि, समझौते के अनुसार गैर-मुस्लिम परिसर में जा तो सकते हैं, लेकिन वहां प्रार्थना—उपासना नहीं कर सकते।
जैसा पहले बताया, मंत्री बेन-गवीर इस्राएली राजनीति में सख्त रुख वाले यहूदी नेता माने जाते हैं, इसलिए उनके इस कदम को ‘फिलिस्तीनियों को डराने और यहूदी प्रभुत्व स्थापित करने’ की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। ध्यान रहे, वे पहले भी अल-अक्सा गए हैं, लेकिन मंत्री पद पर रहते हुए खुलेआम प्रार्थना पहली बार की है।
उनके वहां जाने और इस प्रकार प्रार्थना करने पर इस स्थल के ‘आधिकारिक संरक्षक’ होने के नाते जॉर्डन ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन और ऐसा उकसावा बताया है जो स्वीकार्य नहीं है। उधर कट्टर सुन्नी सऊदी अरब ने इसे इस्राएली अधिकारियों की भड़काऊ गतिविधि करार दिया गया है। पाकिस्तान और तुर्किए ने भी इस पर कड़ी प्रतिक्रिया की है और कड़े शब्दों में निंदा करते हुए इसे ‘खतरे की लाइन पार करना’ बताया है।
इसके अलावा, जिहादी संगठन हमास और फिलिस्तीनी प्रशासन ने इसे फिलिस्तीनियों के खिलाफ आक्रामकता बढ़ाने वाला कदम बताते हुए इसकी भर्त्सना की है। फिलिस्तीन सरकार के प्रवक्ता ने कहा कि ऐसा करके इस्राएल ने ‘सभी हदें पार कर दी हैं’।
1967 के बाद बनी व्यवस्था के अनुसार, जॉर्डन ‘मस्जिद’ परिसर के अंदरूनी मामलों का नियंत्रण करता है और इस्राएल बाहरी सुरक्षा संभालता है। अल अक्सा में गैर-मुस्लिमों को प्रवेश की अनुमति है, लेकिन प्रार्थना—उपासना की मनाही है।
वर्तमान विवाद पर टिप्पणी करते हुए इस्राएल के प्रधानमंत्री कार्यालय ने कहा है कि ‘यथास्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ है।’ लेकिन बेन-गवीर का वहां जाना इस बयान से मेल नहीं खाता दिखता।
‘अल-अक्सा मस्जिद’ केवल एक मस्जिद न होकर मध्य पूर्व की भू-राजनीति का संवेदनशील प्रतीक बन चुकी है। इस्लामवादी देशों का कहना है कि इस्राएली मंत्री के वहां जाने से उनकी मजहबी भावनाएं आहत हुई हैं। उनके अनुसार, इससे क्षेत्रीय तनाव बढ़ सकता है। इस्लामी देशों की तीखी प्रतिक्रिया इस बात का संकेत है कि अल-अक्सा को लेकर इस्राएल की ओर से उठाया जाने वाला कोई भी कदम उकसावा माना जाता है।
















