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‘सुशासन संवाद : ओडिशा की उड़ान’ – समग्र विकास की भारतीय दृष्टि

‘सुशासन संवाद : ओडिशा की उड़ान’ के पहले सत्र का विषय था-आधार और आह्वान। इस सत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक, प्रख्यात लेखक एवं विचारक मुकुल कानिटकर ने अपने विचार रखे-

Written byमुकुल कानिटकरमुकुल कानिटकर
Aug 5, 2025, 07:36 am IST
in संघ @100, ओडिशा, पाञ्चजन्य इवेंट
मुकुल कानिटकर

मुकुल कानिटकर

‘सुशासन संवाद : ओडिशा की उड़ान’ के पहले सत्र का विषय था-आधार और आह्वान। इस सत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक, प्रख्यात लेखक एवं विचारक मुकुल कानिटकर ने अपने विचार रखे-

ज­ब हम विकास की बात करते हैं और उसे केवल आर्थिक मानकों से मापते हैं, तो यह दृष्टि अधूरी रह जाती है। भारत केवल आर्थिक नहीं, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विकास का भी प्रतीक है। स्वामी विवेकानंद के शब्दों में, “इतिहास भी काल की उन गहन गुफाओं में झांकने का साहस नहीं करता, जहां से भारत की गौरवगाथा प्रारंभ होती है।” भारत को ‘सोने की चिड़िया’ कहा गया। लेकिन मैं कहता हूं, भारत को ‘सोने का गरुड़’ कहना चाहिए, क्योंकि आज भी भारत दुनिया का सबसे बड़ा सोना खरीदने वाला देश है। तिरुअनंतपुरम स्थित पद्मनाभस्वामी मंदिर का केवल एक तहखाना खुला तो दुनिया स्तब्ध रह गई। हमारे मंदिरों में इतना सोना है कि विश्व को कई बार खरीदा जा सकता है। केवल मंदिरों की बात नहीं है, भारत की माताओं और बहनों के पास जो आभूषण हैं, वे भी बैंकों के लॉकरों में सुरक्षित हैं। भारत आज भी ‘सोने का गरुड़’ है।

आर्थिक पुनर्जागरण

आज भारत विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। वैश्विक सोने की खपत में भारत का योगदान सबसे अधिक है। एक रोचक तथ्य यह भी है कि जब दिसंबर में मलमास के कारण भारत में एक माह तक सोने की खरीद बंद हो जाती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने के दाम गिरने लगते हैं, क्योंकि भारत की मांग ही वैश्विक कीमतों को प्रभावित करती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत केवल आध्यात्मिक चेतना का केंद्र नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक संरचना में भी एक निर्णायक शक्ति है। इसी आर्थिक पुनर्जागरण की ओर संकेत करते हुए प्रसिद्ध लेखक विलियम डैलरिम्पल ने 1996 में ‘टाइम’ पत्रिका में एक लेख लिखा था, जिसकी शुरुआत उन्होंने इन शब्दों से की- ‘The elephant has started striding again, and the empire strikes back.’ उन्होंने भारत की उस सोई हुई शक्ति की ओर संकेत किया, जो धीरे-धीरे फिर से जाग रही थी।

दुर्भाग्य से स्वतंत्रता के बाद हमने समाजवाद की भ्रमित नीति अपनाई, जिससे देश वर्षों तक विकास में पिछड़ गया। इसे “हिंदू विकास दर” कहा गया। पर असली हिंदू विकास दर क्या है, ये हमने अब जाकर समझा है। पॉल बेरोच जैसे पश्चिमी अर्थशास्त्री भी मानते हैं कि भारत विश्व इतिहास में सबसे लंबे समय तक सबसे समृद्ध देश रहा है। इसलिए हमें अपनी आर्थिक शक्ति को सिर्फ आंकड़ों में नहीं, संस्कृति, संतुलन और समृद्ध परंपरा के आधार पर देखना चाहिए।

स्वर्णिम अतीत

1998 में युग परिवर्तन (Y2K) का समय था और विश्व 21वीं सदी की ओर बढ़ रहा था। उसी समय ‘टाइम’ में अर्थशास्त्री पॉल बैरोच ने लेख लिखा कि भारत प्राचीनकाल में विश्व का सबसे समृद्ध देश था। इस पर आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) ने चर्चा की, लेकिन कुछ अर्थशास्त्री सहमत नहीं हुए। तब ब्रिटिश अर्थशास्त्री एंगस मैडिसन को शोध का कार्य सौंपा गया। एंगस मैडिसन ने 2000-04 तक शोध कर ‘The World Economy: A Millennial Perspective’ नामक पुस्तक प्रकाशित की। इसमें उन्होंने बताया कि 1500 ई. तक भारत का वैश्विक जीडीपी में औसतन 46 प्रतिशत योगदान था। यह चीन के उदय और इस्लामी आक्रमणों के बाद घटा, लेकिन 19वीं सदी के पूर्वार्ध तक भी भारत का योगदान 23 प्रतिशत बना रहा। इस दौरान हमारे कारीगर, व्यापारी और समाज संघर्ष में थे। जैसे-बंजारा समाज, जो आज कई राज्यों में ओबीसी या अनुसूचित जाति के अंतर्गत आता है, उस समय अंतरराष्ट्रीय व्यापार करता था और गुरु तेग बहादुर जी को आर्थिक सहयोग देता था।

1835 में लॉर्ड मैकॉले की अंग्रेजी शिक्षा नीति लागू हुई, जिससे भारत की पारंपरिक शिक्षा प्रणाली समाप्त हो गई। अंग्रेजों के अपने सर्वेक्षणों के अनुसार भारत की साक्षरता दर लगभग 100 प्रतिशत थी-बंगाल में 98 प्रतिशत और पंजाब में 93 प्रतिशत। लेकिन 1947 में यह घटकर केवल 14 प्रतिशत रह गई और वैश्विक जीडीपी में भारत की हिस्सेदारी भी घटकर मात्र 2 प्रतिशत रह गई। धर्मपाल जी ने अंग्रेजी दस्तावेज़ों के आधार पर यह तथ्य ‘The Beautiful Tree’ में रखा है। इन सर्वेक्षणों से स्पष्ट है कि अंग्रेजों ने न केवल भारत की शिक्षा बल्कि उत्पादन और समृद्धि को भी नष्ट किया। भारत जो अनादिकाल से व्यापार, उत्पादन और सांस्कृतिक समृद्धि का केंद्र था, उसे जानबूझकर कमजोर किया गया।

अल बरूनी जैसे यात्री भी भारत की समृद्धि, मंदिरों और स्थापत्य कला की प्रशंसा करते नहीं थकते। इसलिए भारत को समझना है, तो उसे केवल भूगोल से नहीं, उसके इतिहास, ज्ञान, और आत्मा से देखना होगा। विदेशी यात्री जब भारत आते थे, तो उसकी समृद्धि देखकर चकित हो जाते थे। जैसे आज कुछ लोग दुबई के बुर्ज खलीफा की तस्वीरें फेसबुक पर साझा करते हैं, वैसे ही उस समय भारत आए प्रवासी भारत का वर्णन किसी परीकथा के समान करते थे। इब्न बतूता कहता है-“जो बातें हमने केवल कहानियों में सुनी थीं, वो भारत में साक्षात देखीं।” भारत केवल योग, अध्यात्म, नृत्य, संगीत, कला या साहित्य की भूमि नहीं है। भारत संस्कारों का केंद्र भी है, लेकिन उससे आगे बढ़कर वह हर अर्थ में आर्थिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक समृद्धि का प्रतीक रहा है।

भौतिक नहीं, समग्र विकास

भारत का दृष्टिकोण सदैव ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का रहा है यानी विश्व को एक परिवार मानने की दृष्टि। भारत जब भी सामर्थ्यशाली हुआ है, उसने दुनिया को प्रेम, ज्ञान, आनंद और समृद्धि का दान दिया है। यह भारत का केवल गौरवशाली अतीत नहीं, यह भारत का वर्तमान और भविष्य भी है। भारत के आर्थिक विकास को आज भी नापने के जो पैमाने हैं, वे अधूरे और भ्रामक हैं। भारत की वास्तविक समृद्धि आज भी कम नहीं है, बस उसे देखने के लिए सही दृष्टि चाहिए।

हम जिस भूमि पर खड़े हैं, उसे वैदिक काल में ‘ओड्र देश’ कहा गया, जिससे ‘ओडशा’ नाम पड़ा। महाजनपद काल में यही क्षेत्र कलिंग के नाम से प्रसिद्ध हुआ और इसका पश्चिमी भाग कौशल प्रदेश के रूप में जाना गया। उत्कल और कौशल की संस्कृति ने न केवल सांस्कृतिक, बल्कि आर्थिक क्षेत्र में भी देश को अद्वितीय योगदान दिया है। भारत की दृष्टि केवल भौतिक विकास की नहीं, बल्कि समग्र विकास की है-एकात्म, संतुलित, समावेशी और सार्वभौमिक। यह विकास प्रतिस्पर्धा या शोषण पर आधारित नहीं है, बल्कि सहयोग और संतुलन पर आधारित है।

हम ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ या ‘स्ट्रगल फॉर एक्सिस्टेंस’ जैसे विचारों को नहीं मानते। भारत की दृष्टि सर्वांगीण उत्कर्ष की है। एक ऐसी दृष्टि, जो समाज, संस्कृति, अर्थ और अध्यात्म को एक सूत्र में बांधती है।

परस्पर पूरकता की दृष्टि

चार्ल्स डार्विन ने जैव-विज्ञान में ‘नेचुरल सिलेक्शन’ का सिद्धांत दिया, जिसमें कहा गया कि प्रजातियां अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करती हैं और इस संघर्ष में जो सबसे सक्षम होता है वही जीवित रहता है। इसे ही उसने ‘स्ट्रगल फॉर एक्सिस्टेंस’ और ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ कहा। हालांकि, यह सिद्धांत जीव विज्ञान तक ही सीमित नहीं रहा। हर्बर्ट स्पेंसर ने इसे समाजशास्त्र में, और एडम स्मिथ व अन्य पश्चिमी अर्थशास्त्रियों ने इसे अर्थव्यवस्था में लागू कर दिया। परिणामस्वरूप यह सोच बन गई कि ‘राष्ट्र की संपत्ति’ का अर्थ है -व्यक्तियों की संपत्ति का कुल योग। इस व्यक्तिवादी दृष्टिकोण ने समाज को प्रतिस्पर्धात्मक और विभाजित बना दिया। लेकिन इसी सोच को उसी समय रूसी जीवविज्ञानी पीटर क्रॉपॉटकिन ने चुनौती दी। उन्होंने 1880 में अपने शोधपत्र में कहा कि प्राकृतिक विकास का आधार संघर्ष नहीं, बल्कि म्यूचुअल एड (परस्पर सहयोग) है। उन्होंने वनस्पति और जीव-जगत में ‘सिंबायोटिक रिलेशनशिप’ के उदाहरणों से यह साबित किया। आज भी जैव विविधता को बचाने की वैश्विक कोशिशें इसी सिद्धांत पर आधारित हैं-यदि बाघ नहीं बचेगा, तो पारिस्थितिक तंत्र बचेगा ही नहीं। हर प्रजाति एक-दूसरे की पूरक है, प्रतियोगी नहीं।

दरअसल, भारत की मूल दृष्टि तो परस्पर सहयोग से भी आगे है। भारत ‘परस्पर पूरकता’ की बात करता है, गीता के ‘परस्परं भावयन्त:’ के सिद्धांत पर चलता है। भारत की सोच संघर्ष पर नहीं, सह-अस्तित्व पर आधारित है। इसलिए भारत केवल अंतिम व्यक्ति की नहीं, हर स्तर के व्यक्ति की चिंता करता आया है। यही कारण है कि भारत ने अनादिकाल से न केवल सांस्कृतिक और आध्यात्मिक, बल्कि आर्थिक और सामाजिक समृद्धि का मार्ग भी समरसता और संतुलन के आधार पर तय किया है—not by struggle, but by synthesis.

भारत का मूल मंत्र

‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ भारत का मूल मंत्र है। हम प्रार्थना करते हैं कि सभी सुखी हों, समस्त लोकों का कल्याण हो। हमारी पूजा, पाठ या साधना भले ही व्यक्तिगत हो, जैसे सूर्य नमस्कार, चंडी पाठ, सुंदरकांड अथवा हनुमान चालीसा, लेकिन अंत में हमारी प्रार्थना सबके लिए होती है, ‘लोका समस्ता सुखिनो भवन्तु।’ हम सिर्फ भारत या किसी एक पंथ की बात नहीं करते। भारत की परंपरा कभी ‘सर्वे हिंदू भवन्तु सुखिनः’ नहीं कहती। भारत की दृष्टि समावेशी है, ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ है, जबकि अनेक पंथों में यह मान्यता है कि जो हमारे ईश्वर को नहीं मानेगा, उसे मुक्ति नहीं मिलेगी। इसी विचार के आधार पर कन्वर्जन को को उचित ठहराया गया और स्वामी लक्ष्मणानंद जी की हत्या को भी इसी विचारधारा से जोड़ा गया। लेकिन भारत की दृष्टि संघर्ष की नहीं, समरसता की है। आज जब विश्व भर में संघर्ष और अस्थिरता फैली है, हमें यह याद रखना चाहिए कि हमारी सांस्कृतिक विरासत किस प्रकार संवाद, प्रेम और सहयोग पर आधारित रही है।

उदाहरण के लिए, प्राचीन काल में हमारे व्यापारी कंबु समुद्र मार्ग से व्यापार करते हुए एक द्वीप पर पहुंचे, जहां की रानी और उसकी सेना जहरीले तीरों से आगंतुकों पर हमला करने को तैयार रहती थी। लेकिन कंबु ने न तो डर दिखाया, न हथियार। वे शांति और प्रेम का प्रतीक सफेद वस्त्र लेकर उतरे और वहां के निवासियों को वस्त्र पहनने, संस्कृति, शिष्टाचार और जीवन शैली सिखाई। रानी ने कंबु से विवाह किया। उसी से कंबोडिया नाम पड़ा। आज, जब वही कंबोडिया और थाईलैंड जैसे देश आपसी तनाव में उलझे हुए हैं, यह घटना याद दिलाती है कि भारत का मूल स्वभाव क्या है-संघर्ष नहीं, संवाद; आक्रमण नहीं, आत्मीयता।

संतुलित विकास जरूरी

आज विश्व के 54 देश युद्ध में घिरे हुए हैं। यह संकट ‘स्ट्रगल फॉर एक्सिस्टेंस’ की उसी प्रतिस्पर्धी मानसिकता का परिणाम है। यही कारण है कि आज विश्व भारत की ओर देख रहा है, भारत को ‘गुरु’ बनाना चाहता है। भारत की दृष्टि एकांगी विकास की नहीं, समग्र और संतुलित विकास की रही है। जैसे मानव शरीर का संतुलित विकास आवश्यक होता है-सिर, पैर, हृदय और मस्तिष्क सबका संतुलन-वैसे ही राष्ट्र का विकास भी संतुलित होना चाहिए। भारत का आदर्श भगवान श्रीकृष्ण हैं-जो एक उंगली पर गोवर्धन उठा सकते हैं और फिर भी मृदु और संतुलित व्यक्तित्व के प्रतीक हैं। यह भारत की सर्वांगीण विकास दृष्टि है, जिसे ‘समुत्कर्ष’ कहा गया है, यानी सम्यक उत्कर्ष, संतुलित और समरस विकास।

महाभारत के शांति पर्व में पितामह भीष्म युधिष्ठिर को धर्म की यही परिभाषा देते हैं, “अभ्युदय (बाह्य /भौतिक उन्नति) और निश्रेयस (आंतरिक/आत्मिक उन्नति) का समन्वय ही धर्म है।” भौतिक प्रगति भी हो, लेकिन वह प्रकृति-सम्मत, सतत और कल्याणकारी हो। यही भारत की धर्म आधारित विकास दृष्टि है। इसलिए सुशासन केवल शासन नहीं, जन-भागीदारी से चलने वाला सह-शासन है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने इसे ‘पार्टिसिपेटरी गवर्नेंस’ कहा, जहां शासन का उद्देश्य नियंत्रण नहीं, समरसता और सहभागिता है। पितामह भीष्म बताते हैं-“नच राजा नच राजो देयः। जब प्रजा स्व-अनुशासित होती है, तब शासक की आवश्यकता नहीं रहती।” यह है स्वराज्य और स्वशासन की भारत दृष्टि। इसे लागू करने के लिए हमें विकेंद्रीकृत विकास मॉडल अपनाना होगा-ग्राम स्तर तक, प्राकृतिक संसाधनों और स्थानीय विशेषताओं पर आधारित।

आज ‘एक जिला, एक उत्पाद’ की चर्चा हो रही है, लेकिन हमें उससे आगे जाकर प्रत्येक गांव और क्षेत्र की अपनी विशिष्टता के आधार पर विकास करना होगा-भीतर और बाहर दोनों स्तरों पर। यही है भारत का सुशासन मॉडल-समरसता, संतुलन और सहभागिता पर आधारित।

क्या हो विकास का मापदंड?

आज गुजरात मॉडल की चर्चा खूब होती है, लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि एक बार गुजरात सरकार ने एक अनोखी योजना बनाई थी-तीर्थ ग्राम योजना। इसके अंतर्गत सरकार ने 101 मापदंड तय किए। उदाहरण के लिए, गांव में जातिगत संघर्ष न हो, सभी लोग एक ही स्रोत से पानी भरते हों, एक ही मंदिर में सभी पूजा करते हों, शांति, समृद्धि और पारिवारिक प्रेम का वातावरण हो। ऐसे गांवों को विशेष रूप से ‘तीर्थ ग्राम’ घोषित कर योजनाओं का सीधा लाभ, विशेष फंड और सुविधाएं देने का निर्णय लिया गया। जब यह योजना बनी, उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री थे नरेंद्र मोदी जी। प्रारंभ में अधिकारियों ने 50 गांवों को शामिल करने का प्रस्ताव रखा, लेकिन उन्होंने निर्देश दिया कि कम से कम 150 गांव हों। इसके अनुसार बजट और योजना बनी, लेकिन जब सर्वेक्षण हुआ तो 3000 गांव इन मानकों पर खरे उतरे। यानी आज के युग में भी सैकड़ों गांव ‘राम राज्य’ जैसी स्थितियों में हैं।

यह समाज अपने आप में समृद्ध और संपन्न है-बस शासन को उसके साथ जुड़ने की आवश्यकता है। भारत की विकास दृष्टि सर्वांगीण, समग्र और एकात्म है। ओडिशा जैसे राज्य राष्ट्र रूपी परिवार के महत्वपूर्ण अंग हैं। भारत तभी जगतगुरु बन सकता है जब हर क्षेत्र, हर व्यक्ति अपने योगदान के भाव से काम करे। यहां प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि हमें क्या मिला, बल्कि यह होना चाहिए कि हमने क्या दिया? हमने कितना योगदान किया? हम विकास को केवल जीडीपी से नहीं मापते। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने ‘ग्रॉस एम्पावरमेंट’ की बात की है, लेकिन भारत की परंपरा इससे भी आगे है। यहां विकास का मापदंड त्याग है। भारत में यही परंपरा है। यहां योग्यता से अधिक त्याग का सम्मान होता है। ‘त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः’-यह भारत का शाश्वत मंत्र है।

रामदेव बाबा आज सभी को कपालभाति कराते हैं, लेकिन भारत के ऋ षि-मुनियों ने सदियों से पूरे समाज को सामाजिक, आर्थिक और आध्यात्मिक कपालभाति कराई है। उनका संदेश था, ‘छोड़ने पर ध्यान दो, ग्रहण करने पर नहीं।’ 1920 में केसरी पत्रिका में 21 वर्षीय बद्रीसा अटुलधारिया ने लिखा, ‘स्वार्थ ही देशद्रोह है।’ लोकमान्य तिलक ने यह लेख पढ़कर उस युवक के चरण छूने की इच्छा जताई। उन्होंने कहा-‘तुमने एक लेख में ऋ षियों की पूरी परंपरा समेट दी।’ भारत की संस्कृति में त्याग न करने वाला द्रोही माना जाता है। त्याग ही भारत का चरित्र है। भगिनी निवेदिता ने ‘Aggressive Hinduism’ नामक लेख में लिखा-“भारत का आदर्श यह है कि हर अगली पीढ़ी, पिछली पीढ़ी से अधिक योग्य हो। और योग्यता का मापदंड क्या है? जिसने जितना अधिक त्याग किया, वही अधिक योग्य है। हर पिता की प्रार्थना होती है कि उसका पुत्र उससे अधिक त्यागी हो।” हमारे यहां ‘सवाई’ इसी भावना से जुड़ा है- हर पीढ़ी 125 प्रतिशत हो। जय सिंह के पुत्र का नाम सवाई जय सिंह है, यानी सवा गुना।

भारत का विकास मापने का तरीका जीडीपी नहीं है, बल्कि जीएनसी (Gross National Contribution) है- ‘मैंने क्या दिया?’ यही मापदंड है। आज अमेरिका आर्थिक महाशक्ति तो कहलाता है, लेकिन उसकी स्थिति क्या है? उसकी जीडीपी 28 खरब डॉलर है, लेकिन अमेरिका पर कर्ज 36 खरब डॉलर और बकाया ऋ ण 101 खरब। यानी अमेरिका पर जीडीपी से भी चार गुना अधिक कर्ज है। उसकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह उधारी पर टिकी है। फिर भी अमेरिका तकनीकी महाशक्ति है, क्योंकि उसने अपने राष्ट्र के लिए ‘नेशनल कंट्रीब्यूशन’ को समझा। 1960 के दशक में द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका आर्थिक मंदी में था। तब जर्मनी के कई वैज्ञानिक वहां आए और राष्ट्रपति जॉन एफ. केनेडी के नेतृत्व में अमेरिका ने विकास की नई राह पकड़ी। केनेडी ने अपने शपथ भाषण में कहा, “मत पूछो कि अमेरिका तुम्हें क्या देगा, बल्कि पूछो कि तुम अमेरिका को क्या दोगे।” यही सोच थी जिसने 1969 में नील आर्मस्ट्रांग को चांद पर भेजा। उस मिशन के लिए अमेरिका ने अपनी पूरी इंडस्ट्री और विश्वविद्यालयों को अनुसंधान पर लगाया। हर क्षेत्र में नई तकनीक विकसित हुई, जिसने अमेरिका की टेक्नोलॉजी को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया।

आज भी अमेरिका की शक्ति इसी ‘देन की भावना’ का परिणाम है। इसीलिए हमें भी यह सोचना होगा कि हम भारत को विश्व गुरु बनाने में क्या योगदान दे सकते हैं, न कि केवल उससे क्या लेंगे। हमें राष्ट्रीय योगदान (ग्रॉस नेशनल कंट्रीब्यूशन) पर ध्यान देना होगा। यह योगदान शिक्षा, शोध, उद्योग, ग्रामीण विकास, कारीगरी, खनिज संपदा और कृषि के माध्यम से होना चाहिए।

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